What is encephalitis । इन्सेफ्लाइटिस या मस्तिष्क ज्वर का लक्षण व बचाव

Detailed information of encephalitis

इन्सेफ्लाइटिस (encephalitis) को हिंदी में मस्तिष्क ज्वर/मस्तिष्क शोथ (meningitis) अथवा दिमागी बुखार (meningitis) कहा जाता है। यह एक गंभीर बीमारी है, जो वायरस और बैक्टीरिया संक्रमण से होती है। इस बीमारी के कारण मस्तिष्क आवरण में सूजन हो जाती है, जिसके कारण शरीर में गंभीर लक्षण उत्पन्न होते हैं और शरीर में उथल-पुथल उत्पन्न कर देते हैं।

What is encephalitis

बरसात का मौसम (rainy season) शुरू होते ही दिमागी बुखार यानी इन्सेफ्लाइटिस अथवा जापानी इंसेफ्लाइटिस और एक एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम (AES); दोनों का ही प्रकोप प्रायः बढ़ जाता है। पिछले लगभग 4 दशक के दौरान इस बीमारी से लगभग 30000 से ज्यादा बच्चे असमय अपना जीवन खो दिए और हजारों बच्चे लकवा ग्रस्त जीवन जीने को मजबूर हुए हैं। हर साल इस बीमारी से ग्रसित सिर्फ सरकारी आंकड़े में ही 500 से अधिक लोग असमय अपना जीवन खो देते हैं, जबकि हकीकत यह है कि इनकी तादाद इससे कुछ अधिक ही रहती है, क्योंकि सभी लोगों की गणना प्रायः नहीं हो पाती है। गैर-सरकारी संगठनों की मानें तो 3000 से 4000 बच्चे इंसेफलाइटिस से प्रत्येक बरसात के मौसम में तेजी से ग्रस्त हो जाते हैं। 

इन्सेफ्लाइटिस के सबसे अधिक शिकार 3 वर्ष से 15 वर्ष के बच्चे ही होते हैं। इन्सेफ्लाइटिस बीमारी जुलाई महीने से दिसंबर महीने के बीच में फैलती है। सितंबर-अक्टूबर महीने में यह बीमारी अपने चरम सीमा पर होती है। आंकड़े बताते हैं कि कुल जितने लोग इन्सेफ्लाइटिस से ग्रसित होते हैं, उनमें से सिर्फ 10% में ही मस्तिष्क ज्वर के लक्षण, जैसे झटके आना, मिर्गी के लक्षण, बेहोशी और कोमा जैसी स्थिति दिखाई देती है। यह लक्षण कई दिनों के लगातार ज्वर के दौरान अचानक ही बच्चों में प्रकट होते हैं। इनमें से 50% से 60% मरीजों की मृत्यु हो जाती है। बचे हुए मरीजों में से लगभग आधे मस्तिष्क ज्वर के रोगी लकवा ग्रस्त हो जाते हैं, उनके आंख और कान आदि अंग भी ठीक से कार्य नहीं करते। कुछ रोगियों को तो जिंदगी भर दौरे आते रहते हैं। कुछ इन्सेफ्लाइटिस रोगी मानसिक रूप से अपंग भी हो जाते हैं।

इन्सेफलाइटिस के लक्षण -

1. आरम्भ के 15 दिनों तक फ्लू व खांसी के तरह सामान्य लक्षण, 

2. तेज बुखार के साथ अधिक सिर दर्द,

3. डायरिया (दस्त) और उल्टी (वमन),

4. जुकाम-नजला के लक्षण,

5. अगर समय से सही इलाज ना हो पाया तो मिर्गी जैसे झटके आना शुरू हो जाना,

6. मरीज का बेहोश हो जाना,

7. स्मृति शक्ति की कमी, अनाप-शनाप बकना,

8. किसी-किसी को लकवा हो जाना,

9. कुछ व्यावहारिक परिवर्तन होना, जैसे अपनों को ना पहचानना।

इंसेफलाइटिस का कारण-

इंसेफलाइटिस रोग होने व फैलने का मुख्य कारण साफ-सफाई ठीक से ना हो पाना ही है। गंदगी की वजह से यह बीमारी फैलती है। इस रोग के लिए वायरस और बैक्टीरिया जिम्मेदार हैं, लेकिन जो बीमारी भारत के उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्रों में पाई जाती है, इसके लिए प्रायः वायरस जिम्मेदार होते हैं। 

इन्सेफ्लाइटिस बीमारी के वायरस सूअर और हीरोनस नाम वाली जलीय चिड़िया के शरीर पर पाए जाते हैं। इनको काटने के बाद मच्छर यदि किसी इंसान को काटे, तो उसे इन्सेफ्लाइटिस होने की आशंका बनी रहती है। दूषित पानी से भी इन्सेफ्लाइटिस वायरस के लारवा शरीर में पहुंचकर फलने-फूलने लगते हैं। 

इंसेफलाइटिस से बचाव -

अपने घर के चारों तरफ के वातावरण को और अपने घर को साफ सुथरा रखें। मच्छरों से बचाव के लिए कीटनाशक का प्रयोग करें और सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग करें। इंसेफलाइटिस रोग के वाहक मच्छर शाम को अधिक काटते हैं, इसलिए शाम को बाहर निकलते समय मच्छरों से सुरक्षित रहने का प्रयास करें। 

इन्सेफ्लाइटिस से प्रतिरोध के लिए बच्चों को इन्सेफ्लाइटिस का वैक्सीन (टीका) जरूर लगवाएं। इस टीके के तीन डोज लगाएृ जाते हैं। यह वैक्सीन 15 साल तक के बच्चों को लगाया जाता है। 

अगर किसी क्षेत्र में किसी बच्चे को इन्सेफ्लाइटिस का कोई लक्षण दिखे तो इसे गंभीरता से लेते हुए अच्छे डॉक्टर से इलाज करवाना चाहिए। इन्सेफ्लाइटिस का कोई स्पेशल इलाज नहीं है, बल्कि डॉक्टर्स लोग उत्पन्न लक्षणों का इलाज करते हैं। जितनी जल्दी बीमारी का पता चलता है, मरीज के बचने व ठीक होने की संभावना भी उतनी ही अधिक होती है।

इस बीमारी में ऐंठन (आक्षेप) को रोकने के लिए, दिमाग में संक्रमण को समाप्त करने के लिए, डायरिया को ठीक करने के लिए, ब्लड प्रेशर को नियमित करने के लिए और निमोनिया को ठीक की अलग-अलग दवाइयां डाॅक्टर्स द्वारा दी जाती हैं। इन्सेफ्लाइटिस के गम्भीर रोगी को वहां भर्ती कराएं जहां इलाज की खास व्यवस्था व्यवस्था हो और आवश्यकता पड़ने पर वेंटिलेटर व आक्सीजन आदि की सुविधा उपलब्ध हो सके।

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