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बौद्ध धर्म का खंडन, बौद्ध धर्म की आलोचना, वास्तव में महात्मा बुद्ध कौन थे ?

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बौद्ध धर्म का खंडन

प्रिय पाठक ! इस लेख में हमने महात्मा बुद्ध या भगवान बुद्ध के वास्तविक स्वरूप, सत्ता व अस्तित्व पर विचार - विमर्श किया है कि वास्तव में बुद्ध कौन थे, और बौद्ध धर्म कहां तक सही है। आप से नम्र निवेदन है कि आप इस लेख को पहले सकारात्मक विचारधारा से पढ़े, समझे फिर सही या गलत का निर्णय करें। इस लेख का उद्देश्य केवल महात्मा बुद्ध की वास्तविकता पर विचार करना है, किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है।

👉  महात्मा बुद्ध का जन्म क्यों हुआ, बुद्ध का अवतार क्यों हुआ, गौतम बुद्ध कौन थे ?

बौद्ध धर्म का खंडन

वर्तमान में हिन्दू धर्म विरोधी लोग, नव–बौद्ध आंदोलन व बौद्ध धर्म के नाम पर भारत में दलित वर्ग व अशिक्षित हिन्दू (जिन्हें हिन्दू धर्म का ज्ञान न हो) को बाकी वर्गों के खिलाफ भड़का रहे हैं कि गौतम बुद्ध ने हिन्दू धर्म की कुरीतियों से परेशान होकर हिन्दू धर्म छोड़ा था। बौद्ध धर्म को मानने वाले कहते हैं कि बुद्ध जातिप्रथा के खिलाफ थे और ब्राह्मणवाद से तंग आ गए थे; आदि कई भड़काऊ बातें नव-बौद्ध आंदोलन वाले लोग जनता में फैला रहे हैं। ये लोग महात्मा बुद्ध का नाम ले लेकर कई हिन्दुओं को हिन्दू धर्म से अलग करके बौद्ध बना रहे हैं। इसलिए आज यह समझना और जानना अत्यंत आवश्यक हो गया है कि – वास्तव में महात्मा बुद्ध कौन थे ? क्या बुद्ध ने कभी हिन्दू धर्म त्यागा था ? क्या बुद्ध ने हिन्दू धर्म या सनातन वैदिक धर्म से परेशान होकर बुद्ध धर्म बनाया था ?

साथ साथ यह भी समझना आवश्यक है की यदि ऐसा नहीं था तो बौद्धवाद आखिर क्या है ? तथा यह किन लोगों के द्वारा फैलाया जा रहा है ? इन सभी प्रश्नों का जवाब ढूंढने का प्रयास इस लेख में किया गया है।

प्राचीन काल में भारत विस्तृत और अखंड सम प्रभुता वाला देश था, लेकिन समय के बदलते दौर के साथ भारत देश छोटा होता गया और भारत से टूटकर भिन्न भिन्न देशों की उत्पत्ति होती गयी। जिस प्रकार से संस्कृत समस्त भाषाओं की जननी है, उसी प्रकार से सृष्टि की उत्पत्ति के समय, मनुष्य को जीवन जीने की शिक्षा देने वाला केवल एक ही धर्म था - वैदिक या सनातन धर्म, जिसे आज हिन्दू धर्म भी कहा जाता है। चूंकि समाज में अनेक विचारधारा वाले व्यक्ति होते हैं; अतः जैसे जैसे समय गुजरता गया, वैसे वैसे अलग अलग विचारधारा वाले व्यक्तियों ने स्वच्छंदता से जीवन जीने के लिए अपनी इच्छाओं के अनुसार भिन्न भिन्न धर्मों का निर्माण करते गये। भारत सदियों से ज्ञान का भंडार रहा है तथा यहाँ हर प्रकार की विचारधारा, परंपरा तथा ज्ञान का स्वागत किया गया। कुछ लोगों का मानना है कि यहाँ अनेक मतों के लोग एक साथ सदियों से शांतिपूर्ण ढंग से रहते हुए आये हैं, परन्तु ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। अनेक मत या अनेक धर्म बन जाने पर उनमें सदैव आपसी संघर्ष होता रहा है।

