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पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।। का सही अर्थ

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 पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना

"पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना" यह चौपाई रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में 33 व 34वें दोहे के बीच दूसरी चौपाई है। यह चौपाई राक्षस कबन्ध व श्री रामचन्द्र के बीच वार्तालाप की स्थिति का वर्णन करता है।

इसका विरोध इतना अधिक किया जाता है कि वामपंथियों, छद्म नारीवादियों, हिन्दू विरोधियों व भ्रमित हिन्दुओं और कुछ नकारात्मक विचारधारा के लोगो द्वारा "पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।" नामक चौपाई को तोड़ मरोड़ कर "पूजहि बिप्र सकल गुण हीना। शूद्र न पूजहु वेद प्रवीणा।।" का रूप देकर तरह - तरह के भ्रामक लेख लिखे जाते हैं और भ्रामक विडियो बनाकर, तथा सम्मेलनों में गलत प्रकार से भाषण देकर रामचरितमानस की निंदा की जाती है, ताकि भोले-भाले हिन्दू लोग, हिन्दू धर्म से विमुख होकर बौद्ध आदि अन्य धर्मों को ग्रहण कर लें।

पूजहि बिप्र सकल गुण हीना। शूद्र न पूजहु वेद प्रवीणा।।

रामचरितमानस की चौपाई "पूजिअ बिप्र सील गुन हीनासूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।" की समीक्षा:-

बहुत महत्वपूर्ण बात ! रामचरितमानस की "ढोल गवांर सूद्र पसु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी" इस चौपाई के बाद "पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना" नामक चौपाई पर बहुत ही अधिक बहस और बवाल होते हैं और इस बहस में वे लोग भी शामिल हो जाते हैं जो रामचरितमानस को पूरा पढ़े भी नहीं है, सिर्फ सुन लिए और विरोध करने के लिए खड़े हो गये कि रामचरितमानस में जातिवाद भरा है। विशेषकर “सूद्र” एवं “नारी” शब्द को लेकर वामपंथियों, छद्म नारीवादियों, हिन्दू विरोधियों भ्रमित हिन्दुओं  द्वारा इसकी निंदा की जाती है। आइये इसे समझते हैं।

अरे ! इस पर बहस करने से पहले पूरी रामचरितमानस को पढ़ो, रामचरितमानस कब लिखा गया, इस पर क्या क्या बवाल हुआ ? इसके बारे में जानकारी एकत्रित करो, फिर बहस करो कि रामचरितमानस में यह गलत लिखा गया है। चलिए हम इस चौपाई की समीक्षा करते हैं और बताते हैं कि यह चौपाई गलत नहीं है, यह चौपाई सही है।

रामचरितमानस की रचना कब हुई :-

जब भारत पर मुगल शासक अकबर का शासन था, उस समय रामचरितमानस की रचना की गई। इस रामचरितमानस के रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास जी हैं, जो अनेक भाषाओं के जानकार और अयोध्या में ही रहकर उस समय की स्नातकोत्तर तक की पढ़ाई किए थे। इस महाकाव्य का निर्माण 76 साल की उम्र में इन्होंने किया था। रामचरितमानस भारतीय संस्कृति में एक विशेष स्थान रखता है और रामचरितमानस की लोकप्रियता अद्वितीय है।

रामचरितमानस पर विवाद :-

जब तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की रचना की, तो रामचरितमानस पर जमकर बवाल हुआ क्योंकि हिंदू धर्म के सभी ग्रंथ संस्कृत में थे और तुलसीदास जी ने इस ग्रंथ की रचना सरल और सुबोध अवधी भाषा में किया जिसमें संस्कृत, हिंदी और भारत के कई क्षेत्रों की भाषाएं सम्मिलित हैं। 

रामचरितमानस पर बवाल सिर्फ दो बातों को लेकर हुआ - 
पहला; यह संस्कृत भाषा में क्यों नहीं है ? 
दूसरा;  "ढोल गवांर सूद्र पसु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी" नामक चौपाई पर। 

लेकिन कुछ लोग समय के बदलते दौर के साथ "पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना" आदि कुछ चौपाइयों का खण्डन करके रामचरितमानस की निंदा किया करते हैं।

उस समय बवाल इतना अधिक बढ़ गया कि रामचरितमानस को फूंकने की नौबत आ गई या रामचरितमानस को जला देने की स्थिति उत्पन्न हो गई। अनेक हिंदू धर्म के विद्वान इसके पक्ष में भी थे और विपक्ष में भी विद्वानों की कमी नहीं थी। 

