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जिन्नावाद क्या था ? भारत में हिन्दू-मुस्लिम एकता नहीं बन सकती ?, कब तक चलती है हिन्दू-मुस्लिम एकता ?

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 चेतावनी : इस लेख का उद्देश्य सिर्फ सामान्य जानकारी देना है। इस लेख का उद्देश्य किसी भी धर्म के लोगों को भड़काना या भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है।

जिन्नावाद क्या था ? क्या जिन्नावाद सही था ? हाॅं - "जिन्नावाद" सही था ?

प्रिय मित्रों ! आप देख रहे होंगे कि भारत में हिंदू-मुस्लिम एकता बनती नजर नहीं आ रही और दिन- प्रतिदिन हिंदू-मुस्लिम एकता, या यह कहें कि गंगा-जामुनी तहज़ीब बिगड़ती ही जा रही है।

"जिन्नावाद" क्या था ? लोग "जिन्नावाद" को सही क्यों नहीं मानते हैं ? 

"जिन्नावाद" मेरे विचार से सही था। आपका विचार क्या हो सकता है, मैं यह नहीं जानता, 

लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना- जो यह कहता था कि-
1. भारत में हिंदू-मुस्लिम एकता नहीं बन सकती, 
2. हिंदू और मुस्लिम साथ-साथ नहीं रह सकते, क्योंकि हिंदू लोग गाय की पूजा करते हैं और मुस्लिम लोग गाय को खाते हैं।

उसने ठीक कहा था। इसीलिए भारत को मुसलमानों के लिए अलग देश पाकिस्तान में तोड़ा गया, लेकिन गलती यह हुई कि भारतीय मुसलमानों को पाकिस्तान में नहीं भेजा गया। आज उसी गलती का परिणाम भारत भुगत रहा है और भविष्य में भी भुगतता रहेगा। यह भारत की सबसे बड़ी गलती थी, आइए मैं आपको समझाने का प्रयास करता हूं:-

हिन्दू-मुस्लिम एकता


मोहम्मद अली जिन्ना (Mohammad Ali Jinnah) कौन था ?

मोहम्मद अली जिन्ना (उर्दू: محمد علی جناح‎, जन्म: 25 दिसम्बर 1876 मृत्यु: 11 सितम्बर 1948) बीसवीं सदी का एक प्रमुख राजनीतिज्ञ था, जिन्हें पाकिस्तान के संस्थापक के रूप में जाना जाता है। वह मुस्लिम लीग का नेता था, जो आगे चलकर पाकिस्तान का पहला प्रधानमंत्री बना। पाकिस्तान में, उसे आधिकारिक रूप से क़ायदे-आज़म यानी महान नेता और बाबा-ए-क़ौम यानी राष्ट्रपिता के नाम से नवाजा जाता है।

राजनीतिक कार्यों में अतिव्यस्तता के चलते उनका निजी जीवन, विशेषकर उनका वैवाहिक जीवन प्रभावित हुआ। हालांकि उन्होंने अपने वैवाहिक जीवन को बचाने के लिए यूरोप की यात्रा भी की, लेकिन 1927 में पति और पत्नी अलग हो गये। 1929 में उनकी पत्नी की गम्भीर बीमारी के बाद मौत हो गयी, जिसके बाद जिन्ना बेहद दुखी रहने लगे।


मोहम्मद अली जिन्ना का पाकिस्तान निर्माण में भूमिका

भारतीय राजनीति में मोहम्मद अली जिन्ना का उदय सन् 1916 में कांग्रेस के एक नेता के रूप में हुआ था, जिन्होने हिन्दू-मुस्लिम एकता पर जोर देते हुए मुस्लिम लीग के साथ लखनऊ समझौता करवाया था। लेकिन साथ-साथ मोहम्मद अली जिन्ना यह भी जानता था कि मुसलमानों का धर्म ऐसा है कि हिंदू और मुसलमान साथ-साथ नहीं रह सकते।

लाहौर प्रस्ताव के तहत मोहम्मद अली जिन्ना ने मुसलमानों के लिए एक अलग राष्ट्र का लक्ष्य निर्धारित किया। 1946 में ज्यादातर मुस्लिम सीटों पर मुस्लिम लीग की जीत हुई और मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की आजादी के लिए त्वरित कार्यवाही का अभियान शुरू कर दिया। 