ऐसा माना जाता है कि गौतम बुद्ध द्वारा बौद्ध धर्म का प्रवर्तन किया गया। बौद्ध मत के अनुसार, गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में लुम्बिनी (नेपाल) में हुआ था और उन्हें बोध गया में ज्ञान की प्राप्ति हुई, जिसके बाद महात्मा बुद्ध ने सारनाथ में प्रथम उपदेश दिया। उनका महापरिनिर्वाण (मृत्यु) 483 ईसा पूर्व कुशीनगर (भारत) में हुआ। उनकी मृत्यु के अगले पाँच शताब्दियों में, बौद्ध धर्म तेजी से पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैला और अगले दो हजार वर्षों में मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया में विस्तार किया। हीनयान और महायान बौद्ध धर्म में प्रमुख सम्प्रदाय हैं।

ऐसा कहा जाता है कि, महात्मा बुद्ध का जन्म लगभग ढाई हजार वर्ष पहले कपिलवस्तु के क्षत्रिय शाक्य वंशीय राजा शुद्धोदन के घर में हुआ था । इनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था। इनकी माता का नाम महामाया था तथा पुत्र-जन्म के सात दिन बाद ही माता की मृत्यु हो गयी थी। इनकी मौसी गौतमी ने बालक का लालन-पालन किया। बचपन में बालक की जन्मपत्री देखकर राज ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की थी कि बालक बड़ा होकर या तो चक्रवर्ती राजा बनेगा या सब कुछ छोड़ कर वन में तप करने चला जायेगा तथा तपस्या के उपरांत महान संत बनेगा। संत बनने की बात सुनकर राजा शुद्धोदन को बहुत चिंता हुई। उन्होंने महल में बालक के आमोद-प्रमोद के लिए सभी इंतजाम कर दिए तथा उसको किसी भी प्रकार के दुःख या ऐसी चीजों से हमेशा दूर रखा जिससे उन्हें कुछ सोचने पर मजबूर होना पड़े। बड़े होने पर राजा शुद्धोदन ने यशोधरा नामक एक खूबसूरत कन्या के साथ उनका विवाह करा दिया। इन्होंने एक पुत्र को भी जन्म दिया, जिसका नाम राहुल रखा गया। परंतु सभी प्रयत्नों के बाद भी सिद्धार्थ का मन गृहस्थी में नहीं रमा। एक दिन वह चन्ना के साथ रथ से नगर में भ्रमण के लिए निकले। रास्ते में उन्होंने रोगी, वृद्ध और मृतक को देखा, तो जीवन की सच्चाई का पता चला कि क्या मनुष्य की यही गति है, यह सोचकर वे बेचैन हो उठे। उन्होंने सोचा कि एक न एक दिन सभी को रोग आना है, सभी को वृद्ध होना है तथा सभी की मृत्यु होनी है, तो फिर यह सब धन, दौलत किस काम की है। उन्होंने सोचा यदि जीवन दुःख है तो सुख की तलाश करनी चाहिए। फिर इसके बाद एक रात, जब महल में सभी सो रहे थे, तब सिद्धार्थ चुपके से उठे और पत्नी एवं बच्चों को सोता छोड़ वन में चले गये। जब वे वन में गये तो उनकी आयु 25 वर्ष थी। वहां कठोर तप करते हुए उन्हें बोधि अर्थात् ज्ञान की प्राप्ति हुई। बाद में अपने व्याख्यानों में उन्होंने कहा कि संसार दुखों से भरा हुआ है। दुख का कारण इच्छा या तृष्णा है। इच्छाओं का त्याग कर देने से मनुष्य दुखों से छूट जाता है। उन्होंने लोगों को बताया कि सम्यक दृष्टि, सम्यक भाव, सम्यक भाषण, सम्यक व्यवहार, सम्यक निर्वाह, सत्य पालन, सत्यविचार और सत्य ध्यान से मनुष्य की तृष्णा मिट जाती है और वह सुखी रहता है। अपने पूरे जीवन काल में इन्होंने इसी बातों पर कई उपदेश दिए।

बौद्ध मत में जितनी भी कहानियां व दृष्टांत हैं, वे सब काल्पनिक व गढ़ी गयी हैं। इन कहानियों से कई प्रश्न उठते हैं-

1. क्या बुद्ध 25 वर्षों तक रोग, रोगी, वृद्ध या आयु अवस्था परिवर्तन, मृत्यु के बारे में नहीं जानते थे ?