बहुत भारी धार्मिक पंचायत हुई, जिसमें यह निर्णय लिया गया कि यदि भगवान शंकर की सहमति इस ग्रंथ को मिले, तभी इस ग्रंथ को सही माना जाएगा अन्यथा गलत। इसके लिए श्री रामचरितमानस को वाराणसी में श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में सभी ग्रन्थों के नीचे रखा जाएगा और यह शर्त लगाई गई कि यदि सुबह यह ग्रंथ अपने आप सभी ग्रंथों के ऊपर रहेगा तभी इस ग्रंथ को सही माना जाएगा अन्यथा गलत माना जाएगा।
बिल्कुल ऐसा ही हुआ; रामचरितमानस को श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में सभी ग्रंथों के नीचे रखा गया और मुगल सैनिकों के कड़े पहरेदारी लगायी गयी और धर्मगुरुओं की देख रेख में, ताकि कोई रात्रि में मंदिर में प्रवेश न कर सके, कड़ी निगरानी रखी गयी। इसके पक्ष में जितने विद्वान थे उन्होंने भगवान हरि नाम कीर्तन करना प्रारंभ किया। 

जब रात्रि के 12:00 बजे या अर्धरात्रि हुई, तब मंदिर के सभी घंटे एकाएक जोर जोर से बजने लगे और जब सुबह दरवाजा खोला गया तो रामचरितमानस सभी ग्रंथों के ऊपर था और उस पर भगवान शिव के द्वारा सत्यम् शिवम् सुन्दरम् नाम से हस्ताक्षर भी हो गये थे। यह घटना सभी को दहलाकर रख दी और शासक अकबर भी विचलित हो गए। तब जाकर के इस ग्रंथ को महत्ता मिली। 


अब बात करते हैं, चौपाई "पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना" की समीक्षा पर-

"पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना" यह चौपाई रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में 33 व 34वें दोहे के बीच दूसरी चौपाई है। यह चौपाई राक्षस कबन्ध व श्री रामचन्द्र के बीच वार्तालाप की स्थिति का वर्णन करता है। पूरा अंश इस प्रकार है-

संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन।।
आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता।।
दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा।।
सुनु गंधर्ब कहउँ मै तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही।।

दो0- मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव।
मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव।।33।।

सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता।।
पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।
कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा।।
रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई।।
 ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा।। 
 सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए।।
 सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला।। 
 स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई।।
 प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।। 
 सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे।।

दो0- कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि। 
 प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि।।34।।


दरअसल रामचरित मानस की इन कुछ चौपाइयों के सहारे वामपंथियों, छद्म नारीवादियों, हिन्दू विरोधियों  भ्रमित हिन्दुओं और कुछ नकारात्मक विचारधारा के लोगो द्वारा आजकल सोशल मीडिया पर व भाषणों और सम्मेलनों के द्वारा नवयुवकों व कुछ हिन्दुओं को भ्रमित किया जाता है व श्री रामचरितमानस का दुष्प्रचार किया जाता है। 

विरोध इतना अधिक किया जाता है कि वामपंथियों, छद्म नारीवादियों, हिन्दू विरोधियों व भ्रमित हिन्दुओं और कुछ नकारात्मक विचारधारा के लोगो द्वारा "पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।" नामक चौपाई को तोड़ मरोड़ कर "पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न पूजिअ वेद प्रबीना।। और पूजहि बिप्र सकल गुण हीना। शूद्र न पूजहु वेद प्रवीणा।।" का रूप दे देकर तरह - तरह के भ्रामक लेख लिखे जाते हैं और भ्रामक विडियो बनाकर, तथा सम्मेलनों में गलत प्रकार से भाषण देकर रामचरितमानस की निंदा की जाती है, ताकि भोले-भाले हिन्दू लोग, हिन्दू धर्म से विमुख होकर बौद्ध आदि अन्य धर्मों को ग्रहण कर लें।

आइये इसके सही अर्थ को विस्तार से समझने का प्रयत्न करते हैं-

चूंकि हर चौपाई का संबंध अपनी अगली व पिछली चौपाई से रहता है । श्रीरामचरितमानस की किसी भी चौपाई का भाव समझने के लिए उसके ऊपर नीचे की चौपाई को भी देखना/समझना चाहिए तथा सम्बन्धित चौपाई किस प्रसंग में और क्यों आया है; यह भी जानना नितांत आवश्यक है।

