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हिन्दू धर्म की समालोचना, हिन्दू धर्म का विरोध क्यों किया जाता है ? हिन्दू धर्म (सनातन धर्म) का विरोध उचित नहीं !

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हिन्दू धर्म का विरोध उचित नहीं, हिन्दू धर्म की समालोचना:-

हिन्दू धर्म के वे तथ्य, जिनका समय समय पर विरोध किया जाता रहा है, यह हैं-

जातिवाद, सती प्रथा, बाल विवाह, दहेज प्रथा, बलि प्रथा और मूर्ति पूजा।


1. जाति प्रथा:-  हिंदू धर्म विरोधी और भ्रमित हिंदू लोगों का कहना है कि जाति प्रथा के फलस्वरूप  छुआछूत जैसी कुरीतियाँ उत्पन्न होती हैं, जो लगभग बीस करोड़ से अधिक दलित लोगों के साथ असमानता का अनुचित व्यवहार व ब्राह्मणों को समाज में अनुपयुक्त विशेषाधिकृत उच्च स्थान देती है।

जातिवाद


जब आप हिन्दू धर्म का गम्भीरता से अध्ययन करेंगे तो आप पायेंगे कि दलितों को 'दलित व चमार' नाम हिन्दू धर्म ने नहीं दिया है, इससे पहले 'हरिजन' नाम भी हिन्दू धर्म के किसी शास्त्र ने नहीं दिया, हरिजन नाम गांधी जी ने दिया। सवर्ण नाम भी हिन्दू धर्म ने नहीं दिया। आज जो नाम दिए गए हैं, वह पिछले 74 वर्षों की राजनीतिक उपज है और इससे पहले जो नाम दिए गए थे वह पिछले 900 साल की गुलामी की उपज थे।

बहुत से ऐसे ब्राह्मण हैं जो आज दलित हैं, मुसलमान हैं, ईसाई हैं या अब वह बौद्ध हैं। बहुत से ऐसे दलित हैं जो आज ब्राह्मण समाज का हिस्सा हैं। अब कुछ वर्षों से ऊंची जाति के लोगों को सवर्ण कहा जाने लगा हैं। यह सवर्ण नाम भी हिन्दू धर्म ने नहीं दिया बल्कि कुटिल राजनैतिक लोगों ने दिया।

 ऐसा नहीं है कि प्रचीन समय से शूद्रों को अनावश्यक प्रताड़ित किया गया। प्राचीन समय में जिस वर्ग के व्यक्ति ने भी गलत कर्म किया, उसको दंड मिला। ऋषि मांडव्य को राजा ने चोर समझकर सूली पर चढ़ा दिया था, जबकि राजा जानते थे कि यह ब्राह्मण हैं।

प्राचीन काल के जितने भी आश्चर्यजनक मंदिर हैं जैसे- तमिलनाडु का नेल्लयाप्पर मंदिर, कोणार्क का सूर्य मंदिर व भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में लाखों स्थानों पर प्राचीन काल के पत्थरों से बने सुन्दरतम मंदिर शूद्रों ने ही तो बनाये हैं कि कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य वर्ग का बना दिया, शूद्र ही तो कारीगर व मजदूर थे ! अगर उस समय शूद्रों का सम्मान नहीं होता, उनको अच्छी सुविधाएँ व आय नहीं दी जाती तो क्या उनकी कुशलता बढ़ सकती थी ? उनको अच्छी सुविधाएँ, सम्मान व आय दी गयी तभी वे कुशल हो सके ! ऐसा नहीं है कि "शूद्र" वर्ग अपने गले में हांड़ी और पीछे झाड़ू बांधकर ऐसा कार्य किया।

राजाओं का रथ हांकने वाले भी "शूद्र" वर्ग के ही थे। घोड़ों व हाथियों की देखरेख करने वाले भी "शूद्र" वर्ग के ही थे। भोजन बनाने वाले "शूद्र" वर्ग के ही लोग थे। ऐसा नहीं है कि ये अपने गले में हांड़ी और पीछे झाड़ू बांधकर ऐसा कार्य करते थे।

