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श्री राम ने शम्बूक को क्यों मारा, राम ने शम्बूक का वध क्यों किया ? वास्तविक सच

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 श्री राम ने शम्बूक को क्यों मारा ?

प्रिय पाठक ! यह बहुत चर्चित प्रश्न है कि श्री राम ने शम्बूक को क्यों मारा ? अथवा श्री राम ने शम्बूक का वध क्यों किया ? हिंदू धर्म का खंडन करने वाले वामपंथी विचारधारा के लोग और हिंदू धर्म का खंडन करने वाले अन्य धर्मों के लोग इस तथ्य को आधार बनाकर हिंदू धर्म का खंडन करते हैं और हिंदू धर्म का पालन करने वाले लोगों को जातिवादिता में घसीट कर हिंदू धर्म से विमुख करना चाहते हैं।

हिंदू धर्म एक ऐसा गहन, विस्तृत और सद्भावना पूर्ण धर्म है, जिस पर शोध करना और लेख लिखना आसान नहीं होता है। जो लोग हिंदू धर्म को नहीं मानते हैं, वे लोग हिंदू धर्म के कुछ शब्दों जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्वच्छता, पवित्रता इत्यादि का गलत अर्थ निकालते हैं, जबकि वास्तव में इनके बहुत अच्छे अर्थ होते हैं। अगर आप हिंदू धर्म को खंडन करने की कुदृष्टि से देखेंगे, तो आप हिंदू धर्म का शोध नहीं कर पाएंगे और खंडन करते-करते ही अपनी अनमोल जिंदगी गवा देंगे।

 इस लेख में मैं इस प्रश्न का उत्तर बताया हूं, आपसे निवेदन है कि कृपया इस लेख को पूरा और ध्यान से पढ़ें और समझें !

आज इंटरनेट पर ऐसी हजारों वेबसाइटें उपलब्ध है, जिसमें से कुछ हिंदू धर्म के समर्थन में लेख लिखती हैं, तो कुछ हिंदू धर्म के विरोध में भी लेख प्रकाशित करती हैं। और अनेक यूट्यूब चैनलों पर वीडियो के माध्यम से भी इस तथ्य को समझाया जाता है, जिसमें अनेक तरह की भ्रामक बातें शामिल की जाती हैं, जिससे कि सामान्य हिंदू जनता गुमराह हो जाती है, जिसमें से इस तथ्य से संबंधित तीन विशेष भ्रामक बातें इस प्रकार हैं-

1. उत्तरकांड प्रक्षिप्त अंश है जिसे बाद में किसी हिंदू विरोधी द्वारा रामायण और रामचरितमानस में जोड़ा गया।
2. महर्षि वाल्मीकि शूद्र थे।
3. श्रीराम ने शम्बूक को शूद्र जाति का होने के कारण मारा। 

इसमें से उपरोक्त दो बातें हिंदू धर्म के समर्थन में लेख लिखने वाले लोग भी लिखते हैं, और तीनों बातें हिन्दू धर्म का खंडन करने वाले लोग लिखते/समझाते हैं; जबकि यह बिल्कुल गलत है। 

सत्य तो यह है कि उत्तर कांड रामायण और श्रीरामचरितमानस का अहम हिस्सा है और महर्षि वाल्मीकि शूद्र नहीं थे, वे ब्राह्मण थे। लेकिन शम्बूक को श्री राम ने क्यों मारा ? आप इस लेख को पूरा पढ़ें, आपके सभी संदेह दूर हो जाएंगे !

श्री राम ने शम्बूक को क्यों मारा, शम्बूक वध

हिंदू धर्म का समर्थन करने वाले अधिकांश लोग पूरे उत्तरकांड को ही प्रक्षिप्त बता देते हैं, जबकि हिंदू धर्म का विरोध करने वाले लोग भी जब शम्बूक के संबंध में लेख लिखते हैं तो उसमें हिंदू धर्म का जमकर विरोध करना चाहते हैं। हिंदू धर्म का विरोध करने वाले लोग शम्बूक को शूद्र बताकर वध का कारण बताते हैं। हां ! श्री राम ने शम्बूक को शूद्र होने के कारण मारा, लेकिन क्यों ? उस शूद्र की क्या गलती थी ? यह भी तो जानना जरूरी है।