इस चौपाई (पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।) का संबंध भी पिछली चौपाई व राक्षस कबंध से है । हालांकि रामचरितमानस में कबंध राक्षस के बारे में कम विवरण है, अपितु महर्षि वाल्मीकि जी कृत रामायण में विस्तृत विवरण है।

सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता।। पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।

दअरसल कबंध राक्षस द्वारा ऋषियों को परेशान करने के कारण  पूर्व जन्म में दुर्वासा ऋषि ने क्रोधित होकर श्राप दिया था । इसलिए यहाँ कबंध राक्षस श्राप व ऋषि दुर्वासा के क्रोध के कारण प्रभु श्री राम से ऋषि दुर्वासा के बारे में बता रहा है।

कबंध राक्षस श्री राम चन्द्र जी से कह रहा है कि मैं इस राक्षस शरीर से पहले गन्धर्व था, लेकिन एक गलती के कारण मुझे दुर्वासा ऋषि ने श्राप देकर राक्षस बना दिया था, जो कि आज आपके दर्शन से दूर हो गया।

तब श्री राम चन्द्र जी कह रहे हैं कि, हे गन्धर्व ! मैं तुमसे कहता हूॅं, सनो- मुझे ब्रह्म कुल द्रोही नहीं सुहाता।

सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता।।इस चौपाई से अभिप्राय है कि, श्री राम चन्द्र जी ने कहा कि सापत अर्थात्‌ श्राप देता हुआ, ताड़त अर्थात्‌ डांटता-फटकारता हुआ और परूष अर्थात् कठोर वचन कहता हुआ ब्राह्मण भी पूज्य है; ऐसा संत कहते हैं।  

पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।। , इस चौपाई का प्रत्येक शब्द गंभीर विचार के योग्य है, और जिनको हिन्दू धर्म का पूर्ण रूप से ज्ञान नहीं है, वे लोग इस चौपाई का गलत अर्थ निकालते हैं। 

पूजिअ बिप्र सील गुन हीना।; इन चौपाइयों में बिप्र शब्द का जो प्रयोग हुआ है, वह उस ब्राह्मण के लिए प्रयोग हुआ है, जो तपस्वी है। और सील गुन शब्द का जो प्रयोग हुआ है, उसका तात्पर्य शील अर्थात्‌ मृदुलता या कोमलता वाले गुण से है। अर्थात् यदि तपस्वी ब्राह्मण का स्वभाव कठोर है या उसमें कोमलता नहीं है तो भी वह पूजनीय है।

सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।; इस भाग का सही अर्थ निकालने के लिए आपको इसको दो भागों में तोड़ना पड़ेगा ! 'सूद्र न गुन' अर्थात्‌ इन्हें शूद्र (सेवा कर्म करने वाला, तपस्या से हीन) मत समझ; 'गन ग्यान प्रबीना' अर्थात्‌ इन्हें ज्ञान में प्रवीण मान या ज्ञानी समझ। 'गन' का अर्थ- गीनो या मानो।  'न गुन' का अर्थ- मत समझ।

इस वाक्य के पीछे श्री रामचन्द्र जी का अभिप्राय था, कि दुर्वासा जी के अवगुण (क्रोध) तो तू देख रहा है, लेकिन इनके जीवन में जो तप, त्याग, गुण और विशेषताएँ हैं; उनके ऊपर तुम्हारी दृष्टि नहीं जाती। 

अर्थात् दुर्वासा जी जैसा बिप्र भी पूजनीय है, क्योंकि संत जन भी उनकी महिमा को भलीभाँति जानते हैं कि दुर्वासा जी रुद्रांश हैं। 'क्षणे रुष्टा: क्षणे तुष्टा: रुष्टा तुष्टा क्षणे-क्षणे' जिनका स्वभाव है, लेकिन उनमें तपोबल व ज्ञान भी तो है । जिसमें 'सील गुन' अर्थात्‌ शील वाला गुण (कोमलता) नहीं है; तो क्या इन्हें शूद्र मान लिया जाए ? नहीं..! इनमें कोमलता नहीं है तो क्या हुआ, ये ज्ञान में तो प्रवीण हैं।

श्रीरामजी कबंध से मिलने के पश्चात सीधे माँ शबरी (जो कि गैर ब्राह्मण, या भील जाति की हैं) के आश्रम पहुँचते है और माँ शबरी के प्रति प्रेम व आदर तो सर्वजगत को विदित है। श्रीराम चन्द्र जी खुद शबरी के हाथों से दिये गये कन्द-मूल, फल, बेर आदि बहुत प्रेम से खाते हैं और शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश देते हैं।



अब आपको यह भी समझ लेना चाहिये कि हिन्दू धर्म के अनुसार बिप्र और द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) तथा शूद्र कौन है ?

