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जातिवाद का असली अर्थ, नारीवाद व जातिवाद से वर्ण व्यवस्था की निंदा करना हिन्दू धर्म का अपमान, शूद्रों पर अत्याचार कब हुआ ?

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जातिवाद कह कहकर; जाति (वर्ण व्यवस्था) को नहीं, बल्कि छुआछूत वाली मानसिकता को समाप्त करो !

Note- ध्यानपूर्वक व अंत तक जरूर पढ़े, वरना आप समझ नहीं पायेंगे !

इस लेख में 11500+ (ग्यारह हजार पांच सौ+) शब्द शामिल हैं। इस लेख में जातिवादवर्ण व्यवस्थानारीवाद पर विस्तृत वर्णन है।

प्रिय मित्रों ! इस लेख में मैं बहुत ही महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा कर रहा हूॅं, जिसका नाम " जातिवाद " है। क्योंकि आज के समय में "जातिवाद" कोई छोटा शब्द नहीं, बल्कि यह अनेक तथ्यों पर टिका है, और अगर "जातिवाद" कह कहकर "जाति" को समाप्त कर दिया जाता है तो यह उन सभी अति आवश्यक तथ्यों को धराशायी कर देगा, जिन पर यह खुद टिका है। तो चलिये; विस्तार से जानते हैं -

Casteism


जातिवाद " शब्द का प्रयोग विशेषत: कहाॅं पर किया जाता है :-

वास्तव में आज के समय में "जातिवाद" शब्द का प्रयोग हिन्दुओं को लक्ष्य करके किया जाता है ना कि किसी अन्य को। 
"जातिवाद" शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग भारत की आजादी के बाद संविधान निर्माण के समय किया गया ।  खासकर हिन्दू समाज में व्याप्त कुछ कुरीतियों को लेकर "जातिवाद" शब्द का प्रयोग किया जाता है, और इसका एकमात्र लक्ष्य हिन्दू समाज में मौजूद विभिन्न जातियों (वर्ण व्यवस्था) को मिटाना ही होता है।

"शूद्र" शब्द का असली अर्थ - "उपनयन संस्कार हीनसेवा कर्म करने वाला, मनोविकारों (काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, आलस्य आदि) को वश में न रख सकने वाला" होता है। लेकिन आज वर्तमान में "शूद्र" शब्द को इतना निंदनीय बना दिया गया है कि हिन्दू धर्म के अनुसार जो जातियाँ "शूद्र" वर्ग में आती हैं, वे "शूद्र" शब्द से घृणा करने लगी हैं, जो उनका भ्रम है। 

"शूद्र" वर्ग में अनेक जातियां होती हैं, जिसमें से कुछ नीच और कुछ अति नीच जातियां भी होती है। ऐसा नहीं है कि उन जातियों में अच्छे लोग नहीं होते, जो अच्छे लोग होते हैं उन्हें अच्छा कार्य करने की छूट होती है। हिंदू धर्म में जाति का निर्धारण कर्म के आधार पर भी होता है। 
ऐसा नहीं है कि किसी को अति नीच कार्य करने के लिए विवश किया जाता है, जिसकी जो मानसिकता होती है, जिसको जो कार्य अच्छा लगता है वह उस कार्य को करता है। आज आप अपने समाज में ही देख लीजिए; कुछ लोग अपने मन के मुताबिक कार्य करते हैं, जिसमें से कुछ लोग अच्छे कार्य करते हैं तो कुछ लोग नीच कार्यों में लिप्त रहते हैं और आप उन्हें मना भी नहीं कर सकते! 

मान लीजिए; आप के चार लड़के हैं जिसमें से यदि एक लड़का दुष्टता कर रहा है, नीच कर्म कर रहा है; तो क्या आप उसे डाटेंगे नहीं, फटकारेंगे नहीं और फिर भी अगर वह नहीं मान रहा है तो आप उसे घर से निकाल देंगे, इत्यादि करते हैं। ऐसा नहीं है कि शूद्रों को अनावश्यक प्रताड़ित किया गया। प्राचीन समय में जिस वर्ग के व्यक्ति ने भी गलत कर्म किया, उसको दंड मिला। ऋषि मांडव्य को राजा ने चोर समझकर सूली पर चढ़ा दिया था, जबकि राजा जानते थे कि यह ब्राह्मण हैं।

भारत में हिंदू धर्म में सात्विक प्रकृति के लोग भी होते हैं। प्रत्येक कर्म को करने में पवित्रता और अपवित्रता का ध्यान रखा जाता है, तो थोड़ा बहुत बर्ताव करना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ हिंदू धर्म में ही। आगे पढ़ें; आपको पूरा समझ में आ जाएगा---

आज हिंदू विरोधी लोग समानता की बात करते हैं। क्या समस्त जनता को डीएम या लेखपाल बना देंगे ? क्या सभी को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का दर्जा दे देंगे ? नहीं ना ! जिसकी जो योग्यता है, उसी के अनुसार उसको पद दिया जाता है। उसी प्रकार जिस समाज में जिस विशेष वर्ग समुदाय में जो गुण था या एक विशेष गुण के लिए समुदाय को विभाजित किया गया और उन्हें वह कार्य सौंपा गया और वह समुदाय बड़े ही मन से उस कार्य को कर रहा था, जिसे वर्ण व्यवस्था कहते हैं। आप सभी को समान नहीं कर सकते। सबकी अपनी अलग-अलग विशेषता होती है। कोई सेवा करने में आगे है, कोई लड़ाई करने में आगे है, कोई व्यापार (सोदैबाजी) करने में आगे हैं, कोई खोज करने में आगे है, तो कोई कारीगरी करने में आगे है, कोई चित्रकारी करने में आगे है तो कोई किसी अन्य कार्य में ही चतुर है, कोई आध्यात्मिक चिंतन में आगे है। लेकिन भारतीय वर्ण व्यवस्था में यह भी कहता है कि कोई एक वर्ण का व्यक्ति दूसरे वर्ण के कार्य को कर सकता, यदि वह उसमें निपुण है।

शूद्रों पर अत्याचार कब हुआ ?

शूद्रों पर अत्याचार करना किसने शुरु किया ? शूद्रों पर अत्याचार सर्वप्रथम कब हुआ ?
शूद्रों के ऊपर अनावश्यक रूप से अत्याचार गुलामी के दिनों में हिंदू धर्म विरोधियों द्वारा किया गया और इसका एक मात्र लक्ष्य था हिंदू धर्म को तोड़ना। आप ध्यानपूर्वक पढ़ते जाइए; आप के सभी संदेह दूर हो जाएंगे !


" जातिवाद " कह कहकर; 'जाति' को मिटाने के लिए हिन्दुत्व पर प्रहार करना क्या उचित है ? जातियों की आवश्यकता :-

1. धर्म ही  मनुष्य का आधार है और जातियों के बिना किसी पूर्ण धर्म की कल्पना ही नहीं की जा सकती। इसलिए जातियां अनिवार्य हैं। आप जब पॉजिटिव दिमाग से सोचेंगे तो आप भी इस बात से सहमत हो जाएंगे ! हिंदू धर्म अन्य धर्मों से श्रेष्ठ कैसे बनता है, इस लेख में आप यह भी जानेंगे! पूरा पढ़ते रहिए-

2. हमारा भारत देश जो सोने की चिड़िया कहा जाता था; क्या जिस समय सोने की चिड़िया था, उस समय जातियां नहीं थी ? रामराज्य जिस समय था अर्थात् श्री रामचंद्र के समय, महाराजा विक्रमादित्य के समय, महाराजा भोज के समय, महाराजा चंद्रगुप्त के समय, राजा नल के समय और भी ऐसे प्रतापी राजा हैं जिन्होंने भारत की गरिमा को बढ़ाया है और एक अच्छा शासन करके दिखाया है; क्या उस समय जातियां नहीं थी ?  जातियां थी; लेकिन छुआछूत का भाव नहीं था, जो बाद में हिंदू धर्म को तोड़ने के लिए विरोधियों द्वारा भरा गया।

3. आप देख सकते हैं कि आपका शरीर एक यंत्र के समान है, जिसमें अनेक अंग शामिल हैं। जिस प्रकार से अनेक अंग मिल करके शरीर का निर्माण करते हैं, उसी प्रकार से जातियाँ व उपजातियाॅं मिल करके एक सुचारु रुप से कार्य करने वाले समाज का निर्माण करती हैं। 

चलिए शरीर की रचना वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझते हैं-

मेसाॅन आदि कण →  इलेक्ट्रॉन, प्रोटान, न्यूट्रॉन आदि कण →  परमाणु →  अणु →  जीवद्रव्य →  कोशिकांग →   कोशिका →  ऊतक →  अंग →  अंगतंत्र →  शरीर