आप महाभारत का ही दृष्टांत ले लीजिए; महाभारत में महाराजा धृतराष्ट्र के महामंत्री विदुर थे, जो कि एक शूद्र जाति के थे और उनको एक विशेष सम्मान भी प्राप्त था। उनके द्वारा बताई गई विदुर नीति भारत में हिंदूओं के मन में एक अपूर्व निष्ठा उत्पन्न करती है जो कभी कटती नहीं।

ऐसा नहीं है कि भारत में शूद्रों को पहले से अपमानित किया गया है, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। यह बाद में हिंदू धर्म को तोड़ने के लिए सोची-समझी साजिश के तहत शूद्रों को अपमानित किया गया और उन पर अत्याचार किया गया।


2. सती प्रथा हिन्दू विधवाओं द्वारा मृत पति की चिता के साथ जीवित जल जाने की प्रथा। 

सती प्रथा

जहाॅं तक हिंदू धर्म में सती प्रथा की बात है और विरोधी लोग इस पर विवाद करते हैं, तो हिंदू धर्म सती प्रथा को कभी भी अनिवार्यता नहीं दिया है, जितना कि आज लोगों को बोल बोल कर के भड़काया जाता है। प्राचीन से प्राचीन इतिहास उठाकर देख लीजिए; कभी भी सती प्रथा को हिन्दू धर्म ने अनिवार्य नहीं बनाया। सती होना स्त्रियों का अपने पति के प्रति एक स्वाभाविक प्रेम था, ना कि कोई जबरदस्ती। हमारे हिंदू धर्म ग्रंथों में हजारों ऐसे प्रमाण उपलब्ध हैं, कि पति की मृत्यु के बाद भी पत्नी समाज में सम्मान के साथ जीवित थी, उनको किसी ने सती होने के लिए विवश नहीं किया। और जो स्त्रियां सती हुई, उन पर सती होने के लिए किसी ने दबाव नहीं डाला गया, बल्कि उनका अपने पति के प्रति स्वाभाविक प्रेम था।

गुलामी के समय हिन्दू विरोधियों द्वारा उकसा कर पति की मृत्यु होने पर जबरदस्ती हिन्दू स्त्रियों को जलवाया गया।

आज भी हिंदू समाज की स्त्रियां अपने पति का नाम नहीं लेतीं, क्या उन्हें कोई मना करता है, कि तुम अपने पति को उनका नाम लेकर मत पुकारो या उनका नाम मत लो ? नहीं ! उनमें अपने पति के प्रति ऐसा स्वाभाविक प्रेम और सम्मान की भावना है, कि उस प्रेम व सम्मान के कारण वे अपने पति का नाम नहीं लेती। जैसा कि आज अन्य धर्म और हिंदू धर्म विरोधी, पाश्चात्य विचारधारा वाली स्त्रियां; अपने पति का नाम लेकर उन्हें पुकारती हैं।

3. बाल विवाहकम उम्र में ही बच्चों का विवाह। 

हिन्दू धर्म में जहाॅं तक बाल विवाह की बात है, तो हिन्दू धर्म के प्राचीन से प्राचीन इतिहास में बाल विवाह का उदाहरण नहीं मिलता है। जैसे- जनक पुत्री सीता, द्रुपद पुत्री द्रोपदी, दमयन्ती व अनूसूया इत्यादि का विवाह। हाॅं ! हिन्दू धर्म इतना अवश्य कहता है कि, जब लड़कियों में मासिक धर्म की शुरूआत होने से पहले या मासिक धर्म की शुरूआत हो जाए तो लड़की का पिता या परिवार जल्द से जल्द (12 - 20 वर्ष तक) योग्य वर की तलाश करके योग्य वर के साथ लड़की का विवाह कर दे, वरना जितना देर होगा, उतना ही वे लोग पाप के भागी होंगे।