हिन्दू धर्म के अनुसार, समाज को सुचारु रूप से कार्यशील रखने के लिए वर्ण व्यवस्था का निर्माण ईश्वर द्वारा सृष्टी के आरम्भ के समय ही किया गया। हिन्दू धर्म के अनुसार, जाति का निर्धारण जन्म के द्वारा ही होता है; लेकिन हिन्दू धर्म यह भी कहता है कि कोई मनुष्य कर्म करके श्रेष्ठ जाति की पदवी पा सकता है या अपनी जाति की पदवी खो कर अधम मनुष्य का दर्जा प्राप्त कर सकता है।

'चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः'(गीताः४।१३)

भगवान श्रीकृष्ण का ये कथन है कि गुण और कर्म के आधार पर ही मैंने चारों वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की सृष्टि की है। और संभवतः इसी कारण क्षत्रिय कुलोद्भव विश्वामित्र अपने कर्म से ब्राह्मण (ब्रह्मर्षि--ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति) हुए और ब्राह्मण कुल में अवतरित होकर भी भगवान परशुराम कर्म से क्षत्रिय।

यास्क मुनि के अनुसार- 

जन्मना जायते शूद्रः - जन्म से सभी शूद्र हैं।

संस्कारात् भवेत द्विजः - संस्कार से द्विज बनते हैं।

ब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः;  सबसे श्रेष्ठ स्थिति, जो ब्रह्म को जान गया, वही 'ब्राह्मण' है। 

वेद पाठात् भवेत विप्रः - वेदपाठी विप्र कहलाते हैं। ये सब एक स्थिति विशेष के नाम हैं।

ब्राह्मण जाति में जन्म लेने से कोई ब्राह्मण तब तक नहीं माना जाएगा, जब तक की उसका अन्य संस्कार और उपनयन संस्कार न हुआ हो, और वह उपनयन संस्कार के होने पर भी ब्राह्मणोचित कर्म न करता हो। यदि वह उपनयन संस्कार से युक्त है और ब्राह्मणोचित कर्म (प्रतिदिन तीनों समय संध्या वंदन, सदाचारी, शाकाहारी, भगवत प्रेमी, वेद पठन-पाठन, तपस्या आदि कर्म) कर रहा है, तभी वह ब्राह्मण कहलाता है, वरना हिन्दू धर्म उसे ब्राह्मण नहीं मानता। जिस दिन ब्राह्मण जाति में जन्मा व्यक्ति ब्राह्मणोचित कर्म को छोड़ देगा, उस दिन से वह धर्म के अनुसार अधम मनुष्य या अपने कर्म के अनुसार जाति का दर्जा प्राप्त कर लेता है।

इसी प्रकार से क्षत्रिय जाति या कुल में जन्म लेने वाला, तब तक क्षत्रिय नहीं कहलाएगा, जब तक कि उसका अन्य संस्कारों के साथ उपनयन संस्कार न हुआ हो, और उपनयन संस्कार होने के बाद भी वह क्षत्रियोचित कर्म न करता हो।

इसी प्रकार से वैश्य जाति या कुल में जन्म लेने वाला, तब तक वैश्य नहीं कहलाएगा, जब तक कि उसका अन्य संस्कारों के साथ उपनयन संस्कार न हुआ हो, और उपनयन संस्कार होने के बाद भी वह वैश्योचित कर्म न करता हो।

केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य के जाति में जन्म ले लेने से वह उस जाति का नहीं हो जाएगा, जब तक की वह उपनयन संस्कार के साथ अपने कर्म को न करता हो।

