Republic in India in ancient times, प्राचीनकाल में भारत में गणराज्य के प्रमाण

 प्राचीनकाल में भारत में गणराज्य के प्रमाण 

Dear reader! हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए भारत के प्रधानमंत्री  श्री नरेन्द्र मोदी जी ने एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक बात कही कि भारत न केवल दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, बल्कि समस्त लोकतंत्र की जननी भी है।

प्राचीनकाल में भारत में गणराज्य के प्रमाण

यह सदैव सत्य है कि भारत के अलावा हर जगह मनुष्य वनमानुष की स्थिति जब जंगलों में घूमा करते थे, उस समय भारत के लोग मनुष्य की भांति और एक सुसज्जित समाज में जी रहे थे। भारत के प्राचीनतम सभ्यता व शासन व्यवस्था में लोकतंत्र और गणतंत्र के आद्य रूपों के भी अस्तित्व का प्रमाण उपलब्ध है।

भारत में गणराज्य के प्रमाण के प्रमुख बिंदु:-

वैदिक शासन व्यवस्था: वैदिक गणतांत्रिक शासन व्यवस्था में दो प्रकार की शासन व्यवस्था विद्यमान थी, जैसा कि ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और भारत के प्राचीनतम इतिहास से पता चलता है-

१. राजशाही: इसमें एक वंश विषेश से राजा निर्वाचित होता था और फिर नए राजा के रूप में उसी वर्तमान राजा के पुत्रों-पुत्रियों को उत्तराधिकारी के रूप में चुना जाता था। इसे लोकतंत्र का प्रारंभ भी माना जाता है। यह प्राचीन भारत में सर्वाधिक स्थान पर व्याप्त था। छोटे-छोटे शासक होते थे, फिर उनके ऊपर एक महाराजा होता था, फिर कई महाराजाओं के ऊपर एक चक्रवर्ती राजा शासन करता था। चक्रवर्ती राजा गणतांत्रिक राजा के ऊपर भी अपना शासन करता था।

२. गणतांत्रिक: इसमें राजा या सम्राट के बजाय शक्ति एक परिषद या सभा में निहित होती थी।

इस सभा की सदस्यता जन्म के बजाय कर्म सिद्धांत पर आधारित होती थी और इसमें ऐसे लोग ही शामिल किए जाते थे, जिन्होंने अपने कार्यों से खुद को प्रतिष्ठित किया था। ये व्यक्ति सम्मानित, अनुभवी और पद प्रतिष्ठित होते थे। ये लोग वैदिक व शास्त्रीय नीति के अनुसार योग्य राजा का चुनाव करते थे। किसी अपराधी, मूर्ख, नादान, पागल इत्यादि को इसमें शामिल नहीं किया जाता था। 

इसमें विधायिकाओं की आधुनिक द्विसदनीय प्रणाली का भी एक संकेत प्राचीन संस्था सभा के रूप में प्रतिष्ठित थी, जिसमें सामान्य लोगों का प्रतिनिधित्व भी होता था।

नीति, सैन्य मामलों और सभी को प्रभावित करने वाले महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर बहस करने के लिए विदथ (सभा) का उल्लेख ऋग्वेद में सौ से अधिक बार किया गया है। इन चर्चाओं में स्त्री और पुरुष दोनों हिस्सा लेते थे। 

कुछ महत्वपूर्ण प्रमाण:-

१. महाभारत: महाभारत के शांति पर्व के अध्याय 107/108 में भारत में गणराज्यों (जिन्हें गण कहा जाता है) व उनकी विशेषताओं के बारे में विस्तृत वर्णन मिलता है।

इसमें कहा गया है कि जब एक गणतंत्र के लोगों में एकता होती है तो गणतंत्र शक्तिशाली हो जाता है और उसके लोग समृद्ध हो जाते हैं अन्यथा आंतरिक संघर्षों की स्थिति में वे नष्ट हो जाते हैं।

इससे पता चलता है कि प्राचीन भारत में न केवल मगध, अवन्तिकापुरी, हस्तिनापुर और इंद्रप्रस्थ जैसे राज्य थे, बल्कि ऐसे क्षेत्र भी थे जहां कोई राजा नहीं था बल्कि एक गणतंत्र था।

बौद्ध काल: प्राचीन भारत के बाद मध्यकालीन भारत में गणतंत्र ने अपना अभूतपूर्व विस्तार किया। बौद्ध कैनन अर्थात् संस्कृत (जिसमें अधिकांश महायान बौद्ध साहित्य लिखा गया था) और पाली (जिसमें हीनयान साहित्य का अधिकांश भाग लिखा गया था) में भारत के प्राचीन गणराज्यों की व्यवस्था का व्यापक संदर्भ मिलता है, जैसे- वैशाली के लिच्छवी।

बौद्ध सिद्धांत वैशाली की मगध के साथ प्रतिद्वंद्विता का भी विस्तार से वर्णन करता है, जो एक राजतंत्र था। यदि लिच्छवियों की जीत होती तो उपमहाद्वीप में शासन की गति गैर-राजशाही व्यवस्था का और विकास होता।

महानिब्बाना सुत्त (पाली बौद्ध कृति) और अवदान शतक (दूसरी शताब्दी ईस्वी का एक संस्कृत बौद्ध पाठ) में भी उल्लेख है कि कुछ क्षेत्र सरकार के गणतंत्रात्मक रूप के अधीन थे।

बौद्ध और जैन ग्रंथों में तात्कालिक 16 शक्तिशाली राज्यों या महा जनपदों की सूची मिलती  है।

३. ग्रीक रिकॉर्ड्स: ग्रीक इतिहासकार डियोडोरस सिकुलस के अनुसार, सिकंदर के आक्रमण (326 ईसा पूर्व) के समय उत्तर पश्चिम भारत के अधिकांश शहरों में सरकार के लोकतांत्रिक रूप थे (हालाँकि कुछ क्षेत्र आम्भी और पोरस जैसे राजाओं के अधीन थे) तथा इसका उल्लेख इतिहासकार एरियन द्वारा भी किया गया था।

सिकंदर की सेना को इन गणराज्यों की सेनाओं से भयंकर प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। उदाहरणस्वरुप मल्लों आदि से भारी हानि झेलने के बाद सिकंदर को जीत हासिल हुई थी।

४. लोकतंत्रात्मक स्वरुप के अन्य स्रोत पाणिनि की अष्टाध्यायी, कौटिल्य का अर्थशास्त्र आदि हैं।

कौटिल्य द्वारा राज्य के तत्त्व: किसी भी राज्य को सात तत्त्वों से बना माना जाता है। पहले तीन स्वामी या राजा, अमात्य या मंत्री (प्रशासन) और जनपद या प्रजा हैं।

राजा को प्रजा की भलाई के लिए विद्वानों की सलाह पर कार्य करना चाहिए।

मंत्रियों को लोगों के बीच से नियुक्त किया जाता है (अर्थशास्त्र में प्रवेश परीक्षा का भी उल्लेख है)। र्थशास्त्र के अनुसार, प्रजा के सुख और लाभ में राजा का सुख और लाभ निहित है।

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