2. क्या बुद्ध ने कभी हिन्दू धर्म त्यागा था ? 

3. क्या बुद्ध ने हिन्दू धर्म या सनातन वैदिक धर्म से परेशान होकर बुद्ध धर्म बनाया था ?

4. वास्तव में महात्मा बुद्ध कौन थे ?


क्या बुद्ध 25 वर्षों तक दुख, रोग, रोगी, वृद्ध या आयु अवस्था परिवर्तन और मृत्यु के बारे में नहीं जानते थे ?
बौद्ध धर्म और बौद्ध मत कहता है कि जब सिद्धार्थ 25 वर्ष की उम्र में चन्ना नामक व्यक्ति के साथ रथ से नगर घूमने निकले, तब रास्ते में रोगी, वृद्ध और मृतक को देखकर उनके मन में दुख हुआ और संसार से वैराग्य उत्पन्न हुआ, इससे पहले नहीं। जरा आप एक साधारण मनुष्य की तरह सोचिए कि, 

क्या राजमहल में सिद्धार्थ एक बंदी की तरह रहता था कि, नगर में भ्रमण करने से पहले, वह अनेक अवस्थाओं वाले व्यक्तियों को नहीं देखा।

क्या राजमहल में सिद्धार्थ की सेवा के लिए सभी सेवक सिद्धार्थ के उम्र के ही थे ?
 
क्या सिद्धार्थ अपने माता - पिता, राज दरबारी, सेवक गण या दास - दासी, अपने नाना - नानी, दादा - दादी आदि को देखकर यह न जान सके कि मनुष्य का भी अवस्था परिवर्तन भी होता है ?

जब सिद्धार्थ रात्रि में अपने परिवार (स्त्री, पुत्र राहुल, माता - पिता आदि) को छोड़कर वन में चले गये तो उनकी उम्र 25 वर्ष थी, और वे वन में तपस्या करने इसलिए गये क्योंकि उन्होंने नगर में भ्रमण करते समय रोगी, वृद्ध और मृतक को देखा था। जरा आप बताइये कि, 

क्या सिद्धार्थ के विवाह समारोह में अनेक अवस्थाओं वाले मनुष्य (बालकगण, गुरुजन, माता-पिता, रिश्तेदार, सेवकगण आदि) शामिल नहीं थे ? 

क्या सिद्धार्थ का विवाह एकांत में एकाएक उनके सामने प्रकट हुई लड़की से हुआ ? यह कैसे संभव है कि, नगर में भ्रमण करने से पहले सिद्धार्थ ने अनेक अवस्थाओं वाले लोगों को न देखा हो !
 
यह कैसे संभव है कि नगर में भ्रमण करने से पहले सिद्धार्थ ने रोग और रोगी या दुखी व्यक्ति अथवा दुख को न देखा हो! बौद्ध धर्म और बौद्ध मत में वर्णित कहानियों के अनुसार, जब सिद्धार्थ चन्ना के साथ रथ से नगर में भ्रमण के लिए निकले, तब वे रोगी व रोते हुए दुखी व्यक्ति और दुख को देखा, और तब तक उनका विवाह भी हो चुका था और उनका एक पुत्र (राहुल) भी था। अब आप ही बताइए कि, 
क्या सिद्धार्थ अपनी पत्नी के 9 माह के गर्भकाल की स्थिति और प्रसव पीड़ा के असह्य दुख से परिचित नहीं थे ?

क्या उनका पुत्र जन्म के बाद से कभी रोया ही नहीं, कि सिद्धार्थ किसी के रोने का कारण न जान सके; कि कोई व्यक्ति क्यों रोता है ? 

जब पुत्र का जन्म होता है तो, पुत्र के अच्छे स्वास्थ्य के लिए माता - पिता पुत्र को रोगों से ही बचाने की कोशिश करते हैं कि, पुत्र को कितना दूध पिलाया जाए, पुत्र को कैसे सुलाया जाए, पुत्र को मौसमी दुष्प्रभावों से कैसे बचाया जाए ताकि उसका स्वास्थ्य ठीक रहे। क्या सिद्धार्थ ने पिता का धर्म नहीं निभाया ? 

