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भारत में चिकित्सकीय क्षेत्र का बुरा हाल

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भारत में चिकित्सकीय क्षेत्र का बुरा हाल

प्रिय मित्रों ! इस लेख में हमने NEET (National Eligibility cum Entrance Test) UG के Exam के साथ - साथ, चिकित्सक (MBBS, MD, MS, BDS, BAMS, BHMS, BUMS etc.) बनने में होने वाली कठिनाई, चिकित्सकीय जीवन का वास्तविक और वर्तमान स्वरूप पर अपने विचारों को प्रदर्शित किया है।

डॉक्टर कौन बनना चाहता है ? जब आप इस प्रश्न का उत्तर खोजेंगे तो आपको अनेक भिन्न-भिन्न उत्तर मिलेंगे; जैसे- जो डॉक्टर बनने के योग्य होता है, जो चिकित्सकीय कार्य द्वारा समाज की सेवा करना चाहता है, जो स्वयं भी सुखी रहना चाहता है और समाज को भी सुखी की देखना चाहता है, आदि। 

Neet UG Exam


डॉक्टर बनने में अनेक फायदे हैं, इससे आप स्वयं सुखी रहते हैं, अपने परिवार को सुखी बनाते हैं, समाज को सुखी बनाते हैं, नाम कमाते हैं, यश कमाते हैं, पुण्य कमाते हैं, धन कमाते हैं, मान सम्मान भी पाते हैं और ईश्वर का दूसरा रूप भी बन जाते हैं। 


MBBS, MD, MS, BDS, BAMS आदि डाक्टरों की पोल:-

आज समय बदल चुका है। शायद मेरी बात किसी को बुरी लगे; लेकिन अब चिकित्सकीय (Doctor's) पेशा केवल धन कमाने के लिए रह गया है। अधिकांश डाक्टर बनने वालों और डाक्टरों की अच्छी भावनाएं समाप्त हो रही हैं। बहुत विरले डॉक्टर ही होंगे जिनमें अभी अच्छी भावनाएं हैं। अधिकांश बड़े बड़े डाक्टरों को तो हमने स्वयं देखा है जो रोगियों को केवल पाकेट का पैसा समझते हैं, रोगियों या मरीजों से अधिक से अधिक पैसा लूटने की फिराक में रहते हैं।

यह बुराई हमारे देश में क्यों फैल रही है ? क्योंकि केवल धन पर ही डाक्टरों की निगाहें हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि वह बहुत अधिक धन खर्च करके डाॅक्टरी (चिकित्सक या वैद्य) की पढ़ाई कर पा रहे हैं। 

अधिकांश बच्चे MBBS की पढ़ाई करना चाहते हैं, क्योंकि MBBS डॉक्टरों का महत्व समाज में अधिक है, उनकी मांग भी अधिक है।

MBBS डाक्टरों को रोगी लोग ज्यादा जानकार समझ कर उनके पास इलाज कराने जाते हैं, तो ये डॉक्टर लोग उन मरीजों से ऊंची फीस (कम से कम 300रूपये और अधिक से अधिक हजारों रूपये तक ) लेते हैं। ज्यादा पैसा कमाने के चक्कर में जरूरत से ज्यादा जांच लिखते हैं, उस जांच के लिए अपने निश्चित पैथोलॉजी पर ही भेजते हैं, दूसरे जगह पर कराई गई जांच को नहीं मानते हैं क्योंकि अलग अलग पैथोलॉजी पर डाक्टरों की सेटिंग होती है और वहां से उनको कमीशन मिलता है। 

डॉक्टरों को रोगों की पहचान पढ़ाई जाती है, चाहे तो बिना अधिक जांच कराए या कम जांच पर ही रोग की पहचान करके अच्छी दवा दे सकते हैं। लेकिन अधिकांश डाक्टर लोग ऐसा नहीं करते हैं, क्योंकि इससे उनको ज्यादा से ज्यादा कमाई नहीं हो पाएगी। दवा भी ज्यादा से ज्यादा और जरूरत से ज्यादा भी लिख देते हैं, जिससे कि मरीज का रोग ठीक होने की बजाय बढ़ जाता है। 

दवाओं का वास्तविक मूल्य उतना अधिक नहीं होता, जितना की उस पर लिखा होता है। अधिकांश दवाओं पर लिखा मूल्य, वास्तविक मूल्य से 10 गुना से 20 गुना अधिक लिखा होता है। अतः दवाओं के वास्तविक मूल्य से 10 गुना से 20 गुना अधिक दाम पर मरीजों या रोगियों को दवाइयां दी जाती हैं।

इस प्रकार से अधिकांश डाक्टर लोग;  फीस, अधिक जांच कमीशन से, दवा के मुनाफे से; तीनों से पैसा कमाने के चक्कर में रहते हैं। एक सामान्य रोग के इलाज में भी, ये डाक्टर लोग, एक बार में 1000 से ₹5000 तक का बिल बना देते हैं। इससे स्पष्ट है कि अमीर लोग ही इलाज करा पाएंगे, गरीबों के बस की बात नहीं है। अगर गरीब इलाज कराता है तो और भी कंगाल हो जाता है। 