आपने देख लिया कि इस प्रकार एक छोटे स्तर के मिलने से बड़े स्तर (शरीर) का निर्माण होता है। ठीक इसी प्रकार से जातियाँ व उपजातियाॅं मिल कर एक सुचारु रुप से कार्यशील समाज का निर्माण करती हैं। 

वनस्पति वैज्ञानिकों द्वारा विश्व के समस्त वनस्पतियों की जानकारी एकत्रित करने के लिए वर्गीकरण का सहारा लिया जाता है जिसमें प्रत्येक वनस्पति को जगत, संघ, उपसंघ, वर्ग, उपवर्ग, गण, कुल, उपकुल, वंश, उपवंश, जाति व उपजातियों में रखा जाता है।

4. भारत देश को चलाने के लिए संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, लोकसभा, राज्यसभा, सांसद, विधायक, महाप्रधान, प्रधान, DM, SP, सचिव इत्यादि पदों को बनाया, ताकि एक देश कार्यशीलता  सुचारु रूप से बनी रहे, तो एक कार्यशील समाज की स्थापना व कल्पना आप बिना जातियों व उपजातियों के कैसे कर सकते हैं अर्थात्‌ असम्भव है।

5. एक विशेष जाति में एक विशेष कार्य करने की कुशलता होती है। हिन्दू धर्म में जाति का निर्धारण जन्म के आधार पर भी होता है और कर्म के आधार पर भी होता है। जन्म से यदि कोई ब्राम्हण है तो वह ब्राह्मण है लेकिन यदि उसका कर्म नीच है तो वह शूद्र की श्रेणी में गिना जाएगा ना कि ब्राह्मण की श्रेणी में। उसी प्रकार यदि कोई जन्म से शूद्र है लेकिन वह शाकाहारी भगवत् प्रेमी इत्यादि है तो उसे भी ब्राह्मण के समान ही माना जाएगा। हमारे हिंदू धर्म में जन्म से अधिक कर्म की ही विशेषता बताई गई।

6. हिंदू धर्म में मूल रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जातियां ही निहित है बाकी सभी बाद में बनी उपजातियां हैं। 

ब्राह्मण होना बहुत बड़ी बात नहीं है, क्योंकि हिंदू धर्म में ब्राह्मण के जो कर्म बतलाए गए हैं वह बहुत ही कठिन है। आज भले ही ब्राह्मण उन कर्मों को न करता हो, ब्राह्मण के कर्मों में सुबह दोपहर शाम संध्या वंदन करना व मंत्रों को जागृत करना इत्यादि प्रमुख है, जो कि बहुत ही कठिन कार्य होता है।

 और शूद्र होना बहुत दुख की बात नहीं है, क्योंकि शूद्र को हिंदू धर्म में बहुत ही कम और आसान कर्म करने के लिए बतलाए गए हैं। इसी प्रकार क्षत्रिय धर्म और वैश्य धर्म भी अनुपम है।

7. आप सिर की समानता पैरों से नहीं कर सकते; ना ही पेट की समानता हाथों से कर सकते हैं; अथवा आप सिर की समानता पैरों, हाथ और पेट से नहीं कर सकते हैं; ना ही पेट की समानता सिर, पैरों या हाथों से कर सकते हैं। लेकिन इनके बिना एक-दूसरे का अस्तित्व भी नहीं है। सभी के अपने अलग-अलग कार्य हैं; ठीक वैसे ही समाज में जाति व्यवस्था भी समाज को सुचारु रूप से कार्यशील रखने के लिए बनाई गई।

" जातिवाद " कह कहकर; 'जाति' को मिटाने के लिए हिन्दुत्व पर प्रहार करना उचित नहीं है ?

हिन्दू धर्म के विरोधियों द्वारा हिन्दू धर्म की गलत व्याख्या करने का प्रयास प्राचीन समय से ही जारी रहा है। अक्सर " जातिवाद ", छुआछूत और सवर्ण, दलित वर्ग के मुद्दे को लेकर हिन्दू धर्मशास्त्रों को दोषी बनाया जाता है, जो की निन्दनीय है। " जातिवाद " मुद्दे पर धर्म शस्त्रों में क्या लिखा है, यह जानना बहुत जरूरी है, क्योंकि इस मुद्दे को लेकर हिन्दू सनातन धर्म को बहुत बदनाम किया जाता है ।


" जातिवाद " व इसके साथ 'जातियों' की निंदा क्यों की जाती है :-

1. पहली बात यह कि जातियां सभी धर्मों, समाज और देश में है। लोगों की टिप्पणियां, बहस या गुस्सा उनकी अधूरी जानकारी पर ही आधारित होता है।

2. कुछ लोग अपने को Popular बनाने के लिए व वोट बैंक के लिए " जातिवाद " की राजनीति करना चाहते हैं, इसलिए वह जातिवाद और छुआछूत को और बढ़ावा देकर समाज में दीवार खड़ी करते हैं। 

कुछ लोग भोग - विलास निजी स्वार्थ के लिए वर्ण व्यवस्था को समाप्त करना चाहते हैं और स्त्रियों की पूर्ण स्वतंत्रतास्वच्छंदता चाहते हैं।

3. दलितों (चमारों इत्यादि) को 'दलित' नाम हिन्दू धर्म ने नहीं दिया है, इससे पहले 'हरिजन' नाम भी हिन्दू धर्म के किसी शास्त्र ने नहीं दिया, हरिजन नाम गांधी जी ने दिया। सवर्ण नाम भी हिन्दू धर्म ने नहीं दिया। आज जो नाम दिए गए हैं, वह पिछले 74 वर्षों की राजनीतिक उपज है और इससे पहले जो नाम दिए गए थे वह पिछले हजारों साल की गुलामी की उपज थे।

बहुत से ऐसे ब्राह्मण हैं जो आज दलित हैं, मुसलमान हैं, ईसाई हैं या अब वह बौद्ध हैं। बहुत से ऐसे दलित हैं जो आज ब्राह्मण समाज का हिस्सा हैं। अब कुछ वर्षों से ऊंची जाति के लोगों को सवर्ण कहा जाने लगा हैं। यह सवर्ण नाम भी हिन्दू धर्म ने नहीं दिया बल्कि कुटिल राजनैतिक लोगों ने दिया।

4. भारत लगभग हजारों सालों तक तरह तरह के आक्रमणकारियों, जिनमें विशेष रुप से 900 साल मुगल और अंग्रेजों की गुलामी में बहुत कुछ खोया है, खासकर हिन्दू समाज ने अपना मूल धर्म और संस्कृति खो दी है। खो दिए हैं देश के कई हिस्से। यह जो भ्रांतियां फैली हैं और यह जो समाज में कुरीरियों का जन्म हो चला है इसमें गुलाम जिंदगी का योगदान है। जिन लोगों के अधिन भारतीय थे उन लोगों ने भारतीयों में फूट डालने के हर संभव प्रयास किए और इसमें वह सफल भी हो गये। समृद्ध हिन्दू संस्कृति को देखकर हिन्दू विरोधियों के मन में ईर्ष्या हुई और और उन्होंने उपयुक्त समय का लाभ उठाकर हिन्दू संस्कृति में अमूल चूल गलत परिवर्तन कर दिया।

5. यह भी जानना जरूरी है कि हिन्दूओं के मूल धर्म शास्त्र कौन से हैं; क्योंकि कुछ लोग उन शास्त्रों का हवाला देते हैं जो असल में धर्म शास्त्र नहीं है। हिन्दुओं का मूल धर्मग्रंथ मात्र वेद हैं, वेदों का सार उपनिषद हैं, जिसे वेदांत कहते हैं और समस्त उपनिषदों का सार गीता (श्रीमद्भागवत गीता) है। इसके अलावा जिस भी ग्रंथ का नाम लिया जाता है वह मूल हिन्दू धर्मशास्त्र नहीं है।

हिंदू धर्म ग्रंथों, गीता में तो कहीं भी भगवान ने शूद्रों का अपमान नहीं किया है। शूद्र यदि भक्त है तो वह भगवान को बहुत ही प्रिय है।

18 पुराण, रामायण और महाभारत - इन ग्रंथों में हिन्दुओं का इतिहास व दृष्टांत दर्ज है, लेकिन कुछ लोग इन ग्रंथों में से संस्कृत के कुछ श्लोक निकालकर यह बताने का प्रयास करते हैं कि ऊंच-नीच की बातें तो इन धर्मग्रंथों में ही लिखी है। असल में यह काल और परिस्थिति के अनुसार बदलते समाज का चित्रण है। आप इनमें से किसी एक बात को उठाकर दृढ़ता से पेश नहीं कर सकते कि तुम्हारे धर्मग्रंथों के अनुसार ऐसा होता है ; क्योंकि किसी एक कार्य को करने के लिए अनेक परिस्थितियाँ होती हैं। हमारे इतिहास में कोई कार्य ऐसा क्यों हुआ, उसकी क्या परिस्थिति थी, आप इस पर विचार तो करेंगे नहीं।

