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महात्मा बुद्ध का जन्म क्यों हुआ, बुद्ध का अवतार क्यों हुआ, गौतम बुद्ध कौन थे ?

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बुद्ध का अवतार क्यों हुआ ?

प्रिय पाठक ! महात्मा बुद्ध कौन थे ? यह बहुत ही विचित्र प्रश्न है, क्योंकि बौद्ध मत के अनुसार, सिद्धार्थ, महात्मा बुध के रूप में प्रचलित हुए और हिंदू धर्म के अनुसार भगवान विष्णु का माया मोह नामक अवतार बुद्ध कहलाता है। लेकिन सत्य तो यही है कि भगवान विष्णु का मायामोह नामक अवतार ही बुद्ध है और बौद्धों द्वारा जो सिद्धार्थ को महात्मा बुद्ध बतलाया जाता है, वह सरासर गलत और निराधार है। 


भगवान विष्णु के बौद्धावतार को आधार बनाकर हिन्दू धर्म विरोधियों ने बौद्ध धर्म का निर्माण कर दिया। आइए जानते हैं कि वास्तव में भगवान विष्णु जी का बौद्धावतार क्यों हुआ था ?

बुद्ध का अवतार क्यों हुआ


पूर्व काल की बात है, जब तारकामय नाम का एक संग्राम हुआ था । उसमें देवताओं ने दैत्यों को परास्त कर दिया। उस समय तारक दैत्य के ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली नाम के तीन पुत्र थे। उन्होंने कठोर नियमों का पालन करते हुए बड़ी भीषण तपस्या की और अपने शरीर को बिल्कुल सुखा दिया। उनके संयम, तप, नियम और समाधि से पितामह ब्रह्माजी प्रसन्न हो गये और उन्हें वर देने के लिये प्रकट हुए। उन तीनों दैत्यों ने सर्वलोकेश्वर श्रीब्रह्माजी को प्रणाम किया और और उनसे कहा- "पितामह ! आप हमें ऐसा वर दीजिये कि हम तीन नगरों में बैठकर इस सारी पृथ्वी पर आकाशमार्ग  से विचरते रहें। इस प्रकार एक हजार वर्ष बीतने पर हम एक जगह मिलें। उस समय जब हमारे तीनों पुर या नगर मिलकर एक हो जाए तो उस समय जो देवता उन्हें एक ही बाण से नष्ट कर सके, वही हमारी मृत्यु का कारण हो।" इसपर ब्रह्माजी ‘ऐसा ही हो’ यह कहकर अपने लोक को चले गये। 

ब्रह्माजी से ऐसा वर पाकर वे दैत्य बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने आपस में सलाह करके मय दानव के पास जाकर तीन नगर बनाने को कहा। मतिमान् दावनराज मय ने अपने तप के प्रभाव से तीन अद्भुत नगर तैयार किया। उनमें से एक सोने का, एक चाँदी का और एक लोहे का था। सोने का नगर स्वर्ग में, चाँदी का अंतरिक्ष में और लोहे का पृथ्वी पर रहा। ये तीनों ही नगर इच्छानुसार आ जा सकते थे। इनमें से प्रत्येक की लम्बाई-चौड़ाई सौ-सौ योजन थी। इनमें आपस में सटे हुए बड़े-बड़े भवन और खुली हुई सड़कें थीं तथा अनेकों  प्रासादों और राजद्वारों से इनकी बड़ी शोभा हो रही थी। इन नगरों के अलग-अलग राजा थे। सुवर्णमय नगर तारकाक्ष का था, रजतमय कमलाक्ष का और लोहमय नगर विद्युन्माली का था। 