जरा सोचिए -

एक गैर सरकारी, सामान्य MBBS डाक्टर प्रतिदिन लगभग 100 रोगियों का इलाज करता है, और उनमें से प्रत्येक से कम से कम 300रूपये फीस लेता है, और प्रत्येक को औसत 1000रूपये की दवा का बिल बनाता है, जिसमें से लगभग 300रूपये दवा का मूल्य काटकर लगभग 700रूपये दवा से कमाता है। 

फीस से,  100 × 300 = 30000 (तीस हजार)

दवा से, 100 × 700 = 70000 (सत्तर हजार)

अत: एक लाख रूपये प्रतिदिन की औसत बचत हो गयी। जांच का कमीशन तो छोड़ दो। हाॅस्पिटलों की बात करें तो एक एक मरीज से लगभग बहुत रूपये कमाते हैं, जो की वास्तव में नाजायज ही होता है।

डाक्टरी पढ़ाई के प्रत्येक स्तर पर, पढ़ाई के समय पढ़ाया जाता है कि गरीब - अमीर को पहचान करने की कोशिश करो और उसी के अनुसार उनका इलाज करो; अच्छा इलाज सभी का करो, लेकिन गरीब का कम दाम पर इलाज और अमीरों का इलाज अधिक दाम पर करो। और इसी लिए दवाओं पर लिखा मूल्य, वास्तविक मूल्य से 10 गुना से 20 गुना अधिक लिखा होता है क्योंकि गरीबों से दवा का मूल्य कम लिया जाए और अमीरों से दवा पर लिखा पूरा मूल्य, ताकि अमीरों में मानसिक दुर्भावना न उत्पन्न हो कि इतनी सस्ती दवा। 

लेकिन ये डॉक्टर लोग, पैसा के चक्कर में अपने धर्म को भूल जाते हैं और अमीर गरीब सभी रोगियों को वास्तविक मूल्य से 10 गुना से 20 गुना अधिक मूल्य पर इलाज करते हैं। 

बेचारे गरीब रोगी झोलाछाप या बिना डाॅक्टरी की पढ़ाई किए डॉक्टरों से इलाज कराने को मजबूर हो जाते हैं।

अतः स्पष्ट है कि अधिकांश डाक्टरों की मानसिकता जेबकतरों वाली है। ये लोग जल्द से जल्द अपना स्वयं का हाॅस्पिटल खोलने के चक्कर में चिकित्सकीय धर्म को छोड़कर या चिकित्सकीय धर्म को इग्नोर करते हुए रोगियों का इलाज करते हैं। अगर वास्तव में लूट - पाट देखा जाए तो आज डाक्टरी लाइन में या चिकित्सकीय क्षेत्र में सबसे अधिक लूट पाट व भ्रष्टाचार है।


क्या Neet UG Exam पर Ban लगना चाहिए ?

अगर सरकारी मेडिकल कालेजों को छोड़कर, प्राइवेट मेडिकल कालेजों की बात की जाए तो, डाक्टरों की कमाई देखकर डॉक्टरों को तैयार कराने वाले मेडिकल कॉलेज बहुत ही ऊंची फीस लेकर पढ़ाई कराते हैं। आप सोच सकते हैं कि प्राइवेट या मैनेजमेंट कोटा के तहत MBBS की पढ़ाई कराने वाले कालेजों में सबसे पहले ही कम से कम 20 लाख रूपये जमा करने होते हैं, और साथ साथ Neet UG उत्तीर्ण करना अनिवार्य है, और पूरी पढ़ाई में लगभग 1.5 करोड़ रूपये लग जाते हैं। और यही स्थिति लगभग प्राइवेट BDS, BAMS आदि काॅलेजों की भी है।

अमीर लोग तो अपने बच्चों को प्राइवेट मेडिकल काॅलेजों में भी पढ़ाकर डाक्टर बना देते हैं, लेकिन गरीबों के बच्चे डाक्टरी की पढ़ाई से वंचित रह जाते हैं। क्योंकि गरीबों के बच्चे मेडिकल की पढ़ाई Neet UG उत्तीर्ण करके केवल सरकारी काॅलेजों से ही कर सकते हैं। लेकिन इन सरकारी मेडिकल कॉलेजों की सीटों पर अधिकांशतः अमीरों के बच्चों का ही कब्जा हो जाता है, क्योंकि सरकारी मेडिकल काॅलेजों में दाखिला के लिए Neet UG परीक्षा में अधिक से अधिक अंक (Mark) लाना जरूरी होता है, क्योंकि NEET UG की परीक्षा में शामिल परीक्षार्थियों की संख्या के हिसाब से सरकारी मेडिकल काॅलेजों में सीटें बेहद कम हैं, और वे ही बच्चे NEET UG की परीक्षा में अधिक से अधिक अंक ला पाते हैं, जो बहुत टाॅप लेवल की पढ़ाई के साथ 2, 3 या 4 वर्षों तक अच्छी महंगी कोचिंग संस्थाओं में कोचिंग किए होते हैं। क्योंकि सरकारी मेडिकल काॅलेजों की सीटों को देखते हुए NEET UG की परीक्षा को कठिन बनाया जाता है। बहुत विरले ही गरीब बच्चे बिना कोचिंग किये, केवल सेल्फ स्टडी (self study) करके एक या दो बार में NEET UG की परीक्षा में अधिकाधिक अंक ला पाते हैं। 