हमारे हिंदू धर्म में लिखा है कि झूठ बोलना पाप है, लेकिन हमारा हिंदू धर्म ही कहता है कि जहां लुटेरों का भय हो, जहां किसी की जान जाने का भय हो; वहां आप झूठ बोल सकते हैं। हमारे हिंदू धर्म में लिखा है कि अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है. लेकिन उसी में यह भी लिखा है कि धर्म के लिए हिंसा करना अहिंसा से भी बड़ा धर्म है। आप आगे की दो लाइनें उठा करके हिंदू धर्म का हवाला देंगे लेकिन पूरी बात नहीं रखेंगे और हिंदू धर्म की बेइज्जती करेंगे। परिस्थितियों के अनुसार हिंदू धर्म में कार्य करने की इजाजत है और उसके भी विशेष-विशेष नियम हैं।

जहां तक मनुस्मृति में "जातिवाद" की बात है, तो सबसे पहले मनुस्मृति को मनु जी ने बताया और वह लिपिबद्ध नहीं थी। जैसे-जैसे लोगों के दिमाग की क्षमता कम होती गई वैसे वैसे इसे लिपिबद्ध किया गया और समय-समय पर कुछ लोगों ने अपने फायदे और बड़प्पन के लिए इसमें कुछ श्लोक जोड़े, इसलिए आज मनुस्मृति की निंदा होती है। वास्तव में मनुस्मृति एक ऐसा संविधान है जो निंदनीय नहीं है, लेकिन इसमें बाद में अपने फायदे के लिए जो परिवर्तन किए गए उन श्लोकों के कारण मनुस्मृति निंदनीय हो जाती है।

दूसरी बात कि, इस बात की क्या गारंटी है की उक्त ग्रंथों में जानबूझकर संशोधन नहीं किया गया होगा। हिन्दू विरोधियों के हाथ में ही तो था, भारत के सभी तरह के साहित्य को समाज के सामने प्रस्तुत करना; तब स्वाभाविक रूप से तोड़ मरोड़कर बर्बाद कर दिया। 

आजादी के बाद और भारत के धर्मनिरपेक्ष बन जाने के बाद भी हिंदू धर्म को दबाने का भरपूर प्रयास किया जाता रहा। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार है। नहीं जानते हैं तो आज जान लीजिए-

कन्हैयालाल मुंशी ने अपनी पुस्तक ‘पिलग्रिमेज टू फ़्रीडम’ में दर्ज किया है ---

"दिसम्बर 1922 में मैं उस भग्न सोमनाथ मन्दिर की तीर्थ यात्रा पर निकला। वहाँ पहुँचकर मैंने मन्दिर में भयंकर दुरवस्था देखी—अपवित्र, जला हुआ और ध्वस्त ! पर फिर भी वह दृढ़ खड़ा था, मानो हमारे साथ की गई कृतघ्नता और अपमान को न भूलने का सन्देश दे रहा हो। उस दिन सुबह जब मैंने पवित्र सभामण्डप की ओर कदम बढ़ाए तो मन्दिर के खमृभों के भग्नावशेषों और बिखरे पत्थरों को देखकर मेरे अन्दर अपमान की कैसी अग्निशिखा प्रज्जवलित हो उठी थी, मैं बता नहीं सकता।"

हिंदू धर्म विरोधियों द्वारा तोड़ा गया सोमनाथ मंदिर

"नवम्बर 1947 के मध्य में सरदार पटेल प्रभास पाटन के दौरे पर थे, जहाँ उन्होंने मन्दिर का दर्शन किया। एक सार्वजनिक सभा में सरदार ने घोषणा की: ‘नए साल के इस शुभ अवसर पर हमने फैसला किया है कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण करना चाहिए। सौराष्ट्र के लोगों को अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान देना होगा। यह एक पवित्र कार्य है जिसमें सभी को भाग लेना चाहिए।’ 
...भारत के हिंदू धर्म विरोधियों और कुछ लोगों ने प्राचीन मंदिर के भग्नावशेषों को प्राचीन स्मारक के रूप में संजोकर रखने का सुझाव दिया, जिन्हें मृत पत्थर जीवन्त स्वरूप की तुलना में अधिक प्राणवान लगते थे। लेकिन सरदार पटेल का स्पष्ट मानना था कि सोमनाथ का मन्दिर कोई प्राचीन स्मारक नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय के हृदय में स्थित पूजा स्थल था जिसका पुनर्निर्माण करने के लिए अखिल राष्ट्र प्रतिबद्ध है।"

"कैबिनेट की बैठक के अन्त में जवाहरलाल ने कहा— मुझे सोमनाथ के पुनरुद्धार के लिए किया जा रहा आपका प्रयास पसन्द नहीं आ रहा। यह हिन्दू पुनरुत्थानवाद है"

सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण होने के बाद उद्घाटन (शुभारम्भ) करने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति डाॅ राजेंद्र प्रसाद तैयार हुए तो, जवाहरलाल नेहरू ने हिन्दू पुनरुत्थानवाद कहकर उन्हें जाने से रोक दिया। 
डाॅ राजेंद्र प्रसाद रात भर सोचते रहे और अंत में उन्होंने निर्णय लिया कि, मैं एक हिंदू के हैसियत से जाऊंगा ना कि राष्ट्रपति के; और फिर डाॅ राजेंद्र प्रसाद दूसरे दिन सोमनाथ मंदिर का शुभारम्भ किये।

सोमनाथ मंदिर


अब आप समझिए कि, भारत को जब आजादी मिली, तो फिर भारत को धर्म के नाम पर दो भागों में बांटा गया- भारत और पाकिस्तान। इसके बावजूद भी हिंदू धर्म विरोधियों ने भारत से सभी मुसलमानों को पाकिस्तान में नहीं जाने दिया और भारत में ही रोके रखा। पाकिस्तान से मुसलमानों ने हिंदुओं को काट-काट कर के ट्रेनों में भरकर भारत भेज दिया और ये लोग भारत में हिंदू-मुस्लिम भाईचारा बनाने की बात करते रह गए। पाकिस्तान को इस्लामिक देश बना दिया और भारत को धर्मनिरपेक्ष बना दिया गया।
भारतीय संविधान के द्वारा भारत में मुसलमानों के लिए मदरसों और मुस्लिम शिक्षा का प्रावधान किया गया। लेकिन हिंदू धर्म की शिक्षा का कोई भी विशेष प्रावधान नहीं किया गया।
और फिर धर्मनिरपेक्ष देश भारत में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के ऐसे बोल थे कि "यह हिंदू पुनरुत्थानवाद" है। यह हिंदू धर्म को दबाने या नष्ट करने की मानसिकता नहीं है, तो क्या है ?


हमारे हिंदू धर्म शास्त्र में कर्मों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है- उत्तम (सात्विक कर्म), मध्यम (राजसी कर्म), और नीच कर्म (तामसी कर्म) । हिंदू धर्म ना ही किसी को उत्तम कर्म करने से रोकता है और ना ही किसी को नीच कर्म करने के लिए प्रेरित करता है। 

कुछ लोगों की अपनी स्वयं की नीच प्रकृति होती है और वह नीच कर्म ही करते रहते हैं। समाज में कुछ लोग होते हैं जो घृणित कर्म करते हैं और वह भी अपनी इच्छा से करते हैं, वह चाहकर भी स्वच्छता व पवित्रता नहीं रख सकते। सदैव बुरे कर्मों में लिप्त रहते हैं। उनसे तपस्या वाले कर्म व उच्च कोटि के कर्म हो ही नहीं सकते। इसलिए वे वेद पाठ के अधिकारी नहीं बतलाए गए और कुछ अन्य कर्मों के अधिकारी नहीं बतलाए गये। हिंदू धर्म ग्रंथों व इतिहास में अनेक ऐसे व्याख्यान व उदाहरण हैं, जिसमें शूद्र जाति के लोगों ने भी अच्छे अच्छे कर्म किए और अच्छी व श्रेष्ठतम पदवी पाई। 

लेकिन शूद्रों का इतना अपमान और अत्याचार; जितना कि बताया जाता है, प्राचीन समय और गुलामी से पहले कभी नहीं हुआ।  हुआ तो केवल गुलामी के समय और उसी गुलामी के समय में हिंदू विरोधियों द्वारा हिंदू धर्म ग्रंथों व इतिहास के पन्नों पर और हिन्दू धर्म विरोधी राजनेताओं व हिन्दू धर्म विरोधियों के जुबान पर।

हिंदू विरोधियों ने चुन चुनकर ऐसी-ऐसी हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली कहानियां गढ़ी व हिन्दू धर्मग्रन्थों में जगह जगह पर बनावटी व कटु श्लोक भरे, जिनके समर्थन में कुछ बातें इन्होंने मनुस्मृति, पुराणों, इतिहास और उपनिषदों में डाल दिया, ताकि वे कहानियाॅं व श्लोक सच्ची लगें, जबकि वे  सरासर झूठ ही हैं और गढ़ी गई हैं। जैसे-