मुस्लिम लीग और कांग्रेस पार्टी, गठबन्धन की सरकार बनाने में असफल रहे, इसलिए अंग्रेजों ने भारत विभाजन को मंजूरी दे दी। पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री के रूप में मोहम्मद अली जिन्ना ने लाखों शरणार्थियों (भारतीय मुसलमानों) के पुनर्वास के लिए बहुत प्रयास किया, लेकिन, मुस्लिम लीग के अनेक नेता, भारत के राष्ट्रपिता कहलाने वाले महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अब्बुल कलाम आजाद और अन्य कांग्रेसी नेताओं ने भारत से पाकिस्तान के लिए मुसलमानों का प्रवास नहीं होने दिया या भारत से मुसलमानों को पाकिस्तान में नहीं जाने दिया और भारत को सदा के लिए एक विषैले संकट में डाल दिया। 

हालांकि सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इसका विरोध किया और कहा कि, जिन मुसलमानों ने पाकिस्तान निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की वह भारत से पाकिस्तान में क्यों नहीं जाते ? क्या वे रातों-रात भारत के लिए देशभक्त हो जाएंगे?

साथ ही, मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने देश (पाकिस्तान) की विदेश नीति, सुरक्षा नीति और आर्थिक नीति बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

मोहम्मद अली जिन्ना के 9 महत्वपूर्ण विचार 

मोहम्मद अली जिन्ना का कांग्रेस से मतभेद उसी समय शुरू हो गये थे, जब 1918 में भारतीय राजनीति में गाॅंधी जी का आगमन हुआ। 

1.  गाॅंधी जी के अनुसार, सत्य, अहिंसा और सविनय अवज्ञा से स्वतन्त्रता और स्वशासन पाया जा सकता है, जबकि जिन्ना का मत उनसे अलग था। मोहम्मद अली जिन्ना का मानना था कि सिर्फ संवैधानिक संघर्ष से ही आजादी पाई जा सकती है। 

2.  गाॅंधी जी ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया था, जबकि जिन्ना ने इसका खुलकर विरोध किया था।

3.  1920 में मोहम्मद अली जिन्ना ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया। इसके साथ ही, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि गाॅंधी जी के जन संघर्ष का सिद्धांत हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच विभाजन को बढ़ायेगा,  न की कम करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि यदि हिंदू और मुस्लिम साथ - साथ रहेंगे तो, दोनों समुदायों (हिंदू-मुस्लिम) के बीच जबरदस्त झगड़ा पैदा होगा। 

4.  मुस्लिम लीग पार्टी का अध्यक्ष बनते ही मोहम्मद अली जिन्ना ने कांग्रेस और ब्रिटिश समर्थकों के बीच विभाजन रेखा खींच दी थी।

5.  1923 में जिन्ना मुंबई से सेण्ट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली के सदस्य चुने गये। एक कानून निर्माता के रूप में उन्होंने स्वराज पार्टी को मजबूती प्रदान की। 1925 में लॉर्ड रीडिग ने उन्हें नाइटहुड की उपाधि भी दी।

6. 1927 में साइमन कमीशन के विरोध के समय उन्होंने संविधान के भावी स्वरूप पर हिन्दू और मुस्लिम नेताओं से बातचीत की। लीग के नेता ने पृथक चुनाव क्षेत्र की माँग की, जबकि नेहरू रिपोर्ट में संयुक्त रूप से चुनाव लड़ने की बात कही गयी। बाद में दोनों में समझौता हो गया, जिसे जिन्ना के चौदह सूत्र के नाम से जाना जाता है। हालांकि इसे कांग्रेस और दूसरी राजनीतिक पार्टियों ने बाद में खारिज कर दिया।

7.  उन्हें भारतीय मुसलमानों के अधिकारों को लेकर काफी चिन्ताएं सता रहीं थीं। लन्दन में गोलमेज सम्मेलन के भंग होने का भी उन्हें दुःख था। वे लन्दन में रुक गये। इस दौरान वे अल्लामा इकबाल से जुड़कर विभिन्न मुद्दों पर काम भी करते रहे। 1934 में वे भारत लौटे और मुस्लिम लीग का पुनर्गठन किया।