हिंदू धर्म का समर्थन करने वाले अधिकांश बुद्धिजीवी लोग भी महर्षि वाल्मीकि को शूद्र की संज्ञा दे देते हैं, लेकिन वास्तविक सच तो यह है कि भारत जब अन्य आक्रमणकारियों व मुगलों का गुलाम हुआ तो उस समय से भारत गुलामी की बेड़ियों में अपनी अधिकांश सभ्यता, संस्कृति और विरासत को खो दिया। पहले इस तरह से समृद्ध कापी-किताबें नहीं थी, महर्षि लोग कंठस्थ करके ही अपने शिष्यों को सुनाते थे। बाद में जब लिपिबद्ध हुई तो समस्त धर्म ग्रंथों को लिपिबद्ध किया गया। फिर मुगल आक्रमणकारी कुतुबुद्दीन ऐबक का सेनानायक बख्तियार खिलजी नामक मुगल ने ईर्ष्या वश नालन्दा विश्वविद्यालय (सनातन हिन्दू संस्कृति का केन्द्र व समस्त धार्मिक पुस्तकों का भंडार गृह) में आग लगवाकर सब कुछ फुंकवा दिया, वह भयंकर आग तीन महीने तक लगातार जलती रही। उस समय कुछ संस्कृत के विद्वान हिंदू विरोधियों ने हिंदू धर्म ग्रंथों में जगह-जगह हिंदू धर्म का विरोध करने के लिए प्रक्षिप्त अंश जोड़ा लेकिन ऐसा नहीं है कि उत्तरकांड प्रक्षिप्त है, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। 

हिन्दू धर्म विरोधियों द्वारा हिन्दू धर्म ग्रन्थों में जितने भी प्रक्षिप्त अंश जोड़े गये हैं वे तुरन्त पकड़ में आ जाते हैं, क्योंकि वे अंश हिन्दू धर्म का विरोध करते नजर आते हैं और समाज में द्वेष पैदा करते हैं; लेकिन उत्तरकांड में ऐसा कुछ भी नहीं है जो हिन्दू धर्म का विरोध करता हो और समाज में द्वेष पैदा करता हो। उत्तरकांड हिन्दू धर्म का ऐसा पवित्र और अहम हिस्सा है जिसे कोई हिन्दू विरोधी रच ही नहीं सकता।

शम्बूक वध की कथा वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड के 73, 74, 75, 76वें सर्ग से संबंधित है। इसकी पूरी कहानी इस प्रकार से है-

वाल्मिकी रामायण - उत्तरकांड सर्ग 73, 74, 75, 76

" तदनंतर कुछ दिनों के बाद उस जनपद के भीतर रहने वाला एक बूढ़ा ब्राह्मण अपने मरे हुए बालक का शव लेकर राज द्वार पर आया। वह स्नेह और दुख से आकुल हो नाना प्रकार की बातें करता हुआ रो रहा था और बार-बार बेटा-बेटा की पुकार मचाता हुआ इस प्रकार विलाप कर रहा था- हाय, मैंने पूर्व जन्म में कौन-सा ऐसा पाप किया था, जिसके कारण आज इस आंखों से मैं अपने इकलौते बेटे की मृत्यु देख रहा हूं। बेटा ! अभी तो तु बालक था, जवान भी नहीं होने पाया था, केवल 5000 दिन (13 वर्ष 10 महीने 20 दिन) की तेरी अवस्था थी, तो भी तु मुझे दुख देने के लिए असमय में ही काल के गाल में चला गया।
 
वत्स ! तेरे शोक से मैं और तेरी माता, दोनों थोड़े ही दिनों में मर जाएंगे, इसमें संशय नहीं है। मुझे याद नहीं पड़ता कि कभी मैंने झूठ बात मुख से निकाली हो, किसी की हिंसा की हो अथवा समस्त प्राणियों में से किसी को कभी कष्ट पहुंचाया हो। फिर आज किस पाप से मेरा यह बेटा पितृ कर्म किए बिना इस बाल्यावस्था में ही यमराज के घर चला गया।

