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अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) या वैशाख शुक्ल तृतीया का महत्व व पूजा विधि।

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 !! अक्षय तृतीया - वैशाख शुक्ल तृतीया !!

वैशाख शुक्ल तृतीया को अक्षय तृतीया कहते हैं। यह सनातन धर्म का प्रधान त्यौहार है। 

इस वर्ष 2022 में अक्षय तृतीया, 3 अप्रैल 2022 दिन मंगलवार को मनायी जाएगी और तृतीया तिथि 2 अप्रैल 2022 दिन सोमवार रात्रि 3 बजकर 33 मिनट से  3 अप्रैल 2022 दिन मंगलवार रात्रि 5 बजकर 18 मिनट तक है।

अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya)

इस दिन दिए हुए दान और किए हुए स्नान, होम, जप आदि सभी कर्मों का फल अनंत होता है और सभी कर्म फल अक्षय हो जाते हैं। इसी से इसका नाम अक्षया हुआ है। अतः इस तिथि के दिन यथासामर्थ्य शुभ कर्म करें, परन्तु किसी भी प्रकार का कार्य न करें वरना उसका निस्तारण सम्भव नहीं।

इसी तिथि के दिन नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव अवतार हुए था; इसलिए इस दिन इन लोगों की जयंती मनाई जाती है। इसी दिन त्रेतायुग भी आरंभ हुआ था।

इसे मध्याह्नव्यापिनी ग्रहण करना चाहिए, परंतु परशुराम जी प्रदोष काल में प्रकट हुए थे, इसलिए यदि द्वितीया को मध्याह्न से पहले तृतीया आ जाए तो उस दिन अक्षय तृतीया, नर-नारायण जयंती, परशुराम जयंती और हयग्रीव जयंती; ये सब संपन्न की जाती है। यदि द्वितीया अधिक हो तो परशुराम जयंती दूसरे दिन मनायी जाती है। 

परशुराम जी का जन्म वैशाख शुक्ल तृतीया को रात्रि के प्रथम प्रहर में हुआ था, अतः यह प्रदोषव्यापिनी ग्राह्य होती है। 

यदि इस दिन गौरी व्रत भी हो तो "गौरीविनायकोपेता" के अनुसार गौरीपुत्र गणेश की तिथि चतुर्थी का सहयोग अधिक शुभ होता है। 

अक्षय तृतीया बड़ी पवित्र और महान फल देने वाली तिथि है, इसलिए इस दिन सफलता की आशा से उत्सव आदि के अतिरिक्त नवीन वस्त्र और आभूषण धारण किए जाते हैं और खरीदे जाते हैं तथा नवीन स्थान, संस्था, भवन निर्माण और समाज की स्थापना, भवन की नींव रखना / भवन व अन्य शुभ कार्यों का उद्घाटन भी किया जाता है।

अक्षय तृतीया तिथि के दिन सोमवार और रोहिणी नक्षत्र हो तो, यह बहुत श्रेष्ठ माना जाता है। 

अक्षय तृतीया के दिन चंद्रमा के अस्त होते समय रोहिणी का आगे जाने अच्छा और पीछे रह जाना बुरा होता है।


!! अक्षय तृतीया व्रत !!

अक्षय तृतीया के दिन तीन महत्वपूर्ण जयंती एकत्र होने से व्रती को चाहिए कि वह प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर "ममाखिलपापक्षयपूर्वकसकलशुभफलप्राप्तये भगवत्प्रीतिकामनया देवत्रयपूजनम करिष्ये।"  ऐसा संकल्प करके भगवान का यथाविधि षोडशोपचार से पूजन करें। नैवेद्य में नर-नारायण के लिए सेके हुए जौ या गेहूँ का सत्तू, परशुराम जी के लिए कोमल ककड़ी और भगवान हयग्रीव जी के लिए भीगी हुई चने की दाल अर्पण करें। 

बन सके तो उपवास तथा समुद्रस्नान या गंगा स्नान या अन्य तीर्थ स्नान करें और जौ, गेहूं, दही, चावल और दूध के बने हुए खाद्य पदार्थ जैसे मावा, खीर व मिठाई आदि तथा स्वर्ण, धर्मघट और अन्न व अन्य प्रकार के उपयोगी वस्तुओं का दान करें। ऐसा करने से विघ्न बाधाएं समाप्त होकर व्यक्ति के उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।

अक्षय तृतीया के दिन पितृ श्राद्ध कर्म करने या कराने से और ब्राह्मणों को भोजन कराने से पितरों को अनंत तृप्ति मिलती है और यदि वे अभी प्रेत योनि में हैं तो वे प्रेत योनि से मुक्त होकर अपने अन्य कर्मों के अनुसार गति पाते हैं।

माता गौरी जी की विशेष पूजा भी वैशाख शुक्ल तृतीया को ही की जाती है। इस दिन माता पार्वती जी का प्रीति पूर्वक यथा सामर्थ्य पूजन करें। कुंआरी कन्याएं इस दिन माता गौरी जी का पूजन करके विशेष पुण्य पा सकती हैं।


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