क्या सिद्धार्थ 25 वर्ष की आयु तक, मौसम परिवर्तन से होने वाले रोग (ज्वर, खांसी, सिरदर्द, पेचिस, दस्त, फोड़े - फुृंसी आदि) की चपेट में कभी नहीं आये, कि वे चन्ना के साथ नगर में भ्रमण करने से पहले रोग, रोगी व दुख को न जान सके ? 

क्या इन्हें, इनके पुत्र, स्त्री, माता-पिता को कोई रोग या पीड़ा हुआ ही नहीं कि ये रोग, रोगी व दुख को न जान सके ? क्या सिद्धार्थ 25 वर्ष की आयु तक वैद्य या चिकित्सक को न जान सके ?

सिद्धार्थ के विषय में बौद्धों में एक कहानी प्रचलित है कि,  बुद्ध जब छोटे थे तो एक दिन वे वन  में टहल रहे थे, तभी उनका चचेरा भाई देवदत्त ने अपने बाणों से एक हंस मार दिया। वह घायल हंस उड़ते हुए पास में स्थित सिद्धार्थ के गोंद में जा गिरा, और सिद्धार्थ ने हंस के कष्ट को जानकर, वह हंस देवदत्त को नहीं दिया। अब आप ही बताओ कि, सिद्धार्थ तो बचपन में ही दुख व कष्ट जानता था, तो फिर यह मिथ्या कहानियां क्यों ?

जरा आप एक मनुष्य की तरह सोचिए कि, बौद्ध धर्म और बौद्ध मत कहता है कि राज ज्योतिषी ने बालक की जन्मपत्री देखकर भविष्यवाणी की, कि बालक बड़ा होकर या तो चक्रवर्ती राजा बनेगा या सब कुछ छोड़ कर वन में तप करने चला जायेगा। संत बनने की बात सुनकर राजा शुद्धोदन को बहुत चिंता हुई और उन्होंने बालक को अपना उत्तराधिकारी बनाने के लिए प्रयास किया। चूंकि राजा शुद्धोदन हिन्दू धर्म (सनातन या वैदिक धर्म) में स्थित थे। तो राजा शुद्धोदन ने सिद्धार्थ को अपना उत्तराधिकारी बनाने के लिए प्रयास किस तरह किया ? क्या राजा शुद्धोदन ने सिद्धार्थ को कैदियों की भांति दुनिया से विरक्त रखा था।
क्या राजा शुद्धोदन ने सिद्धार्थ को राजधर्म की शिक्षा देने का प्रबन्ध नहीं किया ? 

राजधर्म में सब कार्य, कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना करने का तरीका, रोग, रोगी, युद्ध, दुख-सुख, जन्म-मरण, शारीरिक शिक्षा, न्याय शिक्षा, राजधर्म का पालन करते हुए भगवत् प्राप्ति आदि सभी ज्ञान सिखाये जाते हैं। लेकिन सिद्धार्थ इन सब चीज़ों से अनजान कैसे रह गया ? 

बौद्धों की रचना, ललितविस्तार में लिखा है कि, जब बुद्ध पढ़ने गये तो उन्हें सोने की कलम से चन्दन की तख्ती पर लिखना सिखाया गया। जरा आप सोचिए कि, जब शिक्षा व्यवस्था इतनी उच्च थी, तो फिर गौतम बुद्ध बनने वाला और सोने की कलम और चन्दन की तख्ती से पढ़ाई करने वाला राजमहल का सिद्धार्थ 25 वर्षों तक धार्मिक, सामाजिक, शारीरिक, राजनैतिक, रोगी, वृद्ध और मृत्यु के ज्ञान से वंचित कैसे रह गया ?  