इन तीनों दैत्यों ने अपने शस्त्र बल से तीनों लोकों को अपने काबू में कर लिया। इन दैत्यों के पास जहां तहां से करोड़ों दानव योद्धा आकर एकत्रित हो गये। इन तीनों पुरों में रहनेवाला जो भी जैसी इच्छा करता, उसकी उस कामना को मायासुर अपनी माया से उसी समय पूरी कर देता था। तारकाक्ष के हरि नाम का एक महाबली पुत्र था। उसने बड़ी कठोर तपस्या की। इससे ब्रह्माजी उसपर प्रसन्न हो गये। उन्हें संतुष्ट देखकर उसने यह वर मांगा कि हमारे नगर में ऐसी बावड़ी बन जाए कि जिसमें डालने पर शस्त्र से घायल हुए योद्धा और भी अधिक बलवान हो जाए। इस प्रकार ब्रह्माजी से वर पाकर तारकाक्ष के पुत्र हरि ने अपने नगर में एक मुर्दों को जीवित कर देने वाली बावड़ी बनवायी। दैत्य लोग जिस रूप और जिस वेष में मरते थे उस बावड़ी में डालने पर उसी रूप, उसी वेष में जीवित होकर निकल आते थे। इस प्रकार उस बावड़ी को पाकर वे सारे लोकों को कष्ट देने लगे तथा वैदिक मंत्रों की घोर तपस्या से सिद्धि पाकर वे देवताओं के भय की वृद्धि करने लगे। युद्ध में उनका किसी भी प्रकार नाश नहीं हो पाता था।

अब तो वे लोभ और मोह से अंधे होकर एकदम मतवाले हो गये‌। उन्होंने लज्जा को एक ओर रख दिया और सब ओर लूट-मार करने लगे। वरदान के मद में चूर होकर वे समय-समय पर जहां-तहां देवताओं को भगाकर स्वेच्छा से विचरने लगे। उन मर्यादाहीन दुष्ट दानवों ने देवताओं के प्रिय उद्यान और ऋषियों के पवित्र आश्रम को नष्ट-भ्रष्ट कर डाला। इस प्रकार जब सब लोक पीड़ित होने लगे तो मरुद्गण को साथ लेकर देवराज इन्द्र ने उन दैत्यों पर चढ़ाई कर दी और उन नगरों पर वे सब ओर वज्र प्रहार करने लगे। किंतु जब वे ब्रह्माजी के वर के प्रभाव से उन अभेद्य नगरों को तोड़ने में समर्थ न हुए तो भयभीत होकर अनेक देवताओं को साथ ले ब्रह्माजी के पास गये और उन्हें दैत्यों के द्वारा मिलने वाले अपने कष्टों का वृतांत सुनाया।

इस प्रकार सारा हाल सुनाकर उन्होंने प्रणाम करके ब्रह्माजी से उसके वध का उपाय पूछा। देवताओं की सब बातें सुनकर भगवान ब्रह्माजी ने कहा, ‘जो दैत्य तुम लोगों को दुख दे रहा है, वह तो मेरा अपराध करने में भी नहीं चूकता। इसमें संदेह नहीं, मैं सब प्राणियों के लिये समान हूं। परन्तु मेरा नियम है कि अधर्मियों का तो नाश ही करना चाहिये। इसके लिये उन तीनों नगरों को एक ही बाण से तोड़ना होगा। किन्तु इस काम को करने में श्री महादेव जी के सिवा कोई समर्थ नहीं हैं। इसलिए तुम सब उनके पास जाकर यह वर मांगो। वे अवश्य उन दैत्यों को मार डालेंगे।