जहाॅं तक बाल विवाह की बात है, तो गुलामी के समय में आक्रमणकारी लोग लड़कियों का जबरन अपहरण कर लेते थे। 

बाल विवाह



अतः लड़कियों के परिवार वाले इस घटना से बचने के लिए लड़कियों का कम उम्र में ही विवाह करने लगे और यह कुप्रथा बन गयी क्योंकि लम्बे समय से हिन्दू लोग अपने धर्म ग्रंथों को पढ़ना नहीं चाह रहे हैं और केवल विलासी होते जा रहे हैं, जिससे ज्ञान का अभाव होता जा रहा है , जिसमें हिन्दू धर्म दोषी नहीं है, बल्कि गुलामी का समय दोषी है। अनुचित बाल विवाह गुलामी के समय ही लोगों द्वारा किया गया।


4. बलि प्रथा- अनुष्ठान व बलिदान की प्रथाओं में निर्दोष पशुओं की हत्या।

हमारे हिंदू धर्म में तीन प्रकार की मनुष्य बतलाए गए हैं- सात्विक, राजसी, तामसी 
और तीन प्रकार के गुण भी बतलाए गए हैं- सात्विक, राजसी, तामसी 
तथा तीन प्रकार की प्रकृति भी बनाई गई है- सात्विक, राजसी, तामसी
साथ में कर्मों के तीन प्रकार के फल भी बतलाए गए हैं- सात्विक, राजसी, तामसी

हिंदूओं में ही नहीं; बल्कि पूरे विश्व में जितने भी कर्म होते हैं, वह सात्विक, राजसी अथवा तामसी के अंतर्गत ही होते हैं। हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था के साथ-साथ बलि प्रथा का हिन्दू विरोधी लोग विरोध करके हिन्दू धर्म की निंदा करते हैं, जबकि हिंदू धर्म में तीन प्रकार के कर्म बताए गए हैं- सात्विक, राजसी और तामसी। बलि इत्यादि कर्म तामसी है।

बलि प्रथा

कुछ ऐसे तामसिक कर्म होते हैं, जिनमें बली देने की अनिवार्यता होती है; लेकिन ऐसा नहीं है कि वह पाप नहीं है। हिन्दू धर्म के मूल ग्रन्थ पशु बलि व नर बलि या किसी भी प्रकार की बलि का समर्थन नहीं करते हैं। हिंदू धर्म उसको भी पाप कहता है और उसका फल बलि देने वालों को भोगना ही पड़ता है।

शायद आप ना जानते हो; लेकिन मैं आपको बता देता हूं कि यदि पूरे विश्व में कोई अहिंसा का पालन करता है और शाकाहारी है तो वह वर्ण व्यवस्था वाला हिंदू ही है, बाकी किसी भी धर्म के लोग (मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी, यहूदी आदि) अहिंसा का पालन नहीं करते, भले ही वे अहिंसा अहिंसा अहिंसा का रट लगाए रहते हैं। कीड़े - मकोड़े तक खा जाते हैं, अहिंसा का रट लगाने वाले अन्य धर्मों के लोग।

वर्तमान में भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में 55 - 65% मछलियों व पशुओं का माॅंस ही भोजन का हिस्सा है।

सिर्फ हिंदू में सात्विक और कुछ राजसी प्रकृति के लोग हैं जो शाकाहारी हैं किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करते हैं। यही तो हिंदू धर्म की महानता है, जो सब अन्य धर्मों के लोगों के मन में ईर्ष्या उत्पन्न करती है।

5. दहेज प्रथा- "दहेज प्रथा" नाम हिन्दू धर्म ने नहीं दिया है। हिन्दू धर्म के ही नहीं, बल्कि प्रत्येक धर्म के लोग अपनी लड़की का विवाह करते समय अपनी इच्छा और सामर्थ्य के अनुसार कुछ धन - दौलत व भोग की वस्तुएं प्राचीन समय से देते रहे हैं और आज भी देते हैं।

