Proper way to take care of children । बच्चों की देखभाल का सही तरीका

Proper way to take care of children

बहुत से माता-पिता (Parents) ऐसे भी हैं, जो अपने बच्चों का अच्छी तरह से देखभाल करने में सक्षम होते हैं; लेकिन ऐसा भी है कि कुछ माता-पिता ऐसे हैं जो अपने बच्चों का सही से देखभाल नहीं कर पाते, क्योंकि कुछ लोगों के पास अपने बच्चों का देखभाल करने के लिए पर्याप्त समय ही नहीं है, तो कुछ लोगों को ठीक से देखभाल करने का तरीका ही पता नहीं होता है। इस लेख में बच्चों के देखभाल करने के कुछ विशेष तरीकों का वर्णन किया गया है।

बच्चों की देखभाल का सही तरीका

6 वर्ष से 11 वर्ष तक बच्चे काफी कुछ समझने-बूझने लगते हैं। आप भी अपने बच्चों की पसंद और नापसंद जान चुनते ही होगें। इस उम्र के कुछ बच्चे सच-झूठ और भला-बुरा पहचानना जानते हैं। यह उम्र एक तरह से बच्चों की नींव निर्माण का काम करती है। इसलिए यहां से शुरू हो जाती है, मां-बाप की परीक्षा, धैर्य, स्नेह और बुद्धिमता।

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. इस उम्र में बच्चों के मन में सैकड़ों प्रकार के सवाल उठते हैं, नाना प्रकार की जिज्ञासाएँ जन्म लेती हैं, जिन्हें शांत करना या बढ़ावा देना मां-बाप या अभिभावकों का कर्तव्य होता है। इस उम्र में बच्चे अवहेलना, मां-बाप की उदासीनता अथवा उनके बीच किसी भी तरह के तनाव को सहज ही पहचान लेते हैं। ऐसे में या तो वे भयभीत रहने लगते हैं या अपेक्षित अनुभव करते हुए अकेले - अकेले रहने लगते हैं अन्यथा फिर चिड़चिड़े हो जाते हैं। अधिकांश बच्चे तो अवांछित व्यवहार भी करने लगते हैं। बच्चों में आपराधिक या दुष्ट प्रवृत्तियां प्रायः 6 वर्ष से 11 वर्ष की आयु में ही पनपने लगती है। 

. 12 वर्ष से 15 वर्ष की उम्र, मानव जीवन की सर्वाधिक संवेदनशील उम्र मानी जाती है। इस उम्र के बच्चों को अपना भला-बुरा पता तो होता है, परंतु उनमें हो रहे परिवर्तन और माहौल उनको बहुत जल्दी और बहुत ज्यादा प्रभावित करते हैं। वह गलत व बुरे रास्तों पर बहुत आसानी से चल पड़ते हैं। ऐसे में, बच्चे झूठ बोल कर, चालाकी पूर्ण व्यवहार से, भोले-भाले बनकर अपने मां-बाप को अक्सर मूर्ख बनाते रहते हैं और मां-बाप को पता भी नहीं चलता कि बच्चा उन्हें मूर्ख बना रहा है। 

. अतः मां-बाप को पल-पल, कदम-कदम अत्यधिक विवेकी व सतर्क होने की आवश्यकता होती है। यदि इस उम्र में बच्चे संभलकर बड़े हो गए तो मानो मां-बाप गंगा नहा लिए व उनकी नैया भव से पार हो गयी और यदि वे भटक गए तो सिवाय पछताने के कुछ भी नहीं रह जाता।

तथ्यों के अनुसार, विपरीत या खराब परिस्थितियों में पले - बढ़े बच्चे अक्सर किसी न किसी मानसिक विकृति का शिकार भी हो जाते हैं। अतः माता-पिता को चाहिए कि वे अपना आपसी सामंजस्य बनाते हुए अपने बच्चों को सही तरीके से संतुष्ट रखें, उनके सामने विपरीत परिस्थितियों जैसे वैमनस्य, उत्तेजना, गृहक्लेश, अवहेलना आदि को जन्म न लेने दें व जहां तक हो सके, इनसे बचाए रखें।

इस उम्र के बच्चों के पोषण व सही विकास के लिए मां-बाप को स्वयं बहुत अनुशासित होना पड़ता है। इसके बाद ही वे अपने बच्चों को अनुशासन सिखा पाएंगे। 

रात को सोते समय बच्चों को कुछ अच्छी किताबें पढ़कर सुनाएं या उन्हें कहें कि वे आपके लिए पढ़ें।

नौ-दस साल के होते होते आप अपने बच्चों को अपने में दोस्त ढूंढने का अवसर अवश्य दें। 

अच्छी व ज्ञानवर्धक पुस्तकों की कुछ सूक्तियों का प्रयोग अपनी रोजाना की जिंदगी में अवश्य करें। ऐसा करने से वह पूरी कहानी वह उसके अच्छाइयाँ याद आएंगी, जो बच्चे के चरित्र निर्माण में मददगार साबित होगी। 

बच्चों को आप जो उपहार दें, वह बहुत ही सोच समझ कर व उसकी आवश्यकता को ध्यान में रखकर दें।

घर की कोई छोटी-सी जिम्मेदारी भी बच्चों को दी जा सकती है।

इस उम्र में बच्चों को चुनाव करने की स्वतंत्रता दें, जैसे उनके सामने केवल दो ही पोशाक या वस्तुएं रखें और कहे कि इनमें से किसे पसंद करना चाहिए।