उतस्थ वेद मुप शृण्व तस्त्र पूजा तुभ्य श्रोत प्रतिपूरनम।

उच्चारने जीवहअच्छेदाधरणे हृदय विदारणम्।।

अर्थात अगर शूद्र वेद सुन ले तो कान में गर्म करके शीशा डालो, वेद पढ़े तो जीभ काट दो, अगर याद कर ले तो हृदय को फाड़ दो। ऐसे ऐसे गलत श्लोक हमारे धर्म ग्रंथों में बाद में हिन्दू विरोधियों द्वारा भरे गए जो, कि सर्वदा निंदनीय हैं। 

एक दूसरा उदाहरण - शूद्रक द्वारा रचित मृच्छकटिकम्, जो कि हिन्दू धर्म को तोड़ने के लिए बाद में हिन्दू विरोधियों द्वारा रचा गया एक प्रकरण ग्रन्थ है जिसमें एक ब्राह्मण व वैश्या का प्रेम प्रसंग वर्णित है जो हिन्दू धर्म (सनातन धर्म) को ठेस पहुॅंचाता है। ऐसे और भी कई रचनाएं हैं।

6. कुछ बड़ी जातियों के लोगों ने लगातार छोटी जातियों के प्रति गलत मानसिकता का प्रयोग किया क्योंकि वह उनका स्वार्थपन व अधार्मिक विचार था।


वे कौन हैं जो " जातिवाद " व 'जातियों (वर्ण व्यवस्था)' को समाप्त करने की बात करते हैं:-

1. हिंदू धर्म विरोधी (नास्तिक),
2. वे लोग जो अधर्मियों द्वारा जातिवाद वाली गलत मानसिकता के शिकार हुए होते हैं।
3. मनमाना भोग - विलास करने वाले। वे लोग सोचते हैं कि धर्म हमारे ऊपर बाधा डाल रहा है, इसलिए भी लोग धर्म को तोड़ने के लिए जातियों को खत्म करने की कोशिश करते हैं। 
4. वोट बैंक की राजनीति करने वाले लोग।
5. हिंदू धर्म का विरोध करने वाले वे नास्तिक लोग, जो आध्यात्मिक उन्नति को छोड़कर भौतिक उन्नति पर जोर दे रहे हैं।


जातिवाद तथा 'जातियों (वर्ण व्यवस्था)' पर कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु व 'वर्ण व्यवस्था' व हिंदू धर्म की निंदा करने वालों को जवाब:-

1. जातिवाद - जातिवाद कहकर आप हिंदू धर्म की वर्ण व्यवस्था की निंदा नहीं कर सकते, अर्थात् यदि आप हिंदू धर्म के वर्ण व्यवस्था की निंदा कर रहे हैं तो आप गलत कर रहे हैं। 
आप प्राचीन इतिहास को उठाकर देख लीजिए कि विश्व में यदि कोई देश था जो हर प्रकार से समृद्ध, शक्ति संपन्न तथा चौतरफा विकास (आध्यात्मिक व भौतिक विकास) किया तो वह देश भारत था और जिस समय भारत समृद्ध और हर तरह से संपन्न था उस समय भारत में वर्ण व्यवस्था लागू थी; जो पूर्ण रूप से समाज को क्रियाशील रखी थी और ना ही कोई बेरोजगार था।

2. हमारे हिंदू धर्म में तीन प्रकार की मनुष्य बतलाए गए हैं- सात्विक, राजसी, तामसी 
और तीन प्रकार के गुण भी बतलाए गए हैं- सात्विक, राजसी, तामसी 
तथा तीन प्रकार की प्रकृति भी बनाई गई है- सात्विक, राजसी, तामसी
साथ में कर्मों के तीन प्रकार के फल भी बतलाए गए हैं- सात्विक, राजसी, तामसी

हिंदूओं में ही नहीं; बल्कि पूरे विश्व में जितने भी कर्म होते हैं, वह सात्विक, राजसी अथवा तामसी के अंतर्गत ही होते हैं। जब कोई व्यक्ति अनायास ही किसी जाति विशेष के प्रति घृणा करता है और उसे सताता है तो उसे तामसिक कर्म कहते हैं तथा उस मनुष्य की प्रकृति तामसी होती है, तो फिर हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था को दोष कैसे देने लगे। इसके लिए तो लोक में भी और परलोक में भी दंड का विधान  है।

3. अगर मनुस्मृति का अध्याय 5, श्लोक 148 व 149 का रहा है-

"स्त्री बाल्यकाल में पिता के, युवावस्था अवस्था में पति के और पति का परलोक होने पर पुत्रों के अधीन रहे। कभी स्वतंत्र होकर न रहे।" ।।148।।

"पिता, पति या पुत्र से पृथक रहने की इच्छा ना करें। क्योंकि इनसे अलग रहने वाली स्त्री, दोनों कुलों  पति-पितृ को निंदित करती है।" ।।149।।

तो क्या गलत है ? यही तो हिंदू धर्म की श्रेष्ठता है, जो स्त्रियों के सतित्व और पतिव्रता को कायम रखने में मदद करता है।
ऐसा नहीं है कि पूरी मनु स्मृति निंदनीय है, और इस श्लोक की निंदा हिंदुओं द्वारा नहीं की जाती।अर्धनग्न अवस्था में रहकर कार्य करने वाली स्त्रियों को तो हमारा हिंदू धर्म वेश्याओं की संज्ञा दे देता है, जो कि बिल्कुल सही है।

इन श्लोकों की निंदा किसके द्वारा की जाती है ? जातिवाद कह कहकर जो लोग हिंदू धर्म की वर्ण व्यवस्था और नारी व्यवस्था को गलत मान कर उसे हटाने की मांग करते हैं अर्थात् जातियों को समाप्त करने की मांग करते हैं व स्त्रियों के पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करते हैं; उनकी मानसिकता क्या आप जानते हैं ? उनकी मानसिकता मैं आपको बताता हूं -

वर्ण व्यवस्था को समाप्त करने वाले लोग और हिंदू धर्म से घृणा करने वाले लोगों की मानसिकता यह है कि वे लोग हिंदू विरोधियों और पाश्चात्य लोगों का भोग - विलास देख कर व्याकुल रहते हैं, पाश्चात्य लोगों में जिस प्रकार से कोई व्यक्ति अपनी बहन (Sister) के साथ, भाभी व अपनी पुत्री (Daughter) या किसी भी स्त्री के साथ संभोग (Sex) करता है, उसी प्रकार से यह लोग भी चाहते हैं कि ना हमारे ऊपर वर्ण व्यवस्था रहे और ना ही धर्म; तब हम भी खूब मजे से भोग -  भोगेंगे या भोग - विलास करेंगे;

बीयर बार का नाम आपने जरूर सुना होगा। आज हिंदू धर्म विरोधी या अन्य धर्मों के लोग तथा हिंदू धर्म के वे लोग, जिन्हें अपना हिंदू धर्म अच्छा नहीं लगता या अपने हिंदू धर्म की जानकारी नहीं है अथवा भोग विलास के चक्कर में पड़े हुए अनेक नवयुवक, अधेड़ व वृद्ध लोग भी बीयर बार में जाते हैं और वहां पर क्या होता है, जानते हैं ? वहां पर इन्हीं सब के घरों की स्वतंत्र और आजाद लड़कियां अर्धनग्न अवस्था में आती हैं। वहां पर इन्हीं के घरों के लड़के-लड़कियां और उनके गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड भी आते हैं। जिनका विवाह हो गया है वह भी, और जिनका नहीं विवाह हुआ है वह भी, सब लोग आते हैं और सामूहिक रूप से सभी शराब पी - पी करके एक दूसरे का हाथ पकड़-पकड़,  लिपट- लिपट कर नाचती - गाती हैं, और फिर वहीं कमरों में (प्रेमी-प्रेमिका, गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड, लड़के-लड़कियाँ, नवयुवक-नवयुवतियां) एक दूसरे के साथ संभोग (sex) करते हैं! आज भारत की भी स्थिति बहुत बिगड़ चुकी है, भारत में भी अनेकों बीयर बार स्थापित हो चुके हैं जो  हिंदू संस्कृति को तेजी से बिगाड़ रहे हैं, लोगों को मजे प्रदान कर रहे हैं और समाज में दुष्कर्म और अत्याचार इत्यादि को बढ़ा रहे हैं। 
अपनी सनातन हिंदू संस्कृति लड़के-लड़कियों या पुरुष-स्त्रियों को इस प्रकार की हरकत करने से रोकती है और उन्हें एक अच्छे मार्ग पर चलने का निर्देश देती है; लेकिन ये हिंदू धर्म विरोधी लोग, भोग- विलास के चक्कर में हिंदू संस्कृति की निंदा करते हैं।