8.  आजादी के समय मोहम्मद अली जिन्ना पूरे भारत में घूम घूम कर भाषण दे रहे थे। कांग्रेस के साथ वार्ता विफल होने के बाद जिन्ना को भी यह विचार आया कि मुसलमानों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए एक अलग देश मिलना ही चाहिए, बिना इसके काम नहीं बनेगा। आगे चलकर जिन्ना का यह विचार बिल्कुल पक्का हो गया कि हिन्दू और मुसलमान दोनों अलग-अलग देश के नागरिक हों, अत: उन्हें अलग कर दिया जाये। उनका यही विचार बाद में जाकर जिन्ना का द्विराष्ट्रवाद का सिद्धान्त कहलाया।

9. जिन्ना ने कहा कि, यदि मुसलमानों को अलग न किया जाए तो अन्त में गृहयुद्ध फैल जायेगा। यह बात जिन्ना ने इकबाल के साथ पत्राचार में भी उठायी। 1940 के लाहौर अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित कर यह कहा गया कि मुस्लिम लीग का मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान का निर्माण है। 

कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। मौलाना अब्बुल कलाम आजाद जैसे नेताओं और जमाते-इस्लामी जैसे संगठनों ने इसकी कड़ी निन्दा भी की। 26 जुलाई 1943 को उग्रवादियों के हमले में जिन्ना घायल हो गये। जिन्ना ने 1941 में डॉन समाचार पत्र की स्थापना की, जिसके द्वारा उन्होंने अपने विचार का प्रचार-प्रसार किया। 


हिन्दू - मुस्लिम एकता को बिगाड़ने में कुरान की भूमिका 

कुरान

कुरान की प्रतिलिपि, जो की उर्दू व हिन्दी भाषा में है, Download करें -  कुरान Download 

1. कुरान में लिखा है 'मूर्ति पूजकों' को जहाँ पाओ कत्ल कर दो- 

कुरान सूरा 9 अत-तौब़:, आयत 5)

 कुरान सूरा 9 अत-तौब़:, आयत 5 में मूर्ति पूजने वालों के लिए यह लिखा गया है कि "जब मुहर्रम के महीने बीत जाएँ, तो मुश्रिकों (मूर्तिपूजकों) को जहाँ कहीं पाओ उन्हें मार डालो, और उसकी बदनामी करो,  इसी के साथ हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो और उनका कत्ल करो। जहाँ कहीं भी मूर्ति पूजक मिले उन्हें मार दो। यदि वे प्रायश्चित करें और नमाज कायम करें और ज़कात अदा करें तो उनका रास्ता छोड़ दो। निसंदेह अल्लाह बहुत क्षमा करने वाला और बार-बार दया करने वाला है।" 

2. कुरान में लिखा है "काफ़िरों (गैर-मुस्लिमों) से लड़ो" - 

कुरान सूरा 9, आयत 123

कुरान के सूरा 9 अत-तौब़:, आयत 123 में लिखा हुआ है कि "काफि़र यानी गैर-मुस्लिम तुम्हारे खुले दुश्मन हैं, और उन 'काफिरों' से लड़ो जो तुम्हारे आस पास हैं। "

3. कुरान में लिखा है "काफ़िरों व मुनाफ़िक़ों  के साथ जिहाद करो" - 

कुरान सूरा 66, आयत 10

4. कुरान सूरा 66, आयत 10 में लिखा हुआ है  

"हे नबी! काफिरों और मुनाफ़िक़ों से जिहाद कर और उनके विरुद्ध कठोरता अपना और उनका ठिकाना नरक है और वह बहुत ही बुरा ठिकाना है।"

5. कुरान सूरा 2 आयत 191, 192, 193, 194, 195 में काफ़िरों के प्रति नफरत, धर्मान्तरण इत्यादि लिखा है। 

6. कुरान सूरा 26, आयत 92,93, 94 व 95 में लिखा हुआ है कि

 " नरक को पदभ्रष्टों के सामने ला खड़ा किया जाएगा और उनसे कहा जाएगा वे कहां है जिनकी तुम उपासना किया करते थे। अल्लाह के सिवा, क्या वे तुम्हारी सहायता कर सकते हैं अथवा अपना प्रतिशोध ले सकते हैं। अतः वे और अवज्ञाकारी लोग भी उसमें औंधे गिरा दिए जाएंगे।"