श्री रामचंद्र के राज्य में तो अकाल मृत्यु की ऐसी भयंकर घटना ना पहले कभी देखी गई थी और न सुनने में ही आई थी। निस्संदेह श्रीराम का ही कोई महान दुष्कर्म है, जिससे इनके राज्य में रहने वाले बालकों की मृत्यु होने लगी। दूसरे राज्य में रहने वाले बालकों को मृत्यु से भय नहीं है। अतः राजन ! मृत्यु के वश में पड़े हुए इस बालक को जीवित कर दो, नहीं तो, मैं अपनी स्त्री के साथ इस राजद्वार पर अनाथ की भांति प्राण दे दूंगा। श्रीराम ! फिर ब्रह्म हत्या का पाप लेकर तुम सुखी होना। 

महाबली नरेश ! हम तुम्हारे राज्य में बड़े सुख से रहे हैं, इसलिए तुम अपने भाइयों के साथ दीर्घजीवी होओगे। श्रीराम ! तुम्हारे अधीन रहने वाले हम लोगों पर यह बालक-मरणरुपी दुख सहसा आ पड़ा है, जिससे हम स्वयं भी काल के अधीन हो गए हैं। अतः तुम्हारे इस राज्य में हमें थोड़ा सा भी सुख नहीं मिला।

महात्मा इक्ष्वाकुवंशी नरेशों का यह राज्य अब अनाथ हो गया है। श्रीराम को स्वामी के रूप में पाकर यहां बालकों की मृत्यु अटल है। राजा के दोष से जब प्रजा का विधिवत् पालन नहीं होता, तभी प्रजा वर्ग को ऐसी विपत्तियों का सामना करना पड़ता है। राजा के दुराचारी होने पर प्रजा की अकाल मृत्यु होती है। अथवा नगरों तथा जनपदों में रहने वाले लोग जब अनुचित कर्म पापाचार करते हैं और वहां की रक्षा की कोई व्यवस्था नहीं होती, उन्हें अनुचित कर्म से रोकने के लिए कोई उपाय नहीं किया जाता, तभी देश की प्रजा में अकाल मृत्यु का भय प्राप्त होता है। अतः यह स्पष्ट है कि नगर या राज्य में कहीं राजा से ही कोई अपराध हुआ होगा, तभी इस तरह बालक की मृत्यु हुई है, इसमें कोई संशय नहीं है।

इस तरह अनेक प्रकार की बातों से उसने बारंबार राजा के सामने अपना दुख निवेदन किया और बारंबार शौक से संतप्त होकर वह अपने मरे हुए पुत्र को उठा उठा कर हृदय से लगाता रहा।
 
श्रीराम ने उस ब्राह्मण का इस तरह दुख और शोक से भरा हुआ वह सारा करुण क्रंदन सुना। इससे वे दुखी होकर संतप्त हो उठे। उन्होंने अपने मंत्रियों को बुलाया तथा वशिष्ठ और वामदेव को एवं महाजनों सहित अपने भाइयों को भी आमंत्रित किया। तदनंतर वशिष्ठ जी के साथ आठ ब्राह्मणों ने राज्यसभा में प्रवेश किया और उस देव तुल्य नरेश से कहा- महाराज ! आपकी जय हो। उन आठों के नाम इस प्रकार हैं- मार्कण्डेय, मौग्दल्य, वामदेव, काश्यप, कात्यायन, जाबालि, गौतम तथा नारद। इन सब श्रेष्ठ ब्राह्मणों को उत्तम आसनों पर बैठाया गया। वहां पधारे हुए उन महर्षियों को श्री रघुनाथ जी ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और वे स्वयं भी अपने स्थान पर बैठ गए। 

फिर मंत्री और महाजनों के साथ यथायोग्य शिष्टाचार का उन्होंने निर्वाह किया। उद्दिप्त तेज वाले सब लोग जब यथा स्थान बैठ गए तब श्री रघुनाथ जी ने उनसे सब बातें बताई और कहा- यह ब्राह्मण राजद्वार पर धरना दिए पड़ा है। 

ब्राह्मण के दुख से दुखी हुए उन महाराज का यह वचन सुनकर अन्य सब ऋषियों के समीप स्वयं नारद जी ने यह बात कही-  राजन् ! जिस कारण से इस बालक की अकाल मृत्यु हुई है, वह बताता हूं सुनिए। रघुकुलनंदन नरेश ! मेरी बात सुनकर जो उचित कर्तव्य हो, उसका पालन कीजिए। 