ब्रह्माजी की यह बात सुनकर इन्द्रादि देवता उन्हीं के नेतृत्व में श्री महादेव जी की शरण में गये। भगवान शंकर अपने शरणागतों के भय के समय अभयदान करने वाले और सबके आत्मस्वरूप हैं। उनके पास जाकर वे सब देवता उनकी स्तुति करने लगे। तब उन्हें तेजोराशि पार्वतीपति श्री महादेव जी का दर्शन हुआ। सभी ने उन्हें प्रणाम किया और महादेव जी ने आशीर्वाद द्वारा सत्कार करके सबको उठाया। फिर वे मुस्कराते हुए कहने लगे, ‘कहो, कहो, तुम्हारी क्या इच्छा है ? भगवान की आज्ञा पाकर देवता लोग स्वस्थचित्त होकर कहने लगे, ‘देवाधिदेव ! आपको नमस्कार है। प्रजापति भी आपकी स्तुति करते हैं और सबने आपकी स्तुति भी की है; आप सभी की स्तुति के पात्र हैं और सभी आपकी स्तुति करते हैं। शम्भो ! हम सब आपको नमस्कार करते हैं। आप सबके आश्रय स्थान और सभी का संहार करने वाले हैं। ऐसे ब्रह्मस्वरूप आपको हम नमस्कार करते हैं। आप सभी के अधीश्वर और नियन्ता हैं तथा वनस्पति, मनुष्य, गौ और यज्ञों के पति हैं। देव ! हम मन, वाणी और कर्मों से आपके शरण हैं; आप हमपर कृपा कीजिए। 

तब भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर कहा, ‘देवगण ! भय को छोड़िये और बताइये, मैं आपका क्या काम करूं ? इस प्रकार जब महादेव जी देवता, ऋषि और पितृगण को अभयदान दिए, तो ब्रह्माजी ने उनका सत्कार करते हुए संसार के हित के लिए कहा, ‘सर्वेश्वर ! आपकी कृपा से इस प्रजापति के पद पर प्रतिष्ठित होकर मैंने दानवों को एक महान वर दे दिया था। उसके कारण उन्होंने सब प्रकार की मर्यादा तोड़ दी है। अब आपके सिवा उनका कोई संहार नहीं कर सकता। देवता लोग आपकी शरण में आकर यही प्रार्थना कर रहे हैं, सो, आप इनपर कृपा कीजिये। 

तब महादेव जी ने कहा, 'देवताओं ! मैं धनुष बाण धारण करके रथ में सवार हो संग्राम भूमि में तुम्हारे शत्रुओं का संहार अवश्य करूंगा। अतः तुम मेरे लिये एक ऐसा रथ और धनुष-बाण तलाश करो, जिनके द्वारा मैं इन नगरों को पृथ्वी पर गिरा सकूं।'  

परन्तु वे सभी असुर गण बड़े ही तपस्वी हैं। वे असुरगण वैदिक मार्ग का अनुसरण करते हुए बलवान बने हुए हैं। अतः सबसे पहले उन्हें वैदिक मार्ग से विमुख करना पड़ेगा। इस कार्य को सिर्फ भगवान विष्णुजी ही कर सकते हैं। 

तब, देवताओं के हित के लिए और अत्याचारियों के नाश के लिए, और असुरों को वैदिक मार्ग से विमुख करने के लिए भगवान विष्णुजी ने दैत्य जिन के पुत्र मायामोह बुद्ध का रुप धारण कर उन त्रिपुरों के अभेद्य पुरों में प्रवेश किया।

बुद्ध द्वारा असुरों को दिया गया उपदेश 

तदनन्तर मायामोह ने जाकर देखा कि असुरगण तपस्या में लगे हुए है। तब उस मयूरपिच्छधारी दिगम्बर और मुण्डितकेश मायामोह ने असुरों से अति मधुर वाणी में इस प्रकार कहा- हे असुरगण ! कहिये, आप लोग किस उद्देश्य से तपस्या कर रहे हैं, आपको किसी लौकिक फल की इच्छा है या पारलौकिक की ?

असुरगण बोले – हे महामते ! हम लोग तो सर्व विज्जयी हैं। अब हम लोगों ने पारलौकिक फल की कामना से तपस्या आरम्भ की है | इस विषय में तुमको हमसे क्या कहना है ?