कुछ अति उत्साही ब्राह्मण लोगों द्वारा भी आजकल इस चौपाई का सहारा लेकर स्वयं का महिमा मंडन किया जाता है, जैसे  कि अपराध करने पर भी ब्राह्मण महान है , जबकि वे ब्राह्मण खुद अपना शास्त्रोक्त कर्म छोड़कर ब्राह्मणत्व से गिर चुके हैं, क्योंकि वे लोग उपनयन संस्कार से हीन होकर और कुछ लोग उपनयन संस्कार के साथ ही मांस मदिरा का सेवन कर रहे हैं और विलासी हो गये हैं और सनातन धर्म जिन कर्मों को करने से मना कर रहा है, वही कर्म कर रहे हैं ।

खर, दूषण, कुम्भकर्ण व स्वयं रावण भी ब्राह्मण ही था, जिसका प्रभु श्री राम ने वध किया। प्राचीन समय में जिस वर्ग के व्यक्ति ने भी गलत कर्म किया, उसको दंड मिला। ऋषि मांडव्य को राजा ने चोर समझकर सूली पर चढ़ा दिया था, जबकि राजा जानते थे कि यह ब्राह्मण हैं। अपराधी अपराधी होता है, भले वह कोई भी हो।

अब आपको यह भी समझ लेना चाहिये कि हिन्दू धर्म के अनुसार शूद्र कौन है ?

यास्क मुनि के अनुसार-

जन्मना जायते शूद्रः - जन्म से सभी शूद्र हैं। 

और जब तक उनका द्विज जातियों के लिए उपनयन संस्कार नहीं हुआ, तब तक वे शूद्र ही हैं। 


महर्षि रैक्व ने क्षत्रिय राजा जानश्रुति को 'शूद्र' इसलिए कहा था क्योंकि राजा जानश्रुति धन के अभिमान से गर्वित था और प्रतिष्ठा के लिए शोकातुर होकर महर्षि रैक्व से ब्रह्म विद्या का उपदेश चाहता था। राजा जानश्रुति, महर्षि रैक्व से ब्रह्म विद्या का ज्ञान पाने के लिए, महर्षि रैक्व के पास बारी - बारी से चार बार धन-संपदा लेकर आया और महर्षि रैक्व को धन से प्रलोभित करना चाहा। इसलिए  महर्षि रैक्व ने उस राजा को शूद्र कहकर संबोधित किया।

"शूद्र" शब्द का असली अर्थ - "सेवा कर्म करने वाला, उपनयन संस्कार हीन, तपस्या से हीन और मनोविकारों (काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, आलस्य आदि) को वश में न रख सकने वाला" होता है। 

लेकिन आज वर्तमान में "शूद्र" शब्द को इतना निंदनीय बना दिया गया है कि हिन्दू धर्म के अनुसार जो जातियाँ "शूद्र" वर्ग में आती हैं, वे "शूद्र" शब्द से घृणा करने लगी हैं, जो उनका भ्रम है। 

"शूद्र" वर्ग में अनेक जातियां होती हैं, जिसमें से कुछ नीच और कुछ अति नीच जातियां भी होती है। ऐसा नहीं है कि उन जातियों में अच्छे लोग नहीं होते, जो अच्छे लोग होते हैं उन्हें अच्छा कार्य करने की छूट होती है। हिंदू धर्म में जाति का निर्धारण कर्म के आधार पर भी होता है। 
ऐसा नहीं है कि किसी को अति नीच कार्य करने के लिए विवश किया जाता है, जिसकी जो मानसिकता होती है, जिसको जो कार्य अच्छा लगता है वह उस कार्य को करता है। आज आप अपने समाज में ही देख लीजिए; कुछ लोग अपने मन के मुताबिक कार्य करते हैं, जिसमें से कुछ लोग अच्छे कार्य करते हैं तो कुछ लोग नीच कार्यों में लिप्त रहते हैं और आप उन्हें मना भी नहीं कर सकते! 

आप सिर की समानता पैरों से नहीं कर सकते; ना ही पेट की समानता हाथों से कर सकते हैं; अथवा आप सिर की समानता पैरों, हाथ और पेट से नहीं कर सकते हैं; ना ही पेट की समानता सिर, पैरों या हाथों से कर सकते हैं। लेकिन इनके बिना एक-दूसरे का अस्तित्व भी नहीं है। सभी के अपने अलग-अलग कार्य हैं; ठीक वैसे ही समाज में जाति व्यवस्था भी समाज को सुचारु रूप से कार्यशील रखने के लिए बनाई गई।