राजन ! पहले सत्ययुग में केवल ब्राह्मण तपस्वी हुआ करते थे। महाराज! उस समय ब्राह्मणेतर मनुष्य किसी तरह तपस्या में प्रवृत्त नहीं होता था। वह युग तपस्या के तेज से प्रकाशित होता था। उसमें ब्राह्मणों की प्रधानता थी। उस समय अज्ञान का वातावरण नहीं था। इसलिए उस युग के सभी मनुष्य अकाल मृत्यु से रहित तथा त्रिकालदर्शी होते थे। 

सत्ययुग के बाद त्रेतायुग आया। इसमें सुदृढ़ शरीर वाले क्षत्रियों की प्रधानता हुई और वे क्षत्रिय भी उसी प्रकार की तपस्या करने लगे। परंतु त्रेतायुग में जो महात्मा पुरुष हैं, उनकी अपेक्षा सत्ययुग के लोग तप और पराक्रम की दृष्टि से बढ़े चढ़े थे। इस प्रकार दोनों युगों में से पूर्व युग में जहां ब्राह्मण उत्कृष्ट और क्षत्रिय अपकृष्ट थे, वहां त्रेतायुग में सामान शक्तिशाली हो गए। तब मनु आदि सभी धर्म प्रवर्तकों ने ब्राह्मण और क्षत्रिय में एक की अपेक्षा दूसरे में कोई विशेषता या न्यूनाधिकता न देखकर सर्वलोकसम्मत चातुर्वर्ण्य व्यवस्था बनाई। 

त्रेतायुग वर्णाश्रम धर्म प्रधान है। वह धर्म के प्रकाश से प्रकाशित होता है। वह धर्म में बाधा डालने वाले पाप से रहित है। पर इस युग में अधर्म ने भूतल पर अपना एक पैर रखा है। अधर्म से युक्त होने के कारण यहां लोगों का तेज धीरे-धीरे घटता जाएगा। सत्ययुग में जीविका का साधनभूत कृषि आदि रजोगुणमूलक कर्म 'अनृत' कहलाता था और मल के समान अत्यंत त्याज्य था। वह अनृत ही अधर्म का एक पाद होकर त्रेता में इस भूतल पर स्थित हुआ। इस प्रकार अनृत (असत्य) रूपी एक पैर को भूतल पर रखकर अधर्म ने त्रेतायुग में सत्ययुग की अपेक्षा आयु को सीमित कर दिया।

अतः पृथ्वी पर अधर्म के इस अनृत रूपी चरण के पड़ने पर सत्यधर्मपरायण पुरुष उस अनृत के कुपरिणाम से बचने के लिए शुभ कर्मों का ही आचरण करते हैं। तथापि त्रेतायुग में जो ब्राह्मण और क्षत्रिय हैं, वे ही तपस्या करते हैं। अन्य वर्णों के लोग सेवा कार्य किया करते हैं। उन चारों वर्णों में से वैश्य और शूद्र को सेवारूपी उत्कृष्ट धर्म स्वधर्म के रूप में प्राप्त हुआ। 

नृपश्रेष्ठ ! इसी बीच में जब त्रेतायुग का अवसान होता है और वैश्यों तथा शूद्रों को अधर्म के एकपाद रूप अनृत (असत्य) की प्राप्ति होने लगती है, तब पूर्व वर्ण वाले ब्राह्मण और क्षत्रिय फिर ह्रास को प्राप्त होने लगते हैं, क्योंकि उन दोनों को अंतिम दोनों वर्णों का संसर्गजनित दोष प्राप्त होने लगता है।

तदनंतर धर्म अपने दूसरे चरण को पृथ्वी पर उतारता है। द्वितीय पैर उतारने के कारण ही उस युग की द्वापर संज्ञा हो गयी है। पुरुषोत्तम ! उस द्वापर नामक युग में जो अधर्म के दो चरणों का आश्रय है- अधर्म और अनृत दोनों की वृद्धि होने लगती है। इस द्वापर युग में तपस्या रूप कर्म वैश्यों को भी प्राप्त होता है। इस तरह तीन युगों में क्रमशः तीनों वर्णों को तपस्या का अधिकार प्राप्त होता है।
 