7. कुरान में लिखा है "मुश्रिक (मूर्तिपूजक) तो अपवित्र है" - 

कुरान सूरा 9 आयत 28

कुरान सूरा 9 आयत 28 में लिखा है कि "हे वे लोगो जो ईमान लाए हो! मुश्रिक तो अपवित्र हैं। अतः वे अपने इस वर्ष के बाद मस्जिद-ए-हराम के निकट ना फटकें। और यदि तुम्हें निर्धनता का भय हो तो यदि अल्लाह चाहे तो तुम्हें अपनी कृपा के साथ धनवान बना देगा। निस्संदेह अल्लाह स्थायी ज्ञान रखने वाला और परम विवेकशील है।'' 

क्या सीखेंगे कुरान पढ़ने वाले बच्चे व लोग

कुरान की आयतें जब दंगे, लड़ाई, झगड़े को भड़काती है तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन बच्चों को बचपन से कुरान पढ़ने के लिए कहा जाता है वह क्या सीखेंगे...? कुरान में मूर्तिपूजकों व काफ़िरों को मारने के बारे में लिखा है तो इस तरह तो मुस्लिम बच्चे कभी मूर्तिपूजकों व काफ़िरों (गैर मुस्लिमोंं) से बात ही नहीं करेंगे क्योंकि बचपन से मूर्तिपूजकों व काफ़िरों  के लिए उनके मन में केवल नफरत होगी। जिस तरह कुरान में लिखा है 'वह (मूर्तिपूजक) जहाँ मिल जाए उनका कत्ल कर दो।' इन बातों को अगर बच्चे अपने मन में बचपन से बैठा लेंगे तो वह बड़े होकर दंगे, लड़ाई, झगड़े का ही हिस्सा बनेंगे ना कि शान्ति का समर्थन करेंगे। 

आजादी के बाद से भारत में 99% मुस्लिम बच्चों को शुरू में मदरसों की शिक्षा दी जाती है और मदरसों को सरकारी आय भी प्राप्त होती है लेकिन गुरुकुल शिक्षा का कहीं भी नामोनिशान नहीं है।

आप खुद सोचिये और बताइए कि क्या यह सही है...? आप ये कुछ विडियो देख लें-





कब तक चलती है हिन्दू - मुस्लिम एकता ?

जैसा कि अतीत व वर्तमान को देखने से साफ स्पष्ट होता है कि जब किसी क्षेत्र में जहां हिंदू-मुस्लिम साथ-साथ रह रहे हो, वहां जब मुस्लिमों की संख्या व शक्ति हिन्दुओं से अधिक हो जाती है, तो मुस्लिम भाई लोग हिंदू-मुस्लिम एकता भूल जाते हैं और फिर अपने कुरान के संकेतों की ओर काम करना शुरू कर देते हैं और हिंदुओं को मारना-पीटना और उनकी संख्या को खत्म करना शुरू कर देते हैं। जैसा कि नीचे दिया गया है-------

बंटवारे से पहले पाकिस्तान में 24% हिंदू रहते थे, जिनकी संख्या अब महज 1.6% हो गई है। स्रोत - सर्वे ऑफ ह्यूमन राइट्स 1998

→ बांग्लादेश में आजादी के वक्त 13.50% हिंदू थे। 2011 की जनगणना के अनुसार अब 8.54% हिन्दू ही बचे हैं।

→ गणना के अनुसार, लगभग 800 वर्षों तक हिंदू लोग मुसलमानों के गुलाम रहें। इन गुलामी के वर्षों में लगातार हिंदू मंदिरों को तोड़ा गया व हिन्दुओं पर मुसलमानों द्वारा जमकर अत्याचार किया गया। हिन्दुओं का जबरदस्ती धर्मांतरण और उनका कत्लेआम किया गया। 
उनके सांस्कृतिक विरासत को चोट पहुंचाई गई- जैसे नालंदा विश्वविद्यालय में 90 लाख पुस्तकों को मुगल शासक ब्खतियार खिलजी द्वारा जलवाया गया। बाबर द्वारा अयोध्या का श्री राम मन्दिर व मुगलों द्वारा काशी विश्वनाथ मंदिर को बार-बार तोड़ा गया व मस्जिदें बनायी गयी।

ज्ञानवापी मस्जि़द


सन् 1017-18 में महमूद गजनवी ने मथुरा के समस्त मंदिर तुड़वा दिए थे, लेकिन उसके लौटते ही मंदिर बन गए। मथुरा के मंदिरों के टूटने और बनने का सिलसिला भी कई बार चलता रहा। और भी कई उदाहरण आपको मिल जाएंगे। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि हिंदू-मुस्लिम एकता कभी नहीं बनी। 