मायामोह बोला - यदि आप लोगों को मुक्ति की इच्छा है, तो जैसा मैं कहता हूँ वैसा करो। आप लोग मुक्ति के खुले द्वार पर इस धर्म का आदर कीजिये। यह धर्म मुक्ति में परम उपयोगी है।  इससे श्रेष्ठ अन्य कोई धर्म नहीं है | इसका अनुष्ठान करने से आप लोग स्वर्ग अथवा मुक्ति जिसकी कामना करेंगे प्राप्त कर लेंगे। आप सब लोग बहुत बलवान हैं, अत: इस धर्म का आदर कीजिये।

इस प्रकार नाना प्रकार की युक्तियों से अतिरंजित वाक्यों द्वारा मायामोह ने दैत्यगण को वैदिक मार्ग से भ्रष्ट कर दिया। यह धर्मयुक्त हैं और यह धर्मविरुद्ध है, यह सत्य है और यह असत्य है, यह मुक्तिकारक है और इससे मुक्ति नहीं होती, यह आत्यन्तिक परमार्थ है और यह परमार्थ नहीं है और यह स्पष्ट ऐसा ही है, यह दिगम्बरों का धर्म है और यह साम्बरों का धर्म है। ऐसे अनेक प्रकार के अनंत वादों को दिखलाकर मायामोह ने उन दैत्यों को स्वधर्म से च्युत कर दिया। मायामोह ने दैत्यों से कहा था कि आप लोग इस महाधर्म को ‘अर्हत’ अर्थात् इसका आदर कीजिये | अत: उस धर्म का अवलम्बन करने से वे ‘आर्हत’ कहलाये।

मायामोह ने असुरगण क त्रयीधर्म (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद) से विमुख कर दिया। वे मोहग्रस्त हो गये; तथा पीछे उन्होंने अन्य दैत्यों को भी इसी धर्म में प्रवृत्त किया। उन्होंने दूसरे दैत्यों को, दूसरे ने तीसरे को, तीसरे ने चौथे को तथा उन्होंने औरों को इस धर्म में प्रवृत्त किया। इस प्रकार थोड़े ही दिनों में दैत्यगण ने वेदत्रयी का त्याग कर दिया।

तदनन्तर जितेन्द्रिय मायामोह ने रक्तवस्त्र धारणकर अनेक असुरों के पास जा उनसे मृदु, अल्प और मधुर शब्दों में कहा- ‘हे असुरगण ! यदि तुम लोगों को स्वर्ग अथवा मोक्ष की इच्छा है, तो पशु हिंसा आदि दुष्टकर्मों को त्यागकर बोध (ज्ञान) प्राप्त करो।

यह सम्पूर्ण जगत विज्ञानमाय है – ऐसा जानो। मेरे वाक्यों पर पूर्णतया ध्यान दो। इस विषय में बुधजनों का ऐसा ही मत है कि यह संसार अनाधार है, भ्रमजन्य पदार्थों की प्रतीति पर ही स्थिर है तथा रागादि दोषों से दूषित हैं। इस संसार संकट में जीव अत्यंत भटकता रहा है। इस प्रकार ‘बुध्यत (जानो), बुध्यर्ध्व (समझो) आदि शब्दों से बुद्ध धर्म का निर्देश कर मायामोह ने दैत्यों से उनका निजधर्म छुड़ा दिया। 

मायामोह ने ऐसे नाना प्रकार के युक्तियुक्त वाक्य कहे जिससे उन दैत्यगण ने त्रयीधर्म को त्याग दिया। उन दैत्यगण ने अन्य दैत्यों से तथा उन्होंने अन्य से ऐसे ही वाक्य कहे। इस प्रकार उन असुरों ने अपने परम धर्म को त्याग दिया। मोहकारी मायामोह ने और भी अनेकानेक दैत्यों को भिन्न-भिन्न प्रकार के विविध पाखंडों से मोहित कर दिया।