तीन युगों में तीन वर्णों का ही आश्रय लेकर तपस्यारूपी धर्म प्रतिष्ठित होता है; किंतु नरश्रेष्ठ ! शूद्र को इन तीनों ही युगों में तपरूपी धर्म का अधिकार नहीं प्राप्त होता है। नृपशिरोमणे ! एक समय ऐसा आएगा जब हीन वर्ण का मनुष्य भी बड़ा भारी तपस्या करेगा। कलियुग आने पर भविष्य में होने वाली शूद्र योनियों में उत्पन्न मनुष्यों के समुदाय में तपश्चर्या की प्रवृत्ति होगी।

राजन! द्वापर में भी शूद्र का तब में प्रवृत्त होना महान अधर्म माना गया है, फिर त्रेता के लिए तो कहना ही क्या है ? महाराज निश्चय ही आपके राज्य की सीमा पर कोई खोटी बुद्धि वाला शूद्र महान तप का आश्रय ले तपस्या कर रहा है, उसी के कारण इस बालक की मृत्यु हुई है। 

जो कोई भी दुर्बुद्धि मानव जिस किसी भी राजा के राज्य अथवा नगर में अधर्म या न करने योग्य काम करता है उसका वह कार्य उस राज्य के अनैश्वर्य (दरिद्रता) का कारण बन जाता है और वह राजा शीघ्र ही नरक में पड़ता है, इसमें संशय नहीं। 

इसी प्रकार जो राजा धर्म पूर्वक प्रजा का पालन करता है, वह प्रजा के वेदाध्ययन, तप और शुभ कर्मों के पुण्य का छठा भाग प्राप्त कर लेता है। पुरुषसिंह ! जो प्रजा के शुभ कर्मों के छठे भाग का उपभोक्ता है, वह प्रजा की रक्षा कैसे नहीं करेगा ? अतः आप अपने राज्य में खोज कीजिए और जहां कोई दुष्कर्म दिखाई दे, वहां उसके रोकने का प्रयत्न कीजिए। नरश्रेष्ठ ! ऐसा करने से धर्म की वृद्धि होगी और मनुष्यों की आयु बढ़ेगी। साथ ही इस बालक को भी नया जीवन प्राप्त होगा।

नारदजी के अमृतमय वचन को सुनकर श्री रामचंद्र जी को अपार आनंद प्राप्त हुआ और उन्होंने लक्ष्मण जी से इस प्रकार कहा- सौम्य ! जाओ उत्तम व्रत का पालन करने वाले इन द्विज श्रेष्ठ को सांत्वना दो और इनके बालक का शरीर उत्तम गंध एवं सुगंध से युक्त तेल से भरे हुए काठ के कठौते या डोंगी में डूबाकर रखवा दो और ऐसी व्यवस्था कर दो, जिससे बालक का शरीर विकृत या नष्ट ना होने पाए। शुभ कर्म करने वाले इस बालक का शरीर जिस प्रकार सुरक्षित रहें, नष्ट या खंडित ना हो, वैसा प्रबंध करो।

शुभलक्षण लक्ष्मण को ऐसा संदेश दे महायशस्वी श्री रघुनाथ जी ने मन-ही-मन पुष्पकविमान का चिंतन किया और कहा- आ जाओ। श्री रामचंद्र जी का अभिप्राय समझ कर सुवर्णभूषित पुष्पक विमान एक ही मुहूर्त में उनके पास आ गया। आकर नतमस्तक हो वह बोला, नरेश्वर ! यह रहा मैं। महाबाहो, मैं सदा आपके अधीन रहने वाला किंकर हूं और सेवा के लिए उपस्थित हुआ हूं। 

पुष्पकविमान का यह मनोहर वचन सुनकर महाराज श्री राम महर्षियों को प्रणाम करके उस विमान पर अरुण हुए। उन्होंने धनुष, बाणों से भरे हुए दो तरकस और एक चमचमाती हुई तलवार हाथ में ले ली और लक्ष्मण तथा भरत इन तीनों भाइयों को नगर की रक्षा में नियुक्त करके वहां से प्रस्थान किया। श्री राम पहले तो इधर-उधर खोजते हुए पश्चिम दिशा की ओर गए, फिर हिमालय से घिरी हुई उत्तर दिशा में जा पहुंचे। जब उन दोनों दिशाओं में कहीं थोड़ा सा भी दुष्कर्म नहीं दिखाई दिया, तब नरेश्वर श्री राम ने समूची पूर्व दिशा का भी निरीक्षण किया। पुष्पक पर बैठे हुए महाबाहु श्री राम वहां भी शुद्ध सदाचार का पालन होता देखा। वह दिशा भी दर्पण के समान निर्मल दिखाई दी। 