ऐसा नहीं है कि गरीबों के बच्चों के पास दिमाग नहीं है ! गरीब बच्चों के पास दिमाग है, केवल पैसा नहीं है। जिससे वे भी अच्छी कोचिंग संस्थाओं में दाखिला ले सके। मेडिकल में एडमिशन के लिए NEET UG की परीक्षा इतनी कठिन बन गई है कि तीव्र बुद्धि वाले मेहनती छात्र भी बिना दूसरी तीसरी बार में सरकारी मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लेने के लायक अंक नहीं ला पाते हैं।

 NEET UG परीक्षा को कठिन क्यों बनाया गया है, जानते हैं ? डॉक्टरी की पढ़ाई इतनी कठिन नहीं है, जिसके लिए इतनी कठिन परीक्षा बनाया गया है। 

इसे जानबूझकर कठिन बनाया गया है, इसके दो कारण हैं-

पहला;  परीक्षा कराने वाली संस्था से लेकर सरकार के शिक्षा विभाग से संबंधित अधिकारी तक सब पैसा कमाने के चक्कर में लगे रहते हैं।

दूसरा;  देश में मेडिकल की सीटें कम है। 

जितनी सीटें हैं, उससे करीब 20 गुना बच्चे डॉक्टर बनने के लिए NEET UG का फार्म भरते हैं। लगभग आधा बच्चे पास होते हैं, उसमें भी अधिकांशत अमीर घर के बच्चे अधिकाधिक अंक लाकर शीर्ष पर रहते हैं। पास (उत्तीर्ण) बच्चों में से करीब 10% बच्चे, जो कि अमीर घरों के ही हैं, उनका एडमिशन सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हो पाता है। 

बाकी पास 90% बच्चों का मेडिकल की पढ़ाई का सपना, सपना ही रह जाता है। वे NEET UG में पास बच्चे, जिनको सरकारी कालेज नहीं  मिला, उसमें से कुछ तो विदेश में मेडिकल की पढ़ाई करने चले जाते हैं और कुछ बच्चे तैयारी करते करते उम्र ही गवा देते हैं और कुछ बच्चे तैयारी करना ही छोड़ देते हैं। 

इस समस्या का दोषी कौन है ? खैर दोषी कोई भी हो;  हमें तो समस्या का हल खोजना है ! 

सरकार चाहे तो इस समस्या को दूर कर सकती है। देश में जितनी मेडिकल की सीटें हैं, उससे लगभग 5 गुनी सीटें बढ़ाई जाए। इसके लिए अधिक से अधिक मेडिकल कॉलेज बनवाया जाए। वर्तमान में मेडिकल कालेजों में जो 100 से 150 सीटें हैं, उनको बढ़ाकर प्रत्येक मेंडिकल कालेज में 400 सीटें की जाए। तब हमारे देश के मेधावी बच्चे, अपने ही देश में मेडिकल की पढ़ाई कर लेंगे और गरीब व मध्यम वर्ग के मेधावी बच्चे भी डाक्टर बनने का सपना पूरा कर सकेंगे।

चिकित्सकीय क्षेत्र की स्थिति सुधारने का एक और उपाय -

प्रत्येक जिले में जनसंख्या के हिसाब से लगभग तीन- तीन MBBS, BDS, BAMS, BHMS आदि मेडिकल कॉलेज स्थापित किये जायें, जिसमें प्रत्येक में 400 सीटें हों। जिला स्तरीय या राज्य स्तरीय Medical Entrance Exam हो, और जिस राज्य का Exam हो, केवल उसी राज्य के बच्चों को मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिले, किसी अन्य राज्य के लड़के को नहीं।

तब हमारे देश में जो डॉक्टरों की कमी है, वह भी पूरी हो जाएगी और मानव धर्म के अनुसार, गरीबों अमीरों सभी का इलाज भी अच्छा से होने लगेगा।

आज डॉक्टर कम हैं और जो हैं, वह भी अधिक पैसा खर्च करके डाक्टर बने हैं, तो इनकी फीस अधिक है और पैसों के लालच में रोगियों का इलाज अधिक महंगे दाम पर करते हैं। जब डाक्टरों की संख्या पर्याप्त हो जाएंगी तो ये डाक्टर लोग लालच छोड़कर, मानवता से इलाज करेंगे।

आपके विचार से भारत में मेडिकल की स्थिति में कैसे सुधार हो सकता है ? कृपया comment  करके जरूर बताएं !

ॐ असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय ॥
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