इन सभी प्रश्नों पर विचार करने के बाद यह सिद्ध होता है कि बौद्ध धर्म की सभी कहानियां झूठी और मनगढ़ंत हैं, जिनका कोई अस्तित्व नहीं है। 

अगर बौद्धों व पश्चिमी नास्तिक विद्वानों द्वारा लिखा गया इस पूरे घटनाक्रम को सही माने तो भी, इस पूरे घटनाक्रम में कहीं भी जाती प्रथा या वर्ण व्यवस्था का उल्लेख नहीं है। बल्कि यह अवश्य सत्य है कि सिद्धार्थ के पिता ने उनके सामने कोई भी बुराई या दुःख की बात आने ही नहीं दी, तथा बुद्ध ने भ्रमण के दौरान रोगी , वृद्ध एवं मृत व्यक्तियों को देख कर अध्यात्म का रास्ता चुना था। इससे यह बात सिद्ध होती है के बुद्ध ने हिन्दू धर्म या सनातन संस्कृति के कारण या वर्ण व्यवस्था या जाति प्रथा के कारण अध्यात्म का रास्ता नहीं चुना था, ना ही एक धर्म से दूसरा धर्म बदला था। यह गलत तथ्य और मनगढ़ंत कहानियां हैं, जो विदेशी लेखकों जैसे शेल्डन पोलोक इत्यादि द्वारा फैलाये गए हैं। अतः आज के युग में नव-बौद्ध लेखकों तथा पश्चिमी लेखकों द्वारा फैलाया जा रहा भ्रम कि बुद्ध हिन्दू विरोधी तथा वर्ण व्यवस्था के विरोधी थे, यह पूरी तरह गलत तथा निराधार है। यह इन नव-बौद्ध तथा छद्म अम्बेडकर वादी लेखकों के मन की कोरी कल्पना है, जिसे इन्होंने स्वयं अपने अल्पज्ञान तथा शेल्डन पोलक जैसे पश्चिमी लेखकों के प्रभाव में, हिन्दू धर्म को कमजोर करने के लिए गढ़ा है।

बौद्ध धर्म मूर्ति पूजा का विरोधी है, फिर भी बौद्ध धर्म के अनुयायी बुद्ध की प्रतिमाओं का पूजन करते हैं और विश्व में सबसे अधिक मूर्तियां बुद्ध की ही हैं। इसका कारण यह है कि बुद्ध की अधिकांश प्राचीन मूर्तियां हिन्दू धर्म के देवी-देवताओं के साथ संलग्न हैं, क्योंकि बुद्ध हिन्दू धर्म से सम्बन्धित हैं और बुद्ध की कुछ मूर्तियां तब बनाई गयी, जब बुद्ध के नाम पर हिन्दू धर्म विरोधियों द्वारा बौद्ध धर्म को बनाया गया और जमकर प्रचार प्रसार किया गया। इसमें सहायता करने वाले अशोक जैसे राजा के साथ साथ अनेक हिन्दू विरोधी राजा लोग शामिल हो गये, और उनकी सहायता से बौद्धों ने अनेक हिन्दू मंदिरों को तोड़ा और अनेक मंदिरों से हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों को नष्ट करके बुद्ध की प्रतिमा लगा दी। बौद्धों के आतंक के अनेक साक्ष्य आज भी उपलब्ध हैं कि मंदिरों में बुद्ध की प्रतिमाओं के पास टूटी हुई शिवलिंग व भग्न हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं।

वास्तव में महात्मा बुद्ध कौन थे ?

वर्तमान में बौद्ध धर्म को मानने वाले या बौद्धों के अनुसार महात्मा बुद्ध का जो स्वरूप बताया जाता है, वह सरासर गलत है। हिन्दू धर्म से सम्बंधित शब्द 'बुद्ध' को उठाकर कुछ अलग विचारधारा वाले लोगों ने बौद्ध धर्म बना दिया।
 
बौद्ध धर्म के अनुयायी लोग कहते हैं कि हिन्दू धर्म ग्रंथों में बुद्ध का कोई उल्लेख नहीं है, जो कि बौद्धों की सबसे बड़ी भूल है। बुद्ध का उल्लेख हिन्दू धर्म के सभी प्रमुख पुराणों तथा सभी महत्वपूर्ण हिन्दू ग्रन्थों (रामायण व महाभारत) में हुआ है। नीचे उन कुछ पुराणों में बुद्ध के उल्लेख का सन्दर्भ दिया गया है-

