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पूजनीय कौन है ? ब्राह्मण या शूद्र अथवा अन्य ?

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पूजनीय कौन है ?

इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने से पहले हमें यह जानना चाहिए कि, पूजनीय शब्द का सही मतलब क्या है ?

पूजनीय शब्द पूजा से संबंधित है और इसका आशय होता है- सेवा या आदर विशेष से है।

 

हिन्दू धर्म (सनातन धर्म) के अनुसार; पूजनीय कौन है ?

चूंकि हिन्दू धर्म के अनुसार, ईश्वर, देवी - देवता आदि तो पूजनीय हैं ही। लेकिन हम इस लेख में ईश्वर और देवी - देवताओं के अलावा अन्य लोगों पर विचार-विमर्श करेंगे।

हम किसी की पूजा क्यों करते हैं ? हम किसी की पूजा या तो कुछ पाने के लिए करते हैं, या उससे कुछ पाए रहते हैं या पाते रहते हैं, तब करते हैं। जो पूजा करता है, वह पुजारी या पूजक या सेवक कहा जाता है और जिसकी पूजा की जाती है वह पूज्य, पूजनीय या स्वामी कहलाता है। 

पूजनीय कौन है ?

अब अगर हम इस दृष्टि से देखें तो, सेवक की भी कई श्रेणियां हैं तथा स्वामी या पूजनीय की भी कई श्रेणियां हैं। 

ईश्वर, देवी-देवता, माता-पिता, स्त्री के लिए उनका पति, गुरुजन तथा अन्य भी जैसे पशु-पक्षी, जीव-जंतु, वृक्ष तथा बहुत से लोग, जिनसे हम कुछ पाते हैं, पा रहे हैं या पाये रहते हैं; हम उनकी सेवा करते हैं या आदर देते हैं। सेवा करते समय भावना में कुछ अंतर अवश्य रहता है; जैसा पात्र - वैसी भावना। 

समाज में बहुत से लोग हैं, जो सेवा या आदर पाने के पात्र होते हैं। एक तरह से देखें तो इस संसार में बहुत से लोगों या चीजों से हमें कुछ न कुछ, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मिलता रहता है; अच्छा या बुरा। 

तो, जिससे हमें अच्छाई या अच्छी बात या अच्छी चीज मिल रही है, उसकी तो हमें सेवा या आदर करनी ही है, नहीं तो हम उसके ऋणी रह जाएंगे। हिंदू धर्म में यह मान्यता है कि जिससे हमें कुछ मिला है, मिलता है या मिल रहा है; उसके उपकार का बदला हमें चुकाना होगा, उसके कर्ज को भरना होगा, नहीं तो; यह कर्ज हमारे उद्धार या मुक्ति के मार्ग में बाधक होता है।

उपरोक्त बातों पर गौर करने पर हमें यह उत्तर आसानी से मिल जा रहा है कि ब्राह्मण पूजनीय है या शूद्र या और कोई ? अगर ब्राह्मण पूजा का पात्र है, तो अवश्य ही उसकी पूजा होगी। शूद्र भी यदि पूजा का पात्र है, तो उसकी भी पूजा और सम्मान होगी। इसी प्रकार से किसी भी जाति या वर्ण का व्यक्ति।

शूद्र कौन है, हिन्दू धर्म के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र कौन हैं ?

 ब्राह्मण के वे कौन से कर्म हैं, जिससे वह पूजा के अधिकारी हैं ?

हमारे देश में जब वर्ण व्यवस्था लागू थी, तब ब्राह्मण ही शिक्षक का कार्य करते थे। इस प्रकार ज्ञान को देने वाले ब्राह्मणों का आदर होता था। पूजा-पाठ, संस्कार या अनुष्ठान आदि कर्म ब्राह्मण तब भी करते थे और अब भी करते हैं; इससे भी वे आदर के पात्र हैं। ब्राह्मणों का जीवन बहुत ही तपस्या युक्त, कठोर और संयम युक्त होता है। इसमें थोड़ी भी ढिलाई करने पर वे अपने ब्राह्मणत्व से गिर जाते हैं। इसलिए तपस्या युक्त जीवन बिताने से ब्राह्मण तपोनिष्ठ और तेजयुक्त होते थे। इनके तेज व तप से राजा भी डरते थे। इस कारण से भी ब्राह्मण पूजा के पात्र होते हैं। इस प्रकार केवल वही ब्राह्मण आदर के पात्र हैं, जो अपने ब्राह्मण धर्म को निभा रहे हैं। और जो ब्राह्मण अपने ब्राह्मणत्व से गिर गए हैं, नीच कर्म कर रहे हैं; वे आदर - सम्मान या पूजा के पात्र बिल्कुल भी नहीं हैं। 

अब शूद्र पर आइए। शूद्र कौन है ? जन्म से तो सब शूद्र ही हैं, चाहे कोई भी वर्ण का क्यों न हो। वास्तव में, जन्म के बाद शास्त्रोक्त उचित कर्म संस्कार कराने से व्यक्ति अपने वर्ण को प्राप्त होता है। 

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को द्विज कहा जाता है। यदि ये तीनों लोग, संध्या वंदन कर्म नहीं करते हैं, तो शास्त्रों में इन्हें शूद्र माना गया है। 

शूद्र किसी कर्म से आदर के पात्र हैं ? शूद्र अपने सेवा कर्म से आदर के पात्र हैं। 

वैसे तो सभी वर्ण के लोग किसी न किसी प्रकार से देश व समाज की सेवा कर रहे हैं और सदा से करते रहे हैं। इसलिए सेवा कर्म करने वाले सभी व्यक्ति आदर के पात्र हैं, चाहे वह किसी भी वर्ण या जाति के क्यों ना हो। 

और जो व्यक्ति समाज के निर्माण में किसी प्रकार से योगदान नहीं कर रहे और समाज विनाशक का कार्य कर रहे हैं, वे आदर का पात्र कैसे हो सकते हैं ? वह तो स्वार्थी हैं, जो समाज के विनाशक होते हैं। 

समाज में हमें जिससे-जिससे जो कुछ मिल रहा है या मिला है, उसमें से कुछ के कर्म या उपकार का बदला या सेवा का बदला, तो हम चुका सकते हैं, लेकिन कुछ कार्य का बदला नहीं चुका सकते। उनके उस महान कार्य के बदले हमारा कार्य या सेवा या धन कुछ मायने नहीं रखता, जैसे माता-पिता व गुरुजनों का ऋण हम कभी नहीं भर सकते, केवल उनकी प्रसन्नता ही हमें उनके ऋण (कर्ज) से मुक्त कर सकती है। 

बहुत से लोग ऐसे होते हैं, जो हमारे ऊपर आए संकट से हमारी रक्षा करते कर देते हैं। उनको यदि बदले में कुछ दिया जाए तो वह वास्तव में कम ही है। ऐसे लोग भी विशेष आदर - सम्मान या पूजा के पात्र होते हैं, चाहे वह किसी वर्ण के क्यों न हों। 

भगवान या ईश्वर का सच्चा भक्त, चाहे वह किसी भी वर्ण के क्यों न हों; वे लोग संसार का कल्याण करते हैं, उनके पुण्य - प्रताप व भक्ति के कारण ही उस क्षेत्र के लोग और सभी लोग उनसे खुश रहते हैं। इसलिए भगवान का सच्चा भक्त, चाहे वह किसी भी वर्ण का हो, सदैव पूजनीय होता है।


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