इस प्रकार थोड़े ही समय में मायामोह के द्वारा मोहित होकर असुरगणों ने वैदिक धर्म की बातचीत करना भी छोड़ दिया। उनमें से कोई वेदों की, कोई देवताओं की, तो कोई याज्ञिक क्रिया -कलापों की निंदा करने लगे। वे असुर गण कहने लगे कि, हिंसा में भी धर्म होता है – यह बात किसी प्रकार युक्तिसंगत नहीं है। अग्नि में हवि जलाने से फल  होगा –  यह भी बच्चों की सी बात है। अनेक यज्ञों के द्वारा देवत्व लाभ करके यदि इंद्र को शमी आदि काष्ठ का ही भोजन करना पड़ता है तो इससे तो पत्ते खानेवाला पशु ही अच्छा है। यदि किसी अन्य पुरुष के भोजन करने से भी किसी पुरुष की तृप्ति हो सकती है तो विदेश की यात्रा के समय खाद्य पदार्थ ले जाने का परिश्रम करने की क्या आवश्यकता है; पुत्रगण घर पर ही श्राद्ध कर दिया करें। अत: यह समझकर कि ‘यह (श्राद्धादि कर्मकांड) लोगों की अंध-श्रद्धा व अंधविश्वास ही है, इसके प्रति उपेक्षा करनी चाहिये और अपने श्रेय:साधन के लिये जो कुछ मैंने कहा है उसमें रुचि करनी चाहिये। हे असुरगण ! श्रुति आदि आप्तवाक्य कुछ आकाश में नहीं गिरा करते, हम, तुम और अन्य सभी को भी युक्तियुक्त वाक्यों को ग्रहण कर लेना चाहिये।

इस प्रकार अनेक युक्तियों से मायामोह ने दैत्यों को विचलित कर दिया, जिससे उनमें से किसी की भी वेदत्रयी में रुचि नहीं रही।
 

इस प्रकार दैत्यों के वैदिक मार्ग से विपरीत मार्ग में प्रवृत्त हो जाने पर देवगण पुन: भगवान शिव जी के यहां उपस्थित हुए।

देवताओं ने कहा- देवेश्वर ! असुर अब वैदिक मार्ग से विमुख हो चुके हैं। अब हम लोग तीनों लोकों के तत्वों को जहां-तहां से इकट्ठे करके आपके लिये एक तेजोमय रथ तैयार करेंगे। ऐसा कहकर उन्होंने विश्वकर्मा के रचे हुए एक विशाल रथ को महादेव जी के लिये तैयार किया। उन्होंने विष्णु, चन्द्रमा और अग्नि को बाण बनाया तथा बड़े बड़े नगरों से भरी हुई पर्वत, वन और द्वीपों से व्याप्त वसुन्धरा को ही उनका रथ बना दिया। इन्द्र, वरुण, यम और कुबेर आदि लोकपालों को घोड़े बनाया एवं मन को आधार भूमि बनाया। इस प्रकार जब वह श्रेष्ठ रथ तैयार हो गया तो महादेव जी ने उसमें अपने आयुध रखें।
ब्रह्मदण्ड, कालदण्ड, रुद्रदण्ड और ज्वर - ये सब ओर मुख किये उस रथ की रक्षा में नियुक्त हुए; अथर्वा और अंगिरा उनके चक्र रक्षक बने; ऋग्वेद, सामवेद और समस्त पुराण के उस रथ के आगे चलनेवाले योद्धा हुए; इतिहास और यजुर्वेद पृष्ठरक्षक बने तथा दिव्यवाणी और विद्याएं पार्श्वरक्षक बने। स्तोत्र तथा वषट्कार और ओंकार रथ के अग्रभाग में सुशोभित हुए। उन्होंने छहों ऋतुओं से सुशोभित संवत्सर को अपना धनुष बनाया तथा अपनी छाया को धनुष की अखंड प्रत्यंचा के स्थान में रखा। 