विद्यालय में मिले होमवर्क को विशेष महत्त्व दें और स्वयं होमवर्क को पूर्ण कराएं। बच्चों को याद करवाने का कार्य अपनी देखरेख में स्वयं करें। 

कुछ समय धार्मिक बातों को व नैतिक मूल्यों को समझने व समझाने का अवसर दें। बच्चों से अंतरात्मा की आवाज सुनने को भी अवश्य समझाएं।

अपने बच्चों में कोई भी अच्छा शौक पैदा करने की कोशिश करें। जैसे पेंटिंग, गीत गाना, वाद्ययंत्र बजाना, किसी खेल से या उससे जुड़े स्तर पर शीर्ष पर पहुंचने को प्रेरित करें, जिससे उनमें एकाग्रता बढ़ेगी और व्यर्थ में वे अपना समय नहीं गवाएंगे और अपने समय का सदुपयोग करेंगे।

आप स्वयं अपने बच्चों के दोस्त बने ताकि उन्हें बाहर के दोस्तों की अधिक आवश्यकता ना हो। 

लगातार स्कूल के संपर्क में भी रहे, कि बच्चा प्रतिदिन स्कूल पहुंचता है या नहीं और उसका वहाँ व्यवहार कैसा है।

घर की कोई एक या दो छोटी जिम्मेदारियां बच्चों को अवश्य दें और उसका निर्वहन करने के लिए उन्हें प्रेरित करें।

बच्चों के सामने व उनसे आपसी तनाव में आकर झगड़ा करने से बचें। ऐसा ना करने से वे असुरक्षित अनुभव करने लगेंगे और बाहर दोस्त ढूंढने लगेंगे, हो सकता है कि बाहर उनके दोस्त गलत भी मिल जाए।

अपने बच्चों को अपने, उनके व मानव जीवन के उद्देश्य के प्रति प्रेरित करते रहें और उसे पूर्ण करने का मार्ग बताएं। 

इस उम्र के बच्चों को स्वाभिमानी बनाने के लिए महत्वपूर्ण बातें सिखाएं और स्वाभिमानी बनने में अवश्य मदद करें, ताकि बच्चा दूसरों पर पूर्ण आश्रित न हो। 

बच्चों को आवश्यकता से अधिक घर से बाहर ना रहने दें, ना अनावश्यक अधिक समय तक घूमने के लिए छूट दें।

बच्चे के दोस्तों से भी मिलें व समय-समय पर फोन की दूसरी लाइन से उनकी बातें अवश्य सुनें।

यदि बच्चे ट्यूशन जाते हैं, तो उस अध्यापक से भी लगातार संपर्क बनाए रहें, ताकि वहां पर बच्चा कैसा व्यवहार करता है।

बच्चे से देर से घर आने का कारण प्रेम पूर्वक अवश्य पूछें। यदि उसका उत्तर संतोषजनक न लगे, तो स्वयं परिस्थिति की जांच करें।

सप्ताह के अंत में या कुछ-कुछ महीनों पर कोई रोमांचक कार्य जैसे किसी धर्म स्थल पर दर्शन इत्यादि करने की कार्य करें, जिससे बच्चे में विशेष भावनाएँ जाग्रत हों। 

कुछ मां-बाप की उदासीनता या कठोरता अथवा मौलिक आवश्यकताओं के अभाव में बच्चे घर से भाग जाते हैं, इनमें से ज्यादातर इसी उम्र के बच्चे होते हैं। अतः इस उम्र में बच्चों की क्षमताओं को पहचाने व उन्हें अपनी परिस्थिति समझाएं व उचित बर्ताव करना सिखाएं। उन्हें सही दिशा देने की जरूरत होती है। बच्चों की शक्तियों व क्षमताओं को देखकर उनकी एकाग्रता बढ़ाएं।उनके सही मकसद को पाने में हमेशा मदद करें। 

इस उम्र के बच्चों का स्वाभाविक रूप से विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण भी बढ़ने लगता है। ऐसा महसूस होने पर अपने बच्चे के साथ इस विषय में बात करें और उन्हें सही जानकारी दें, लाभ-हानि व गुण-दोष भी निसंकोच समझाएं। आवश्यकता पड़ने पर विद्यालय के अध्यापकों की व मनोचिकित्सक की सहायता लेने में भी संकोच न करें।

Conclusion -

इस उम्र में बच्चे सपनों की दुनिया में खोए रहते हैं यह गलत नहीं है। उन्हें कल्पना की उड़ान भरने दें। उनकी सही इच्छाओं का समर्थन करें और गलत चेष्टाओं उत्पन्न होने पर उन्हें सही तरीके से समझाएं। बस आप उनकी सही उड़ानों का निर्देशन करें। यह तभी संभव है, जब आप उनके सबसे अच्छे परामर्श दाता हों।

आप ही अपने बच्चों की प्रेरणा हैं। आप जो भी करते हैं, आपके बच्चे उसे देखकर अक्सर वैसा ही करते हैं। अतः आप कुछ अच्छा ऐसा करें कि, आप उनका उदाहरण बनें, क्योंकि आप ही तो अपने नन्हे-मुन्ने के लिए पूर्ण की परिभाषा हैं।

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