दलितों (चमारों इत्यादि) को 'दलित' नाम हिन्दू धर्म ने नहीं दिया है, इससे पहले 'हरिजन' नाम भी हिन्दू धर्म के किसी शास्त्र ने नहीं दिया, हरिजन नाम गांधी जी ने दिया। सवर्ण नाम भी हिन्दू धर्म ने नहीं दिया। आज जो नाम दिए गए हैं, वह पिछले 74 वर्षों की राजनीतिक उपज है और इससे पहले जो नाम दिए गए थे वह पिछले 900 साल की गुलामी की उपज थे।

बहुत से ऐसे ब्राह्मण हैं जो आज दलित हैं, मुसलमान हैं, ईसाई हैं या अब वह बौद्ध हैं। बहुत से ऐसे दलित हैं जो आज ब्राह्मण समाज का हिस्सा हैं। अब कुछ वर्षों से ऊंची जाति के लोगों को सवर्ण कहा जाने लगा हैं। यह सवर्ण नाम भी हिन्दू धर्म ने नहीं दिया बल्कि कुटिल राजनैतिक लोगों ने दिया।

ब्राह्मण होना बहुत बड़ी बात नहीं है, क्योंकि हिंदू धर्म में ब्राह्मण के जो कर्म बतलाए गए हैं वह बहुत ही कठिन है। आज भले ही ब्राह्मण उन कर्मों को न करता हो, ब्राह्मण के कर्मों में सुबह दोपहर शाम संध्या वंदन करना व मंत्रों को जागृत करना इत्यादि प्रमुख है, जो कि बहुत ही कठिन कार्य होता है।

 और शूद्र होना बहुत दुख की बात नहीं है, क्योंकि शूद्र को हिंदू धर्म में बहुत ही कम और आसान कर्म करने के लिए बतलाए गए हैं। इसी प्रकार क्षत्रिय धर्म और वैश्य धर्म भी अनुपम है।

हमारे हिंदू धर्म शास्त्र में कर्मों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है- उत्तम (सात्विक कर्म), मध्यम (राजसी कर्म), और नीच कर्म (तामसी कर्म) । हिंदू धर्म ना ही किसी को उत्तम कर्म करने से रोकता है और ना ही किसी को नीच कर्म करने के लिए प्रेरित करता है। 

कुछ लोगों की अपनी स्वयं की नीच प्रकृति होती है और वह नीच कर्म ही करते रहते हैं। समाज में कुछ लोग होते हैं जो घृणित कर्म करते हैं और वह भी अपनी इच्छा से करते हैं, वह चाहकर भी स्वच्छता व पवित्रता नहीं रख सकते। सदैव बुरे कर्मों में लिप्त रहते हैं। उनसे तपस्या वाले कर्म व उच्च कोटि के कर्म हो ही नहीं सकते। इसलिए वे वेद पाठ के अधिकारी नहीं बतलाए गए और कुछ अन्य कर्मों के अधिकारी नहीं बतलाए गये। हिंदू धर्म ग्रंथों व इतिहास में अनेक ऐसे व्याख्यान व उदाहरण हैं, जिसमें शूद्र जाति के लोगों ने भी अच्छे अच्छे कर्म किए और अच्छी व श्रेष्ठतम पदवी पाई। 

लेकिन शूद्रों का इतना अपमान और अत्याचार; जितना कि बताया जाता है, प्राचीन समय और गुलामी से पहले कभी नहीं हुआ।  हुआ तो केवल गुलामी के समय और उसी गुलामी के समय में हिंदू विरोधियों द्वारा हिंदू धर्म ग्रंथों व इतिहास के पन्नों पर और हिन्दू धर्म विरोधी राजनेताओं व हिन्दू धर्म विरोधियों के जुबान पर।

हिंदू विरोधियों ने चुन चुनकर ऐसी-ऐसी हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली कहानियां गढ़ी व हिन्दू धर्मग्रन्थों में जगह जगह पर बनावटी व कटु श्लोक भरे, जिनके समर्थन में कुछ बातें इन्होंने मनुस्मृति, पुराणों, इतिहास और उपनिषदों में डाल दिया, ताकि वे कहानियाॅं व श्लोक सच्ची लगें, जबकि वे  सरासर झूठ ही हैं और गढ़ी गई हैं।