दहेज को 'प्रथा' नाम देने व 'कुप्रथा' बनाने में हिन्दू धर्म नहीं, बल्कि प्रत्येक धर्म के लालची लोग जिम्मेदार हैं, जो विवाह के समय अधिक धन - दौलत व भोग की वस्तुएं की माॅंग  करते रहे हैं और आज भी करते हैं। इस प्रथा के अत्यंत दुरुपयोग के कारण सरकार ने दहेज प्रतिबंध अधिनियम, १९६१ लागू करके इसे ग़ैर-क़ानूनी घोषित कर दिया है।

6. मूर्ति पूजा:- हिन्दू धर्म में लोग मूर्तियों की पूजा करते हैं या हिन्दू धर्म में मूर्तियों की पूजा की जाती है।
 
चूॅंकि हिन्दू धर्म में भगवान की उपासना व भगवत् प्राप्ति के दो मार्ग निर्धारित हैं- साकार मार्ग और निराकार मार्ग।  साकार मार्ग का अनुसरण करने वाले भक्त मूर्तियों की पूजा करते हैं। 

मूर्ति पूजा


हिन्दू धर्म में मूर्ति पूजा कोई गलत नहीं है, क्योंकि इसका चमत्कार व प्रभाव आज पूरा विश्व देखता है।

यदि हिंदू धर्म विरोधी और भ्रमित हिंदू लोगों का कहना है कि मूर्ति पूजा गलत है, तो मैं उन लोगों से पूछता हूॅं कि क्या वे लोग मूर्ति पूजा नहीं करते हैं ?

सभी धर्मों के लोग मूर्ति पूजा करते हैं और ईर्ष्या वश हिन्दू धर्म की निंदा करते हैं। 

मुस्लिम धर्म को मानने वाले लोग मक्का  - मदीना, मकबरों, दरगाहों, कब्रों, और इस्लाम धर्म के संस्थापकों की पूजा उनकी मूर्तियों के द्वारा ही बड़ी लगन से करते हैं।

सिक्ख धर्म को मानने वाले लोग गुरूग्रन्थ, गुरू नानक, सिक्ख धर्म के संस्थापकों की पूजा उनकी मूर्तियों के द्वारा ही बड़ी लगन से करते हैं।

ईसाई धर्म को मानने वाले लोग ईसा मसीह, ईसाई धर्म के संस्थापकों की पूजा उनकी मूर्तियों के द्वारा ही बड़ी लगन से करते हैं।

बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग गौतम बुद्ध, डाॅ भीमराव अंबेडकर, कांशीराम, बौद्ध धर्म के संस्थापकों की पूजा उनकी मूर्तियों के द्वारा ही बड़ी लगन से करते हैं। गौतम बुद्ध, अम्बेडकर मूर्ति पूजा के विरोधी थे, फिर भी लोग इनकी मूर्तियों को पूजते हैं।

जैन धर्म को मानने वाले लोग महावीर स्वामी व तीर्थंकरों, जैन धर्म के संस्थापकों की पूजा उनकी मूर्तियों के द्वारा ही बड़ी लगन से करते हैं।


निष्कर्ष 

सभी धर्मों के लोग मूर्ति पूजा करते हैं लेकिन ईर्ष्या वश हिन्दू धर्म की निंदा करते हैं। हिन्दू धर्म की निंदा करने वाले महामूर्ख नहीं तो क्या हैं ?

अम्बेडकर आदि विद्वान लोग हिन्दू धर्म में बाद में हिंदू धर्म विरोधियों द्वारा भरे गये प्रक्षिप्त अंशों को समाप्त करने की कोशिश न करके हिन्दू धर्म को ही गलत साबित करने में लगे रहे।
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