हरिवंश पर्व (1.41)
विष्णु पुराण (3.18)
भागवत पुराण (1.3.24, 2.7.37, 11.4.23)
गरुड़ पुराण (1.1, 2.30.37, 3.15.26)
अग्निपुराण (16)
नारदीय पुराण (2.72)
लिंगपुराण (2.71)
पद्म पुराण (3.252)
इन ग्रन्थों में मुख्यतः बुद्ध की भूमिकाओं का वर्णन है- असुरों को वैदिक मार्ग से विमुख करने के लिये नास्तिक (अवैदिक) मत का प्रचार।

चलिए जानते हैं कि वास्तव में बुद्ध कौन थे-

भगवान विष्णु जी के 21वें अवतार को बुद्ध नाम से जाना जाता है। द्वापर के अन्त समय की बात है। त्रिपुरों के नाम से प्रसिद्ध तीन असुरों ने वेदों के बल से पूरी सृष्टि में हाहाकार मचा रखा था क्योंकि वेदों में सभी विद्याओं का ज्ञान निहित है। उन तीनों असुरों को वैदिक मार्ग से भ्रष्ट करने के लिए अधर्मियों के नाश का संकल्प करने वाले भगवान विष्णुजी ने बुद्ध का रूप धारण किया था।  भगवान विष्णु जी ने बुद्ध के रूप में उन तीनों असुरों को नास्तिक मत की शिक्षा दी और वेदों का खंडन करके उन सबको वैदिक मार्ग से भटकाया, ताकि ये लोग आध्यात्मिक शक्तियों से हीन हो सकें और इन सबका वध हो सके। जब त्रिपुरों ने वैदिक ज्ञान को त्याग दिया, तब उनका वध हो सका।

इसीलिए तुलसीदास जी ने लिखा है,

अतुलित महिमा बेद की, तुलसी किए बिचार।
जो निंदत निंदित भयो बिदित बुद्ध अवतार।। 

अर्थ- तुलसीदास जी कहते हैं कि वेदों की महिमा अतुलनीय है, जिसकी निंदा करने से स्वयं भगवान का बुद्धावतार भी निन्दित हो गया, यह सबको विदित है। भगवान बुद्ध ने वेदों के निंदा अधर्मी असुरों के नाश के लिए किया था।



बौद्ध धर्म में अंधविश्वास व कुरीतियां 

बुद्ध मत के समर्थक और नास्तिक अम्बेडकरवादी सनातन धर्म पर अंधविश्वास का आरोप लगाते हैं ,ओर खुद को सनातन धर्म से श्रेष्ठ बताते हैं और वेदों पर भी अंधविश्वास का आरोप लगाते है।

लेकिन बुद्धों में हीनयान, महायान नाम के मुख्य सम्प्रदाय है, जिनमें एक से बढ़कर एक विभिन्न तरह के अंधविश्वास , काल्पनिक बातें और आडम्बर मिलता है। इस मत में एक कहानी प्रचलित है-

एक समय की बात है कि मुर्रा नाम की एक भूतनी ने भेष बदल कर बुद्ध से प्रेम का इजहार किया, लेकिन बुद्ध ने मना कर दिया, उसने नृत्य, श्रृंगार, रूप आदि से बुद्ध को लुभाने की खूब कोशिश की लेकिन बुद्ध ने उसकी एक न मानी। तब क्रोधित मुर्रा भूतनी ने बुद्ध पर आक्रमण किया, लेकिन उसके सारे हमले निष्फल हो जाते है। फिर वो भूतनी अपने भूत प्रेतों के टोले के साथ आक्रमण करती है, लेकिन बुद्ध पर इन सभी कोई भी प्रभाव नहीं होता है और फिर सभी भूत और भूतनिया बुद्ध के आगे झुक जाती है और बुद्ध इन्हें मोक्ष प्रदान करते है। अब इस काल्पनिक कहानी से निम्न प्रश्न उठते है- क्या कोई आत्मा किसी के प्रति आकर्षित हो सकती है ?  क्या आत्मा, भूत आदि सम्भोग की इच्छा कर सकते है ? 