तब रघुनाथ जी दक्षिण दिशा की ओर गए। वहां शैवल पर्वत के उत्तर भाग में उन्हें एक महान सरोवर दिखाई दिया। उस सरोवर के तट पर एक तपस्वी बड़ा भारी तपस्या कर रहा था। वह नीचे की ओर मुंख किए लटका हुआ था। रघुकुलनंदन श्रीराम ने उसे देखा। देखकर राजा श्री रघुनाथ जी उग्र तपस्या करते हुए उस तपस्वी के पास आए और बोले- उत्तम व्रत का पालन करने वाले तापस ! तुम धन्य हो। तपस्या में बढ़े-चढ़े सुदृढ़ पराक्रमी पुरुष ! तुम किस जाति में उत्पन्न हुए हो ? मैं दशरथकुमार राम तुम्हारा परिचय जानने के लिए कौतूहल से यह बातें पूछ रहा हूं। तुम्हें किस वस्तु को पाने की इच्छा है ?  तपस्या द्वारा संतुष्ट हुए इष्टदेवता से वर के रूप में तुम क्या पाना चाहते हो ? स्वर्ग या दूसरी कोई वस्तु ? कौन-सा ऐसा पदार्थ है, जिसके लिए तुम ऐसी कठोर तपस्या करते हो, जो दूसरों के लिए दुष्कर है।

तापस ! जिस वस्तु के लिए तुम तपस्या में लगे हुए हो, उसे मैं सुनना चाहता हूं। इसके सिवा यह भी बताओ कि तुम ब्राह्मण हो या दुर्जय क्षत्रिय ? वैश्य हो या शूद्र ? तुम्हारा भला हो। ठीक-ठीक बताना।

महाराज श्री राम के इस प्रकार पूछने पर नीचे से लटके हुए उस तपस्वी ने उन नृपश्रेष्ट को अपनी जाति का परिचय दिया और जिस उद्देश्य से उसने तपस्या के लिए प्रयास किया था, वह भी बताया।

क्लेशरहित कर्म करने वाले भगवान राम का यह वचन सुनकर नीचे मस्तक किए हुए लटका हुआ वह तथाकथित तपस्वी इस प्रकार बोला-  महायशस्वी श्री राम ! मेैं शूद्रयोनि में उत्पन्न हुआ हूं और सदेह स्वर्ग लोक में जाकर देवत्व प्राप्त करना चाहता हूं। इसीलिए ऐसा उग्र तप कर रहा हूं। ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम ! मैं झूठ नहीं बोलता। देवलोक पर विजय पाने की इच्छा से ही तपस्या में लगा हूं। आप मुझे शूद्र समझिए। मेरा नाम शम्बूक है।

वह इस प्रकार कह ही रहा था कि श्री रामचंद्र जी ने म्यान से चमचमाती हुई तलवार खींच ली और उसी से उसका सिर काट लिया। उस शूद्र का वध होते ही इंद्र और अग्नि सहित संपूर्ण देवता 'बहुत ठीक, बहुत ठीक' कहकर भगवान श्रीराम की बारंबार प्रशंसा करने लगे। उस समय उनके ऊपर सब ओर से वायु देवता द्वारा बिखेरे हुए दिव्य एवं परम सुगंधित पुष्पों की बड़ी भारी वर्षा होने लगी। वे सब देवता अत्यंत प्रसन्न होकर सत्य पराक्रमी श्रीराम से बोले- देव ! महामते ! आपने यह देवताओं का ही कार्य संपन्न किया है। शत्रु का दमन करने वाले रघुनंदन सौम्य श्री राम !  आपके इस सत्कर्म से ही यह शुद्र शरीर स्वर्ग लोक में नहीं जा सका। अतः आप जो वर चाहें मांग लें। 