प्राचीन काल के जितने भी आश्चर्यजनक मंदिर हैं जैसे- तमिलनाडु का नेल्लयाप्पर मंदिर, कोणार्क का सूर्य मंदिर व भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में लाखों स्थानों पर प्राचीन काल के पत्थरों से बने सुन्दरतम मंदिर शूद्रों ने ही तो बनाये हैं कि कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य वर्ग का बना दिया, शूद्र ही तो कारीगर व मजदूर थे ! अगर उस समय शूद्रों का सम्मान नहीं होता, उनको अच्छी सुविधाएँ व आय नहीं दी जाती तो क्या उनकी कुशलता बढ़ सकती थी ? उनको अच्छी सुविधाएँ, सम्मान व आय दी गयी तभी वे कुशल हो सके ! ऐसा नहीं है कि "शूद्र" वर्ग अपने गले में हांड़ी और पीछे झाड़ू बांधकर ऐसा कार्य किया।

राजाओं का रथ हांकने वाले भी "शूद्र" वर्ग के ही थे। घोड़ों व हाथियों की देखरेख करने वाले भी "शूद्र" वर्ग के ही थे। भोजन बनाने वाले "शूद्र" वर्ग के ही लोग थे। ऐसा नहीं है कि ये अपने गले में हांड़ी और पीछे झाड़ू बांधकर ऐसा कार्य करते थे।

अनेक पुरातात्विक प्रमाण हैं जिनसे इस मत को बल मिलता है कि ताॅंबे और लोहे के निष्कर्षण की तकनीकी सर्वप्रथम भारत में ही विकसित हुई थी। ऋग्वेद के अनुसार 1000 से 420 BCE में चर्म संस्करण और कपास को रंगने का कार्य होता था। उत्तर भारत में काली पाॅलीश वाले मिट्टी के बर्तनों की सुनहरी चमक को दोहराया नहीं जा सकता और अब भी एक रासायनिक रहस्य है। यह तथ्य आज भारत में रसायन विज्ञान में पढ़ाया जाता है। क्या इस कर्म को ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य के लोग करते थे ? नहीं ना ! इस कर्म को केवल शूद्र वर्ग के लोग ही करते थे; लेकिन वे अपने गले में हांड़ी और पीछे झाडू बांधकर नहीं करते थे बल्कि सम्मान के साथ करते थे; तब आज उनके किए हुए पर पूरा विश्व रिसर्च करता है।

आप महाभारत का ही दृष्टांत ले लीजिए; महाभारत में महाराजा धृतराष्ट्र के महामंत्री विदुर थे, जो कि एक शूद्र जाति के थे और उनको एक विशेष सम्मान भी प्राप्त था। उनके द्वारा बताई गई विदुर नीति भारत में हिंदूओं के मन में एक अपूर्व निष्ठा उत्पन्न करती है जो कभी कटती नहीं।

रामायण में भी उल्लेख है कि जब रामचन्द्र जी छोटे थे और विद्याध्ययन के लिए गुरुकुल में गये तो वहाॅं शूद्र जाति (निषाद) के लोग भी समान शिक्षा पा रहे थे और उस समय भी वर्ण व्यवस्था थी और यही नियम महाराजा विक्रमादित्य, महाराजा भोज, महाराजा चन्द्रगुप्त से होते हुए सम्राट अशोक तक आया। पूरा विस्तार से जानने के लिए क्लिक करें- Click here

जितना ऊँचा वर्ण और कुल; उतना ही ऊँचा गुण और कर्म भी तो होना चाहिए।

"ऊँचे कुल का जनमिया, जे करनी ऊँच न होय।
सुबरन   कलस   सुरा  भरया,  साधू  निंदा   सोय।।"

सिर्फ ऊँची जाति या ऊँचे कुल में जन्म लेने से कुछ नहीं हो जाता। आपकी जाति के अनुसार आपका कर्म भी होना चाहिये। यह वैसे ही है, जैसे यदि सोने के बरतन में मदिरा रखी जाये तो इससे सोने के गुण फीके पड़ जाते हैं और साधु पुरुषों द्वारा निंदा की जाती है।

अब आपको यह भी समझ लेना चाहिये कि हिन्दू धर्म के अनुसार पूजनीय कौन है ?