अश्लील फिल्मी दुनिया (Bollywood, Hollywood) जिसमें प्रेमी-प्रेमिकागर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड, लड़के-लड़कियाँ, नवयुवक-नवयुवतियांपुरुष-स्त्रियाँ अर्धनग्न अवस्था में कार्य करते हैं और समाज के सामने फिल्म (movie) बनाकर पेश करते हैं; जिसमें पहले हिंदू धर्म विरोधी ही कार्य करते थे। आज के जमाने में इसमें बहुत अच्छा खासा पैसा मिलता है, इस लालच में पड़कर आज के हिंदू धर्म वाले युवक - युवतियां भी अपने हिंदू धर्म की निंदा करते हुए और अपने पवित्र हिंदू धर्म की संस्कृति को इग्नोर करते हुए इस क्षेत्र में जाते हैं। वे लोग मनुष्य जन्म की महत्ता भूल जाते हैं, भूल जाते हैं कि हमारा जन्म किस लिए हुआ है और पाश्चात्य सभ्यता, संस्कृति व विचारधारा को अपनाकर भयंकर  भोग-विलास में पढ़ करके अपनी अनमोल जिंदगी गवा देते हैं। और ऐसे ऐसे महामूर्ख हिंदू धर्म पर अंगुली उठाते हैं, हिंदू धर्म की निंदा करते हैं।
हिन्दू धर्म को तोड़ने व नीचा दिखाने के लिए ये लोग बहुत सा हिन्दू धर्म विरोधी फिल्में (movies) बना चुके हैं, ताकि हिन्दू समाज के बच्चे जब इन फिल्मों को देखें तो उनके मन में हिन्दू धर्म के प्रति घृणा उत्पन्न हो जाए।

कुछ हिन्दू संगठनों की देन है कि कुछ फिल्में हिन्दू धर्म के समर्थन को रखते हुए बनी। कुछ फिल्मों को छोड़कर, पूरी फिल्म इंडस्ट्री व फिल्में ही हिन्दू धर्म विरोधी हैं। 


वर्ण व्यवस्था को समाप्त करने वाले लोग चाहते हैं कि हम भी अपने जाति के लड़कियों के साथ शादी (विवाह) करें या अपने घर में ही शादी (विवाह) करें या किसी अन्य वर्ण की लड़की के साथ शादी (विवाह) करें; चूॅंकि वर्ण व्यवस्था इस प्रकार की हरकतों पर रोक लगाती है, इसलिए उन्हें वर्ण व्यवस्था से नफरत होने लगती है। अतः वे लोग वर्ण व्यवस्था को समाप्त करने की मांग करते हैं केवल अपने अपने स्वार्थ के लिए। आप जानते ही हैं कि डॉक्टर भीम राव अंबेडकर जो दलित वर्ग के थे, पंडिताइन (ब्राह्मण वर्ग की लड़की) से शादी किए थे।

जहाॅं तक हिंदू धर्म में सती प्रथा की बात है और विरोधी लोग इस पर विवाद करते हैं, तो हिंदू धर्म सती प्रथा को कभी भी अनिवार्यता नहीं दिया है, जितना कि आज लोगों को बोल बोल कर के भड़काया जाता है। प्राचीन से प्राचीन इतिहास उठाकर देख लीजिए; कभी भी सती प्रथा को हिन्दू धर्म ने अनिवार्य नहीं बनाया। सती होना स्त्रियों का अपने पति के प्रति एक स्वाभाविक प्रेम था, ना कि कोई जबरदस्ती। हमारे हिंदू धर्म ग्रंथों में हजारों ऐसे प्रमाण उपलब्ध हैं, कि पति की मृत्यु के बाद भी पत्नी समाज में सम्मान के साथ जीवित थी, उनको किसी ने सती होने के लिए विवश नहीं किया। और जो स्त्रियां सती हुई, उन पर सती होने के लिए किसी ने दबाव नहीं डाला गया, बल्कि उनका अपने पति के प्रति स्वाभाविक प्रेम था।

आज भी हिंदू समाज की स्त्रियां अपने पति का नाम नहीं लेतीं, क्या उन्हें कोई मना करता है, कि तुम अपने पति को उनका नाम लेकर मत पुकारो या उनका नाम मत लो ? नहीं ! उनमें अपने पति के प्रति ऐसा स्वाभाविक प्रेम और सम्मान की भावना है, कि उस प्रेम व सम्मान के कारण वे अपने पति का नाम नहीं लेती। जैसा कि आज अन्य धर्म और हिंदू धर्म विरोधी, पाश्चात्य विचारधारा वाली स्त्रियां; अपने पति का नाम लेकर उन्हें पुकारती हैं।

और जिस दिन वर्ण व्यवस्था पूरी तरह से समाप्त हो गई, उस दिन आप स्वयं अपनी आंखों से देख लेंगे कि विकास बढ़ नहीं रहा बल्कि जनता विनाश के गर्त में जा रही हैं। वर्णसंकरता (दोगला, quadroon, hybrid) के प्रभाव को आपने देखा है की नहीं ?

4. शायद आप ना माने, लेकिन सत्य तो यही है कि देश के प्रत्येक स्तर पर विकास तभी हो सकता है जब वर्ण व्यवस्था पूरी तरह से कार्यशील हो; वरना एक सच्चा विकास कभी भी नहीं हो सकता। 
आज जिस प्रकार लोग आध्यात्मिकता को त्याग करके भौतिकता पर जोर दे रहे हैं, वह हमेशा खतरे से भरा रहता है। 
हिंदू धर्म कितना महान है आप इस बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि, विदेशियों ने जो अविष्कार किया है, उससे पहले भारत में उससे बढ़कर वे अविष्कार हो चुके थे। वे लोग हिंदू धर्म ग्रंथों को चुराकर ले गए और उसी पर अधिकांश शोध करते हैं। एक अच्छे और समृद्ध विकास की नींव वर्ण व्यवस्था पर ही निर्धारित है। चारों वर्णों के विशेष सहयोग से ही विकास होता है। 

5.  हमने ऊपर पहले ही कि "शूद्र" शब्द का असली अर्थ - "सेवा कर्म करने वाला, उपनयन संस्कार हीन, तपस्या से हीन और मनोविकारों (काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, आलस्य आदि) को वश में न रख सकने वाला" होता है। लेकिन ऐसा नहीं है कि कोई शूद्र किसी का पैर दबाता था! "शूद्र" वर्ग अपनी कुशलता से कार्य करता था व बदले में आय लेता था  और उसे पूरा सम्मान भी मिलता था ।
लेकिन आज वर्तमान में "शूद्र" शब्द को इतना निंदनीय बना दिया गया है कि हिन्दू धर्म के अनुसार जो जातियाँ "शूद्र" वर्ग में आती हैं, वे "शूद्र" शब्द से घृणा करने लगी हैं, जो उनका भ्रम है। जरा सोचिए-

प्राचीन काल के जितने भी आश्चर्यजनक मंदिर हैं जैसे- तमिलनाडु का नेल्लयाप्पर मंदिर, कोणार्क का सूर्य मंदिर व भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में लाखों स्थानों पर प्राचीन काल के पत्थरों से बने सुन्दरतम मंदिर शूद्रों ने ही तो बनाये हैं कि कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य वर्ग का बना दिया, शूद्र ही तो कारीगर व मजदूर थे ! अगर उस समय शूद्रों का सम्मान नहीं होता, उनको अच्छी सुविधाएँ व आय नहीं दी जाती तो क्या उनकी कुशलता बढ़ सकती थी ? उनको अच्छी सुविधाएँ, सम्मान व आय दी गयी तभी वे कुशल हो सके ! ऐसा नहीं है कि "शूद्र" वर्ग अपने गले में हांड़ी और पीछे झाड़ू बांधकर ऐसा कार्य किया।

राजाओं का रथ हांकने वाले भी "शूद्र" वर्ग के ही थे। घोड़ों व हाथियों की देखरेख करने वाले भी "शूद्र" वर्ग के ही थे। भोजन बनाने वाले "शूद्र" वर्ग के ही लोग थे। ऐसा नहीं है कि ये अपने गले में हांड़ी और पीछे झाड़ू बांधकर ऐसा कार्य करते थे।

अनेक पुरातात्विक प्रमाण हैं जिनसे इस मत को बल मिलता है कि ताॅंबे और लोहे के निष्कर्षण की तकनीकी सर्वप्रथम भारत में ही विकसित हुई थी। ऋग्वेद के अनुसार 1000 से 420 BCE में चर्म संस्करण और कपास को रंगने का कार्य होता था। उत्तर भारत में काली पाॅलीश वाले मिट्टी के बर्तनों की सुनहरी चमक को दोहराया नहीं जा सकता और अब भी एक रासायनिक रहस्य है। यह तथ्य आज भारत में रसायन विज्ञान में पढ़ाया जाता है। क्या इस कर्म को ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य के लोग करते थे ? नहीं ना ! इस कर्म को केवल शूद्र वर्ग के लोग ही करते थे; लेकिन वे अपने गले में हांड़ी और पीछे झाडू बांधकर नहीं करते थे बल्कि सम्मान के साथ करते थे; तब आज उनके किए हुए पर पूरा विश्व रिसर्च करता है।