इस प्रकार रथ को तैयार देख वे कवच और धनुष धारण कर विष्णु, सोम और अग्नि से बने हुए दिव्य बाण को लेकर युद्ध के लिये तैयार हो गये। तब देवताओं ने सुगन्ध युक्त वायु को उनके लिए हवा करने को नियुक्त किया। तब महादेव जी समस्त युद्ध सज्जा से सुशोभित हो पृथ्वी को कंपायमान करते रथ पर सवार हुए। बड़े बड़े ऋषि, गन्धर्व, देवता और अप्सराओं के समूह उनकी स्तुति करने लगे। इस समय भगवान शंकर खड्ग, बाण और धनुष धारण करके बड़ी शोभा पा रहे थे। उन्होंने हंसकर कहा, ‘मेरा सारथी कौन बनेगा ?  देवताओं ने कहा, ‘देवेश्वर ! आप जिसे आज्ञा देंगे, वहीं आपका सारथी बन जाएगा, इसमें आप तनिक भी संदेह न करें।‘ तब भगवान शिव ने कहा, ‘तुम स्वयं ही विचार करके जो मुझसे श्रेष्ठ हो, उसे मेरा सारथी बना दो।,' यह सुनकर देवताओं ने पितामह ब्रह्माजी के पास जाकर उन्हें प्रसन्न करके कहा, ‘भगवन ! आपने हमसे पहले ही कहा था कि मैं तुम्हारा हित करूंगा, हो अपना वह वचन पूरा कीजिये। देव ! हमने जो रथ तैयार किया है, वह बड़ा ही दुर्धर्ष है; भगवान् शंकर उसके योद्धा नियुक्त किए गये हैं, पर्वतों के सहित पृथ्वी ही रथ है तथा नक्षत्रमाला ही उसका वरूथ है। किन्तु उसका कोई सारथी दिखाई नहीं देता।
सारथी इन सबकी अपेक्षा बढ़ चढ़कर होना चाहिये; क्योंकि रथ तो उसी के अधीन रहता है। हमारी दृष्टि में आपके सिवा और कोई भी इसका सारथी बनने योग्य नहीं है। आप सर्वगुण सम्पन्न और सब देवताओं में श्रेष्ठ हैं। अतः अब आप ही बैठकर घोड़ों की रास संभालिये।‘ ब्रह्माजी ने कहा- देवताओं ! तुम जो कुछ कहते हो, उसमें कोई बात झूठ नहीं है। अतः जिस समय भगवान शंकर युद्ध करेंगे, मैं अवश्य उनके घोड़े हांकूंगा।

तब देवताओं ने संपूर्ण लोक के स्रष्टा ब्रह्माजी को श्री महादेवजी का सारथी बनाया। जिस समय वे उस विश्र्ववन्द्य रथ पर बैठे, उसके घोड़ों ने पृथ्वी पर सिर टेककर उसे प्रणाम किया।
परम तेजस्वी भगवान ब्रह्मा उस रथ पर चढ़कर घोड़ों की रास और कोड़ा संभाला और श्री महादेव जी से कहा, ‘देवश्रेष्ठ ! रथ पर सवार होइये।‘
तब भगवान शंकर, विष्णु, सोम और अग्नि से उत्पन्न हुआ बाण लेकर अपने धनुष से शत्रुओं को कम्पायमान करते हुए रथ पर चढ़े। भगवान शिव रथ पर बैठकर अपने तेज से तीनों लोकों को देदीप्यमान करने लगे। उन्होंने इन्द्रादि देवताओं से कहा, ‘तुम लोग ऐसा संदेह मत करना कि यह बाण इन पुरों को नष्ट नहीं कर सकेगा; अब तुम इस बाण से इन असुरों का अन्त हुआ ही समझो।‘