→ सन् 1990 में मुसलमानों से पीड़ित होकर कश्मीरी पंडितों का पलायन। उस समय वहाॅं नारे लग रहे थे, 'कश्‍मीर में अगर रहना है, अल्‍लाहू अकबर कहना है'।
कश्‍मीरी पंडित संघर्ष समिति के अनुसार-  जनवरी 1990 में घाटी के भीतर 75,343 परिवार थे। 1990 और 1992 के बीच 70,000 से ज्‍यादा परिवारों ने घाटी को छोड़ दिया। पिछले 30 सालों के दौरान घाटी में बमुश्किल 800 हिंदू परिवार बचे हैं।

→ 2016 में उत्तर प्रदेश के कैराना से हिन्दुओं का पलायन।

→ भारत के अनेक राज्यों और अनेक स्थानों पर सदियों से चले आ रहे हैं हिंदू-मुस्लिम झगड़े या हिंदू-मुस्लिम दंगे, जो कि हिंदू-मुस्लिम एकता ना होने का सीधा प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।

हिन्दू - मुस्लिम एकता बिगाड़ने में उकसाने वाले लोग:-

सोशल मीडिया पर समय-समय पर ऐसे ऐसे भड़काऊ videos वायरल होते हैं, कि हिंदू भाई भी भविष्य में किसी भावी खतरे के प्रति सतर्क होने के लिए सभी हिंदुओं को प्रेरित करते हैं, और यह जरूरी भी है; पता नहीं भविष्य में क्या हो जाए ?

निष्कर्ष (उपसंहार)

हिन्दुओं का नेतृत्व करने वाले संगठनों के लोग भी कहते हैं कि, भारत का विभाजन या भारत से पाकिस्तान का निर्माण नहीं होना चाहिए था परन्तु भारत का विभाजन हिंदू और मुस्लिम धर्म को लेकर हुआ ना कि अन्य कारणों से; लेकिन मेरे विचार से शांति और शुचिता बनाए रखने के लिए भारत का विभाजन या भारत से पाकिस्तान का निर्माण करना उचित था। लेकिन गलत यह हुआ कि जब भारत का विभाजन हो गया, या पाकिस्तान बन गया तो फिर भारत से मुसलमानों को पाकिस्तान में क्यों नहीं भेजा गया ? उन्हें क्यों भारत में रोक लिया गया और सदा के लिए भारत में सांप्रदायिकता की स्थिति का माहौल खड़ा कर दिया गया ?

आज भारत जिस सांप्रदायिक स्थिति का सामना कर रहा है, उसका एकमात्र कारण है- मोहम्मद अली जिन्ना की बात न मानना या पाकिस्तान बन जाने के बाद भी भारत में मुसलमानों को रोके रखना
जब मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत का विभाजन करवाकर पाकिस्तान देश को खासकर के मुसलमानों के लिए बनवाया और मोहम्मद अली जिन्ना ने भारतीय मुसलमानों को पाकिस्तान में बुलाने का काम भी किया, लेकिन महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अब्बुल कलाम आजाद आदि अन्य नेताओं ने भारत से मुसलमानों को पाकिस्तान में जाने से रोक दिया।

यदि भारत से मुसलमान पाकिस्तान चले गए होते तो इस्लामिक देश अलग होता और भारत एक हिंदू देश होता और दोनों देश शांति व अपने-अपने धर्म के साथ विकास पथ पर आगे बढ़ते और ना ही उनमें आपस में कोई सांप्रदायिक माहौल का टकराव होता।

आज वर्तमान में भारत में सांप्रदायिक टकराव का एकमात्र कारण है- धर्म । क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपने धर्म को श्रेष्ठ मानता है। और जब विपरीत या अलग-अलग धर्मों के लोगों को एक साथ रहने के लिए, उनके ऊपर एक समान नियम बनाया जाता है तो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचता है और अशांति का माहौल उत्पन्न हो जाता है।

आज वर्तमान में जो भी हो, हिंदू और मुस्लिम को भारत में साथ साथ रहने के लिए और शांति माहौल को बनाए रखने के लिए, ताकि भविष्य में कोई अनहोनी और वीभत्स घटना ना हो. इसलिए कड़े से कड़े कानून बनाने चाहिए ताकि किसी की भी मानसिकता किसी गलत कार्य को करने की ना हो और ना ही वे लोग आपस में एक दूसरे को मारने के लिए सोचें।


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