महर्षि रैक्व ने क्षत्रिय राजा जानश्रुति को 'शूद्र' इसलिए कहा था क्योंकि राजा जानश्रुति धन के अभिमान से गर्वित था और प्रतिष्ठा के लिए शोकातुर होकर महर्षि रैक्व से ब्रह्म विद्या का उपदेश चाहता था। राजा जानश्रुति, महर्षि रैक्व से ब्रह्म विद्या का ज्ञान पाने के लिए, महर्षि रैक्व के पास बारी - बारी से चार बार धन-संपदा लेकर आया और महर्षि रैक्व को धन से प्रलोभित करना चाहा। इसलिए  महर्षि रैक्व ने उस राजा को शूद्र कहकर संबोधित किया।

6. राजा नल और महारानी दमयंती की कथा में जब बाहुक राजा ऋतुपर्ण का रथ हांक रहे थे, तो अचानक एक स्थान पर राजा ऋतुपर्ण का दुपट्टा नीचे गिर गया। उन्होंने बाहुक से कहा- रथ रोको ! मैं दुपट्टा उठवा लूॅं। बाहुक ने कहा- आपका वस्त्र गिरा तो अभी है परंतु अब हम वहां से एक योजन  (12km) आगे निकल आए हैं, अब वह नहीं उठाया जा सकता। जिस समय यह बात चल रही थी, उस समय वह रथ एक वन को पार कर रहा था। ऋतुपर्ण ने कहा - बाहुक !  तुम मेरी गणित विद्या देखो। सामने के वृक्ष में जितने पत्ते और फल देख रहे हैं उनकी संख्या इतनी हैं, तुम्हारी इच्छा हो तो गिन लो! बाहुक ने तुरंत रख खड़ा कर दिया और कहा कि मैं इस वृक्ष को काटकर इनके फल और पत्तों को ठीक-ठीक गिनकर निश्चय करूंगा। बाहुक ने वैसा ही किया। फल और पत्ते ठीक उतने ही हुए जितने राजा ऋतुपर्ण ने बतलाए थे।
क्या उस समय वर्ण व्यवस्था नहीं थी ? इतने महत्वपूर्ण ज्ञान आज विलुप्त हो चुके हैं।

7. रामायण में भी उल्लेख है कि जब रामचन्द्र जी छोटे थे और विद्याध्ययन के लिए गुरुकुल में गये तो वहाॅं शूद्र जाति (निषाद) के लोग भी समान शिक्षा पा रहे थे और उस समय भी वर्ण व्यवस्था थी और यही नियम महाराजा विक्रमादित्य, महाराजा भोज, महाराजा चन्द्रगुप्त से होते हुए सम्राट अशोक तक आया। 

हाॅं ! अब हम बताते हैं कि गड़बड़ी कब और कैसे हुई ? 

चक्रवर्ती सम्राट अशोक (संस्कृत: अशोकः ) (ईसा पूर्व 304 से ईसा पूर्व 232) विश्वप्रसिद्ध एवं शक्तिशाली भारतीय मौर्य राजवंश के महान सम्राट थे। जब कलिंगों से अशोक का सामना हुआ तो उस युद्ध में दोनों पक्षों का भीषण नरसंहार हुआ। उस भीषण नरसंहार को देखकर सम्राट अशोक का हृदय पिघल गया और वह बौद्धों के अहिंसा नामक सिद्धांत से प्रभावित होकर अस्त्र-शस्त्र रख दिए और भविष्य में फिर कभी युद्ध ना करने की घोषणा कर दी। 
उनका यह कार्य अत्यधिक निंदनीय है, क्योकिं बौद्ध धर्म, हिन्दू धर्म के ही कुछ सिद्धांतों को लेकर बनाया गया है। हिंदू धर्म में ही लिखा है कि "अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च" लेकिन बौद्धों ने सिर्फ अहिंसा शब्द को उठाया। अशोक को यह सोचना चाहिए था कि, जब हमारा हिंदू धर्म यह कह रहा है कि धर्म की रक्षा के लिए हिंसा करना उचित है; तो कम से कम अशोक को सोचना चाहिए था यदि मैं भविष्य में फिर युद्ध नहीं करूंगा तो हमारी प्रजा अन्य विदेशी आक्रमणकारियों का गुलाम हो जाएगी और वह हमारी प्रजा के साथ क्या दुर्व्यवहार करेंगे ? कम से कम अशोक को यह सोचना चाहिए था ! और इसी के बाद से भारत गुलामी की बेड़ियों में जकड़ता गया क्योंकि जब आप स्वयं शस्त्र रख देंगे तो दुश्मनों से सामना कैसे करेंगे ? शस्त्र आप रख रहे हैं, आपके दुश्मन तो शस्त्र नहीं रख रहे हैं ! कम से कम राजा अशोक को इतना सोचना चाहिए था। 
अशोक के युद्ध ना करने की घोषणा के उपरांत भारत पर तरह-तरह के आक्रमणकारियों ने आक्रमण किया और धीरे-धीरे भारत के कई हिस्सों पर अपना कब्जा कर लिया और भारत लम्बे समय के लिए गुलाम हो गया। भारत के गुलामी की कहानी बहुत लम्बी और करूणायुक्त है, क्योंकि भारत देश लगभग 300 ईसापूर्व से लगातार बाहरी आक्रमणकारियों के भयंकर आक्रमणों को सहता चला आ रहा है।

शूद्रों पर अत्याचार करना किसने शुरु किया, आप नीचे पायेंगे -

उसी गुलामी के दिनों में हिंदू धर्म विरोधियों ने हिंदू धर्म को जमकर तोड़ा और उसमें तरह - तरह के गलत परिवर्तन किया। हिंदू धर्म को निंदनीय बनाने के लिए हिन्दू धर्म ग्रन्थों में अनेक जगहों पर प्रक्षिप्त अंश जोड़ा गया ताकि हिन्दू अपने धर्म से विमुख होकर अन्य धर्मों की ओर चले जाएं और हिंदू धर्म की महत्ता समाप्त हो जाए। हिंदू धर्म की अनेक पुस्तकों को, जिसमें आध्यात्मिक विज्ञान तथा आश्चर्यजनक खोजों का वर्णन था, उसके माध्यम से खोज होता था; उन लाखों पुस्तकों को फुकवा दिया गया और कुछ पुस्तकों को विदेशियों द्वारा विदेश में ले जाया गया।

इसी समय, जब हिंदू धर्म को नष्ट किया जा रहा था तब अन्य धर्मों के लोगों के द्वारा और विदेशी आक्रमणकारियों के द्वारा स्थापित जो जमींदार थे उनके (हिन्दू विरोधियों) द्वारा हिंदू समाज के रीढ़ माने जाने वाले शूद्रों पर ही जमकर अत्याचार किया गया, शूद्रों के ऊपर ही कुठाराघात किया गया।
इसी समय, हिंदू धर्म ग्रंथों में शूद्र ऊपर अत्याचार के नियम भरे गए ताकि आने वाली भविष्य की हिन्दू पीढ़ियाॅं शूद्रों के प्रति अत्याचार के लिए हिन्दू धर्म से घृणा करें और हिंदू धर्म से टूटकर अलग हो जाएं और अन्य धर्म को ग्रहण कर लें।

यही गलती भारतीय शासक पृथ्वीराज चौहान ने भी दोहरा दिया; जब मोहम्मद गौरी ने युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की सेना के सामने गाय के झुंड को दौड़ा दिया तो इन्होंने हथियार रख दिए ! अगर ए गायों पर वार कर देते तो लंबे समय के लिए मुगलों के गुलाम नहीं होते और शायद ना ही आज भारत में गाय कटती।

महाभारत में ऐसा वर्णन आता है कि, जब ऋषि-मुनि वेद व्यास जी से यह पूछने के लिए गए कि, चारों वर्णों में श्रेष्ठ कौन है ? तो उन्होंने ब्राह्मण को न बताकर शूद्र को ही श्रेष्ठ कहा है; क्योंकि वे जानते थे कि समाज के अधिकांश कार्यों को करने वाली 75% जातियाॅं शूद्र वर्ग से सम्बन्धित हैं। 
परंतु हिंदू ग्रंथों में गुलामी के समय हिन्दू विरोधियों द्वारा सोची समझी साजिश के तहत ऐसे ऐसे अंश भरे गए, जो हिंदू धर्म में शूद्रों पर अत्याचार के प्रति हिन्दू धर्म से घृणा उत्पन्न करते हैं।