देवताओं ने कहा, ‘आपका कथन बिलकुल ठीक है। अब इन दैत्यों का अंत हुआ ही समझना चाहिये। आपका कथन किसी प्रकार मिथ्या नहीं हो सकता।‘ इस प्रकार विचार करके देवता लोग बड़े प्रसन्न हुए। इसके बाद देवाधिदेव महादेवजी उस विशाल रथ पर चढ़कर सब देवताओं के साथ चले। उनके इस प्रकार कूच करने पर सारा संसार और देवता लोग प्रसन्न हो गये। ऋषिगण अनेक स्रोतों से उनकी स्तुति करने लगे और करोड़ों गन्धर्वगण तरह तरह के बाजे बजाने लगे।

अब भगवान् शंकर ने मुस्कराकर कहा, ‘प्रजापते ! चलिये, जिधर वे दैत्यगण है, उधर ही घोड़े बढ़ाइये।‘ तब ब्रह्माजी ने अपने मन और वायु के समान वेगवान घोड़ों को दैत्य और दानवों से रक्षित उन तीनों पुरों की ओर बढ़ाया।
इस समय नन्दीश्वर ने बड़ी भारी गर्जना की, जिससे सारी दिशाएं गूंज उठी। उनका यह भीषण नाद सुनकर तारकासुर के अनेक दैत्य नष्ट हो गये। उनके सिवा जो शेष रहे वे युद्ध के लिये उनके सामने आ गये। अब त्रिशूलपाणि भगवान शंकर ने क्रोध में भरकर अपने धनुष पर बाण चढ़ाकर उसे पाशुपतास्त्र से युक्त किया। फिर वे तीनों पुरों  के इकट्ठे होने का चिंतन करने लगे।
इस प्रकार जब वे धनुष चढ़ाकर तैयार हो गये तो उसी समय तीनों नगर मिलकर एक हो गये। उन्होंने तुरंत ही अपना दिव्य धनुष खींच कर उन पर वह त्रिलोकी का सारभूत बाण छोड़ा। उस बाण के छूटते ही तीनों पुर नष्ट हो कर गिर गये। उस समय बड़ा ही आर्तनाद हुआ।

महादेवजी ने उन असुरों को भस्म करके पश्चिम समुद्र में डाल दिया। इस प्रकार त्रिलोक हितकारी भगवान शिव ने कुपित होकर उस त्रिपुर का नाश किया और दैत्यों को निर्मूल कर दिया।
इस प्रकार त्रिपुर दैत्यों का नाश हो जाने पर समस्त देवता, ऋषि और लोक प्रफुल्लित हो गये तथा बड़े श्रेष्ठ वचनों से भगवान् शंकर की स्तुति करने लगे। फिर भगवान की आज्ञा पाकर ब्रह्मादि सभी देवगण सफल मनोरथ होकर अपने अपने स्थानों  को चले गये। इस तरह श्री महादेवजी ने समस्त लोकों का कल्याण किया था और इसीलिए भगवान शिव जी का एक नाम ' त्रिपुरारी ' पड़ा।

इसीलिए तुलसीदास जी ने लिखा है,

अतुलित महिमा बेद की, तुलसी किए बिचार।
जो निंदत निंदित भयो बिदित बुद्ध अवतार।। 

अर्थ- तुलसीदास जी कहते हैं कि वेदों की महिमा अतुलनीय है, जिसकी निंदा करने से स्वयं भगवान का बुद्धावतार भी निन्दित हो गया, यह सबको विदित है। भगवान बुद्ध ने वेदों के निंदा अधर्मी असुरों के नाश के लिए किया था। 

यह है महात्मा बुद्ध के जन्म या अवतार की असली कथा। 

स्रोत- महाभारत, हरिवंश पर्व, विष्णु पुराण, भागवत पुराण, गरुड़ पुराण, अग्निपुराण,  नारदीय पुराण, लिंगपुराण, पद्म पुराण, दोहावली। 

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