हिन्दू धर्म के अनुसार-  माता-पिता, गुरुजन, ईश्वर, देवी - देवता, ऋषि - महात्मा (चाहे वे किसी भी जाति के हों), गाय-बैल, पर्वत, नदियाँ, वनस्पतियां, और जो व्यक्ति शास्त्रोक्त व धर्मोचित पवित्र श्रेष्ठ कर्म करता है तथा हिन्दू धर्म शास्त्रों में जिन्हें - जिन्हें पूजनीय बताया गया है, वे सब पूजनीय हैं।

समाज में अनेक लोग बुरी व भ्रष्ट मानसिकता वाले भी होते हैं, जो अपनी अपनी मानसिकता के अनुसार गलत, भ्रष्ट व न पूजने योग्य लोगों को भी पूजते हैं।

हमारे धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि जो ब्राह्मण अपने ब्राह्मणत्व तो से गिर गया है, वह शूद्र के समान है अतः जो ब्राह्मण शूद्र के समान हो गए हैं, तामसी कर्म कर रहे हैं, तामसी आहार-विहार व विचार वाले हो गए हैं, वह तो वास्तव में पूजनीय नहीं रह गए हैं। लेकिन जो ब्राह्मण, उचित कर्म कर रहे हैं, तामसी प्रकृति के नहीं हैं, वह पूजनीय हैं। इसी प्रकार शूद्र भी यदि सात्विक प्रकृति का है, आहार-विहार सात्विक है, विचार उत्तम है, धर्म शास्त्र के अनुकूल कार्य कर रहा है, तो वह भी पूजनीय है- जैसे संत रविदास जी।

सबसे बड़ा है, भगवान का भक्त; चाहे वह चाण्डाल ही क्यों न हो:-

"अहो बत श्वपचोSतो गरीयान्, यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्।
तेपस्तपस्ते जुहुवः सस्नुरार्या, ब्रह्मानूचुर्नाम   गृणन्ति  ये   ते।।"(भागवत३।३३।७)

'अहो ! आश्चर्य है कि जिसकी जिह्वा पर तुम्हारा पवित्र नाम रहता है, वह चाण्डाल भी श्रेष्ठ है; क्योंकि जो तुम्हारे नाम का कीर्तन करते हैं, उन श्रेष्ठ पुरुषों ने तप, यज्ञ, तीर्थस्नान और वेदाध्ययन आदि सब कुछ कर लिया।'

निष्कर्ष 

तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की रचना इसलिए की, ताकि गैर संस्कृत भाषी, कम पढ़ा व आम व्यक्ति भी इसे समझ सके। परन्तु जिसे हिन्दू धर्म का पूर्ण ज्ञान ना हो, उसके लिए इस पर टिका टिप्पणी करना व्यर्थ है – सम्भवतः पूर्व में व्याख्याकारों द्वारा गलत व्याख्याएँ की गई है और आज भी गलत व्याख्या की जाती है।

कुछ लोग खंडन करते वक्त तर्क देते हैं कि, यहां पर ब्राह्मण और शूद्र की ही बात क्यों की गई है, वैश्य या क्षत्रिय की बात क्यों नहीं की गई ? अरे मूर्खों ! जहां पर जो बात उचित है, वही बात की जाएगी, ना कि कोई दूसरी। समाज में मोटे तौर पर- उच्च-नीच, राई-पर्वत, अमीर-गरीब, राजा भोज-गंगू तेली की ही तो बात की जाती है। इसी तरह से यहां पर और कुछ जगहों पर जहां जो बात उचित है, वही बात की जाएगी; ना कि सबको उसी में पेश दिया जाए।

गोस्वामी तुलसीदास जी को समझने के लिए गोस्वामी जी ही जैसा बनना पड़ेगा, तो राम-नाम का अलख जगाइये; और कीजिए प्रभु श्रीराम की भक्ति। सारी बात धीरे-धीरे समझ में आने लगेगी। तुलसीदास जी ने समाज को जोड़ा है; तोड़ने का काम कभी नहीं किया क्योंकि तुलसीदास जी जैसा 'लोकमंगल की कामना' करने वाला कोई कवि हुआ ही नहीं।

हे वामपंथियों, छद्म नारीवादियों, हिन्दू विरोधियों, भ्रमित हिन्दुओं, नकारात्मक विचारधारा वाले लोगों ! हिन्दू धर्म बहुत गूढ़, गहन, विस्तृत और महान है। हिन्दू धर्म को छोड़कर, प्रत्येक धर्म की हर एक लाइन का खंडन हो जाता है। 
अत: हिन्दू धर्म पर अंगुली उठाना छोड़ो और अपने अनमोल जिन्दगी का अच्छा उपयोग करना हिन्दू धर्म से सीखो !

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