आप महाभारत का ही दृष्टांत ले लीजिए; महाभारत में महाराजा धृतराष्ट्र के महामंत्री विदुर थे, जो कि एक शूद्र जाति के थे और उनको एक विशेष सम्मान भी प्राप्त था। उनके द्वारा बताई गई विदुर नीति भारत में हिंदूओं के मन में एक अपूर्व निष्ठा उत्पन्न करती है जो कभी कटती नहीं।

 ऐसा नहीं है कि भारत में शूद्रों को पहले से अपमानित किया गया है, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। यह बाद में हिंदू धर्म को तोड़ने के लिए सोची-समझी साजिश के तहत शूद्रों को अपमानित किया गया और उन पर अत्याचार किया गया, लेकिन भारत के प्रत्येक हिस्से में नहीं हुआ, केवल कुछ चुनिंदा जगहों पर हुआ तथा मनुस्मृति व अन्य हिंदू धर्म ग्रंथों में जगह-जगह अत्याचार करने वाले वाक्य भरे गए ताकि आगे आने वाली पीढ़ी हिंदू धर्म से अलग हो जाए और अन्य धर्मों को ग्रहण कर ले। 


8. आज वर्तमान युग में हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था की निंदा करने वाले हिन्दू विरोधी व भ्रमित हिंदू भी हिंदू धर्म के देवी-देवताओं (श्री राम, श्री कृष्ण, मां दुर्गा, मां सरस्वती, ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि), वेदों के सूक्त जिसमें खासकर पुरुष सूक्त, रामायण, महाभारत, पुराण, कुम्भ मेला, त्यौहार, हिन्दू धर्म के महर्षि (वेदव्यास, वाल्मीकि, शंकराचार्य आदि) और हिंदू धर्म की आध्यात्मिकता को भी गलत साबित करने में अपनी पूरी कोशिश लगा देते हैं लेकिन गलत साबित नहीं कर सकते हैं, सिर्फ कहीं गलत बोल कर पतली गली से निकल जाते हैं।

हिंदू धर्म की विरोधी और भ्रमित हिंदू 'केवल वेद पढ़ो, केवल वेद पढ़ो' की रट लगाते हैं,  वेदों के अलावा हिंदू धर्म के सभी ग्रंथ झूठे हैं, झूठे कैसे कहते हो, महामूर्खों ! 
जबकि उन नादानों को इतना भी पता नहीं है कि हमारे अन्य हिंदू धर्म ग्रंथ क्या है ? अरे मूर्खों ! वेदों की भाषा सबके समझ में आ जाती है क्या ? अच्छे - अच्छे लोगों ने तो वेदों का गलत अनुवाद कर दिया। स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी वेदो का गलत अनुवाद कर दिया; इसीलिए तो एक बार बवाल हुआ था और तब से स्नातकोत्तर स्तर पर वेदों का जो अंश पढ़ाया जाता है, वह करपात्री जी और आचार्य सायण का अनुवाद पढ़ाया जाता है ना कि स्वामी दयानंद सरस्वती का; क्योंकि स्वामी दयानंद सरस्वती ने वेदों का गलत अनुवाद किया !

वेद का एक शब्द है और भी ऐसे अनेक शब्द हैं लेकिन उस शब्द का अनुवाद स्वामी दयानंद सरस्वती और अन्य पाश्चात्य विद्वान पशु बलि से निकालते हैं, लेकिन उसी को करपात्री जी, आचार्य सायण और यास्क ने दूध से बने हुए भोज्य पदार्थ की बलि से निकाल चुके थे। हिन्दू विरोधी लोग सिर्फ गलत अर्थ निकालकर, हिंदू धर्म को बदनाम करने की कोशिश करते हैं।

स्वामी दयानंद सरस्वती ने वेदों का वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर अनुवाद किया और यह अनुवाद गलत सिद्ध हुआ क्योंकि वेद आध्यात्मिक दृष्टिकोण रखते  हैं ना कि आज का वैज्ञानिक दृष्टिकोण।

यही हिंदू सभ्यता, जो प्राचीन समय समय से वर्ण व्यवस्था को धारण की हुई है, इसने प्राचीन समय में जो आविष्कार किए उनके लाभ अधिक थे और हानि नहीं थी। पहले आविष्कार समाज की स्थिति, पर्यावरण की स्थिति और हर प्रकार के लाभ-हानि को देखकर होती थी, तब भारत सोने की चिड़िया था, ऐसे ही नहीं था।

वेदों के पाठ (पढ़ने) का नियम अलग होता है, वेद पाठ के संग मुद्राओं की स्थिति अनिवार्य होती है, मन और तन में भक्ति होना आवश्यक है, वेदों की निंदा मन में नहीं आनी चाहिए, तब जाकर वेदों का सही अनुवाद हो पाता है ! सभी के बस की बात है क्या कि वेदों की भाषा को समझ जाएगा ? वेदों की रचना अलौकिक संस्कृत में की गई है, सामान्य संस्कृत तो पढ़ी नहीं जाती, संस्कृत से तो ईर्ष्या होती है, अंग्रेजी पढ़ाओ, अंग्रेजी को राष्ट्रभाषा करो, अंग्रेजी बिना मनुष्य मरा हुआ है, और "केवल वेद पढ़ो, केवल वेद पढ़ो, केवल वेद पढ़ो" की रट लगाते हैं।

अनेक हिंदू विरोधी और भ्रमित हिंदू, जो वर्ण व्यवस्था की निंदा करते हैं, हिंदू धर्म ग्रंथों की निंदा करते हैं, हिंदू देवी-देवता और महर्षियों की निंदा करते हैं; उनकी स्थिति जानते हैं आप ? 
वे लोग जूते पहनकर भोजन करते हैं, जूते-चप्पल पहनकर अध्ययन करते हैं या किताब पढ़ते हैं, सोने-जागने का तरीका नहीं पता है, समाज में बोलने-चलने का तरीका नहीं पता है, माता-पिता व बड़ों से बात करने का तरीका नहीं पता है, गुरूजनों से बात, व्यवहार व सम्मान करने का तरीका नहीं पता है,  पूरी पाश्चात्य पद्धति को अपना लिए हैं और हिंदू धर्म पर उंगली उठाते हैं, हिंदू धर्म को नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं।

हमारे हिंदू धर्म के महर्षियों ने कुछ सरल और सुबोध भाषा में पुराणों, स्मृतियों आदि को सामान्य जनता के लिए और सभी के लिए प्रस्तुत किया ताकि सभी के समझ में आ जाए कि हमारे वेदों का क्या आदेश है।  

हिंदू विरोधियों से अपील है कि, वे जमीनी स्तर पर हिंदू समाज में जाएं और वहां के प्रचलित देवी- देवताओं का खंडन करें ! हमें पूरा विश्वास है कि वहां का हिंदू समाज उनको जूता निकालकर 4-4 जूता उनके सिर पर मार देगी।

हिंदू समाज का हिंदू देवी-देवताओं के प्रति आस्था होती है, कोई अंधविश्वास नहीं होता। जो अंधविश्वास मानता है, वो मानता हो। 

यह सभी लोग जानते हैं कि भारत में अनेक रोगों की चिकित्सा और सुख-शांति हिंदू देवी-देवताओं के द्वारा ही लोग प्राप्त करते हैं।

भारत में आक्रमणकारियों के वंश का मुगल शासक अकबर ने जब तुलसीदास जी को कारागार में बंद कर दिया गया, उस समय कारागार में ही तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा की रचना की और कई बार पाठ किया, उसके प्रभाव से कारागार के चारों तरफ बंदरों का भारी झुंड इकट्ठा हो गया और आक्रामक हो गया। तब विवश होकर अकबर ने तुलसीदास को कारागार से मुक्त कर दिया। हिंदू विरोधियों और हिंदू धर्म का खंडन करने वालों के पास इसका कोई जवाब नहीं है।

महाराष्ट्र में एक शिव जी का मंदिर है। जब उस पर मुगल आक्रमणकारियों ने आक्रमण किया और उस मंदिर को तोड़ना चाहा तो उस मंदिर के शिवलिंग से अनगिनत भंवरे (भ्रमर:) निकलने लगे और मुगलों को डंक मारने लगे जिससे सभी मुगल वहां से भाग खड़े हुए तथा शिवलिंग और मंदिर टूटने से बच गया। उस शिवलिंग में आज भी तमाम छेद बने हुए हैं जो घटना को बताते हैं। ऐसी महत्ता है हिंदू धर्म की। 
हिंदू धर्म की यदि कोई डायरेक्ट परीक्षा लेना चाहे तो भगवान उसकी परीक्षा में पास नहीं होते क्योंकि यही तो भगवान की माया है। चमत्कार और महिमा; समय, परिस्थिति, भगवान की इच्छा, पुजारी व भक्तों की आस्था के माध्यम से आती है, ऐसा नहीं है कि चलो मैं मंदिर को तोड़ देता हूं, देखूं कौन बचाता है। मंदिर तो तमाम तोड़े गए लेकिन बहुत से मंदिर को विरोधी लोग नहीं तोड़ पाए। कुछ मंदिरों को भक्तों ने बलपूर्वक बचाया, तो कुछ मंदिर स्वयं के चमत्कार के कारण बच गये।
अगर भक्तगण अध्यात्म बल का प्रयोग किए होते तो न एक मंदिर टूटता, न ही वे लोग किसी का गुलाम हुए होते।