देवताओं का यह वचन सुनकर सत्य पराक्रमी श्रीराम ने दोनों हाथ जोड़कर सहस्रनेत्रधारी देवराज इंद्र से कहा- यदि देवता मुझ पर प्रसन्न हैं, तो वह ब्राह्मण पुत्र जीवित हो जाए। यही मेरे लिए सबसे उत्तम और अभीष्ट वर है। देवता लोग मुझे यही वर दें। मेरे ही किसी अपराध से ब्राह्मण का वह इकलौता बालक असमय में ही काल के गाल में चला गया है। मैंने ब्राह्मण के सामने ने प्रतिज्ञा की है कि मैं आपके पुत्र को जीवित कर दूंगा। अतः आप लोगों का कल्याण हो, आप उस ब्राह्मण बालक को जीवित कर दें। मेरी बातों को झूठी न करें। 

श्री रघुनाथ जी की यह बात सुनकर विबुधशिरोमणि देवता उनसे प्रसन्नता पूर्वक बोले- ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम ! आप संतुष्ट हों। वह बालक आज जीवित हो गया और अपने भाई-बंधुओं से जा मिला। काकुत्स्थ ! आपने जिस मुहूर्त में शूद्र को धराशायी किया,  उसी मुहूर्त में वह बालक जी उठा है। नरश्रेष्ठ ! आपका कल्याण हो।"

निष्कर्ष 

इस संपूर्ण कहानी का ध्यानपूर्वक विश्लेषण करने पर और हिंदू धर्म का ध्यान पूर्वक विश्लेषण करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि श्रीराम ने शम्बूक को शूद्र होने के कारण ही मारा और उसका अपराध यह था कि शम्बूक शूद्र वर्ण का होकर तपस्या, वो भी हठयोग कर रहा था।

हिन्दू धर्म के अनुसार, शूद्र वर्ण को तपस्या करने का अधिकार नहीं है, फिर भी शम्बूक तपस्या कर रहा था, उसकी यही गलती थी, जो उसके वध का कारण हुई; क्योंकि राजा का कर्तव्य है कि धर्म का उल्लंघन करने वाले पापियों को दण्ड दे। 

तपस्या आदि कर्म बहुत शुद्धता से किए जाते हैं, और उसके लिए उपनयन संस्कार जरूरी है। शूद्रों का उपनयन संस्कार और अन्य जरूरी संस्कार नहीं हुआ होता, इसलिए उनको तपस्या कर्म से वंचित रखा गया है।

हिंदू धर्म में चारों वर्णों के अलग-अलग कार्य निश्चित है और हिंदू धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति इस बात को मानता है, भले ही हिंदू धर्म को न मानने वाले लोग इस बात का खंडन करते हैं और समानता की बात करते हैं। 

हिंदू धर्म के अनुसार, मानव जीवन का मूल उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना है और उसके लिए चारों वर्णों के अलग-अलग साधन निश्चित किए गए हैं, जिसमें से शूद्र को सेवा कर्म के द्वारा मोक्ष प्राप्त करने का अधिकारी बनाया गया है और शूद्र को तीनों वर्णों के पुण्य कर्मों का चौथाई फल भी मिलता है। और यही बात गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने भी बताया है कि "मनुष्य शास्त्रविधि से अपने कर्तव्यों को निभाता हुआ मोक्ष को प्राप्त करता है।" जब शूद्र को सेवा कर्म के द्वारा ही मोक्ष मिल जाता है, तो फिर शूद्र तपस्या क्यों करें ! 

हिंदू धर्म के अनुसार, तपस्या कर्म यदि शूद्र करता है, तो वह पाप है और राजा का कर्तव्य है कि पापियों को दंड दे; इसलिए श्रीराम ने शम्बूक को मारा और यह स्पष्ट कारण है, भले ही हिंदू धर्म का समर्थन करने वाले लोग यह कहें कि वह सदेह स्वर्ग जाना चाहता था, इसलिए श्रीराम ने शम्बूक को मारा, यह बात भी जायज है, क्योंकि त्रिशंकु भी सदेह स्वर्ग जाना चाहता था, जिसको इंद्र ने धकेल दिया और वह बीच में लटक गया। लेकिन वाल्मीकि रामायण की इस कहानी से स्पष्ट है कि श्री राम ने शम्बूक को शूद्र जाति के बावजूद तपस्या करने के अपराध के कारण ही मारा था और शम्बूक को मारकर श्रीराम ने धर्म का पालन ही किया।

 !! जय श्री राम !!


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