इसी तरह से इनके प्रेतवत्तु सूक्त के अनुसार, जब कोई व्यक्ति तपस्या करते भिक्षु को कंकड़ मारता है तो वो प्रेत बन जाता है। इसी सूक्त में एक और प्रेतनी का वर्णन है जो कि गंगा के पास पानी पीने जाती है और उसे नदी का पानी लहू दिखने लगता है। इस तरह की अनेक भूत पिशाचों से सम्बंधित अनायास बातें बुद्ध मत में मिलती हैं।        

बौद्ध भिक्षुओं के पास एक प्रार्थना चक्र होता है, जिसे ये लोग घुमाते रहते है। प्रार्थना चक्र के बारे में आप गूगल पर बुद्ध प्रेयर व्हील नाम से खोज कर देख सकते है। इस पर संस्कृत में लिखा होता है- ॐ मणि पद्मे हुम्। इनका मानना है कि चक्र को घुमाने से मन पवित्र होता है और पुण्य प्राप्त होता है तथा भूत प्रेत आदि नकारात्मक ऊर्जाएं दूर होती है। इस चक्र को घड़ी की दिशा में घुमाने से ध्यान अच्छी से लगता है और विपरीत दिशा में घुमाने से तंत्र में सफलता मिलती है। यदि कोई जानवर भी इसकी छाया से गुजरे तो उसे भी अध्यात्म की प्राप्ति होती है। अब ये बात आप खुद सोचें कि ये आडंबर नहीं है तो क्या है ? क्या इससे से भूत भाग सकते है ? क्या इससे अध्यात्मिक सुख की अनुभूति हो सकती है ? बौद्ध धर्म में पाखंड तो बहुत है लेकिन में गिनाना नहीं चाहता।


निष्कर्ष 

चूंकि हिन्दू धर्म (सनातन या वैदिक धर्म) सबसे प्राचीन, उत्तम, और सभी स्तर पर सभी प्रकार की शिक्षा/ज्ञान देने वाला सम्पूर्ण धर्म है, जिसमें हर प्रकार का ज्ञान निहित है। आप स्वयं सभी धर्मों का अध्ययन करके देख लीजिए, हिन्दू धर्म (सनातन या वैदिक धर्म) के अलावा जितने भी धर्म हैं, उन सब में अन्य धर्मों के प्रति द्वेष व ईर्ष्या की भावनाएं कूट कूट कर भरी हैं, लेकिन हिन्दू धर्म (सनातन या वैदिक धर्म) में किसी भी अन्य धर्मों के प्रति ईर्ष्या की एक भी बात नहीं है।

बौद्ध धर्म की सभी शिक्षाएं व बुद्ध के सभी उपदेश हिन्दू धर्म में पहले से उपस्थित हैं। बौद्ध धर्म, हिन्दू धर्म के कुछ सिद्धांतों को लेकर कुछ लोगों के द्वारा बनाया गया है और बौद्ध धर्म कोई धर्म नहीं, बल्कि एक व्यक्ति विशेष की एक निजी विचारधारा है।

बौद्ध धर्म में मनुष्य के जीवन जीने, सोने - जागने, भोजन करने, शादी-विवाह, जन्म-मरण, विद्याध्यायन, राजधर्म, सामाजिक धर्म, संस्कार आदि कोई भी नियम नहीं हैं ताकि कोई व्यक्ति बौद्ध धर्म के अनुसार एक मानव की तरह कुशलता से अपना जीवन यापन कर सके। 

आज वर्तमान में बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग या बौद्ध धर्म के अनुयायी खुद बौद्ध धर्म के चन्द नियमों (1. हिंसा न करना, 2. चोरी न करना, 3. व्यभिचार न करना, 4. झूठ न बोलना एवं  5. नशा न करना) का पालन नहीं करते, केवल नाम के ही बौद्ध बनते हैं। 99% बौद्धों को, जो अपने को बौद्ध बनते हैं, वे लोग मांस-मछली खाते हुए या मांसाहारीशराब पीते हुए देखे जाते हैं। बौद्ध लोग, बुद्ध के नाम पर केवल हिन्दू धर्म का खंडन करते हैं और भोले भाले हिन्दुओं को भड़काकर, लालच देकर उन्हें बौद्ध बनाते हैं। 

हिन्दू धर्म के अलावा सभी धर्म स्वच्छंदता से मनमाना जीवन यापन करने के लिए बनाये गये, जो कि वास्तव में अपूर्ण धर्म हैं और जीवन के हर क्षेत्र व स्तर पर जानकारी नहीं दे पाते हैं।

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