महाराजा जनक के समय की बात है। जब सीता जी का विवाह नहीं हुआ था, तो सीता जी का अपहरण करने के लिए बार-बार उनके दुश्मन आक्रमण करते थे और धीरे-धीरे उनकी बहुत सी सेना लड़कर समाप्त हो गई। तब जनक जी ने ऋषि-मुनियों की मंडली बैठाई और उसमें तय हुआ कि अब यज्ञ के माध्यम से सेना को उत्पन्न किया जाएगा और फिर लड़ाई लड़ी जाएगी। फिर राजा जनक जी ने यज्ञ करवाया जिससे इतनी अधिक सेना उत्पन्न हुई कि जितने भी आक्रमणकारी राजा लड़ाई करने आते वह सेना उनको पछाड़ देती और राजा जनक विजयी हुए तथा सभी राजा पराजित हो गए।

रामायण में एक कहानी आती है, जिसमें यह वर्णित है कि; एक बार राजा जनक तपस्या करने के लिए वन में गये थे और ध्यान लगाकर तपस्या में लीन थे। उसी मौके का फायदा उठाकर लंका नगरी का शासक रावण ने उनके नगर पर आक्रमण करने के लिए अपनी सेना लंका से निकालनी चाही। तपस्या में लीन महाराजा जनक को यह जानकारी आध्यात्मिक रूप से मिल गई और उन्होंने मंत्र शक्ति के द्वारा संपूर्ण रावण की सेना को स्तंभित कर दिया, और उनके नगर पर किसी भी प्रकार से रावण का आक्रमण ना हो सका क्योंकि लंका में ही रावण की समस्त सेना महाराजा जनक के मंत्र के प्रभाव से स्तंभित हो गई थी। क्या आज का यह केवल भौतिक उन्नति करने वाला विज्ञान और मनुष्य इस प्रकार के चमत्कार कर सकते हैं ? कभी नहीं। ऐसे चमत्कार केवल हिन्दू धर्म में ही देखने को मिलते हैं।

आज धर्म को प्राथमिकता नहीं दी जाती, ना ही इस पर कोई शोध चलाया जाता है कि हमारे वे आध्यात्मिक बल, विषय, विज्ञान, पराक्रम कहां है ?

और यही कारण है कि जैसे-जैसे हिंदू शासक और हिंदू लोग अपने आध्यात्मिक बल को, अध्यात्मिक पराक्रम को, आध्यात्मिक ज्ञान को भूलते गए और इग्नोर करते गए और विलासी होते गए; वैसे वैसे अन्य आक्रमणकारियों के गुलाम होते गए और अपनी संस्कृति को खोते गए। आध्यात्मिक बल और दिव्यास्त्र महाराजा विक्रमादित्य के समय तक थे और इसके बाद के इतिहास में आध्यात्मिक पराक्रम देखने को नहीं मिलता।

अभी हाल ही में एक गांव में एक जादूगर जादू दिखा रहे थे। यह कोई बहुरूपिया नहीं था बल्कि सच्चा जादूगर था। वह अपने जादू में अपने साथ लाए लड़के का सिर काट कर अलग करने वाला जादू दिखा रहा था। जैसे ही उन्होंने लड़के को सुला करके लड़के का सिर कांटा, किसी अन्य जादूगर ने जो उस गांव में रहता था, उस जादूगर के जादू को बांध दिया। फिर वह जादूगर अपने उस लड़के का सिर जोड़ नहीं पा रहा था और बहुत ही चिंतित हो गया तथा यह घटना पूरे क्षेत्र में आग की तरह तुरंत फैलने लगी। पुलिस वाले भी आ गए कि तुमने मानवता का हनन किया है। अंधविश्वास में पढ़कर ऐसा काम किया है। जादूगर ने कहा सिर्फ हमें 20 मिनट का मौका दो और मैं अपने साथ लाए बच्चों को जीवित कर दूंगा। किसी ने मेरा जादू बांध दिया है, उसने मानवता का हनन किया है, हमने नहीं। पुलिस वालों ने मौका दिया। वह जादूगर अपने बैग में से एक लौकी का बीज निकाला और उस लौकी के बीज को जमीन में कुरेद कर गाड़ दिया और मंत्र पढ़कर पानी गिरा दिया। 10 मिनट के अंदर ही वह लौकी का बीज बढ़ कर पूरा रुप ले  लिया और उसमें लौकी भी लग गई, फिर उसने लौकी को तोड़ कर के कहा कि अब भी वक्त है, जिसने मेरा जादू बांधा है, वह छोड़ दे, नहीं तो अपनी जान से हाथ धो बैठेगा। लेकिन जिसने जादू बांधा था, उसने जादू नहीं छोड़ा। फिर जादूगर ने तुरंत चाकू निकालकर कि उस लौकी को बीच से काट दिया और देखते ही देखते बगल में किसी पेड़ पर बैठा हुआ दुष्ट गुप्त जादूगर बीच से कटा हुआ गिर गया और वही मर गया तथा लड़का जीवित हो गया। क्या यह अंधविश्वास है।

आज भी गांवों में तमाम जादूगर जादू दिखाने के लिए आते हैं, जिसमें वे लड़के को कभी पंछी बना देते हैं, तो कभी देखते ही देखते सबके सामने नाग बना देते हैं। क्या विज्ञान इसे सिद्ध कर देगा ? मिट्टी से मिठाई बना देते हैं और खिला भी देते हैं। पत्तों को रुपए बना देते हैं। क्या इनका क्या हिंदू धर्म विरोधी जवाब दे सकते हैं ? कहीं नहीं दे सकते। जहां पर सिद्ध जादूगर अपना जादू दिखाता है, वहां पर यदि हिंदू विरोधी जा करके उससे तर्क करेंगे तो हिंदू विरोधी के मुंह पर कालिख लग जाएगी।


एक छोटे से जादू, जो कि हिंदू धर्म से ही उत्पन्न होता है; ज्योतिष विद्या, जो हिंदू धर्म का ही अंग है, उसका उत्तर तो हिंदू विरोधी दे ही नहीं पाते और पूरे हिंदू धर्म को ही गलत साबित करने में अपनी अनमोल जिंदगी बर्बाद कर देते हैं।

ग्रह और नक्षत्रों का सर्वप्रथम जानकारी देने वाला ज्योतिष शास्त्र हिंदू धर्म का ही अंश है। आज भी ज्योतिषाचार्य और ज्योतिष विद्या 100 - 200 साल या जितने भी साल कहे, उतने साल पहले की ग्रह- नक्षत्रों की स्थिति की जो भविष्यवाणी कर देता है, उसको विज्ञान भी आश्चर्य खाता है और विज्ञान की भविष्यवाणियाॅं झूठे हो जाते हैं लेकिन ज्योतिष शास्त्र के भविष्यवाणियाॅं कभी झूठ नहीं हुए।

भौतिक, रासायनिक और जीव वैज्ञानिक सर्वप्रथम हिंदू धर्म से ही उत्पन्न हुए हैं और जहां से  अध्यात्मिकता शुरू होती है वहां पर विज्ञान समाप्त हो जाता है, यह सभी ज्ञानी पुरुष जानते हैं।


रामचरितमानस की चौपाई "ढोल गवांर सूद्र पसु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी" की समीक्षा:-

बहुत महत्वपूर्ण बात ! रामचरितमानस की इस चौपाई पर बहुत ही अधिक बहस और बवाल होते हैं और इस बहस में वे लोग भी शामिल हो जाते हैं जो रामचरितमानस को पूरा पढ़े भी नहीं है, सिर्फ सुन लिए और विरोध करने के लिए खड़े हो गये कि ताड़ना, मतलब, शूद्र को, स्त्री को मारने-पीटने के लिए लिखा है। विशेषकर “सूद्र” एवं “नारी” शब्द को लेकर वामपंथियों और छद्म नारीवादियों  द्वारा इसकी निंदा की जाती है। आइये इसे समझते हैं।

अरे ! इस पर बहस करने से पहले पूरी रामचरितमानस को पढ़ो, रामचरितमानस कब लिखा गया, इस पर क्या क्या बवाल हुआ ? इसके बारे में जानकारी एकत्रित करो, फिर बहस करो कि रामचरितमानस में यह गलत लिखा गया है। चलिए हम इस चौपाई की समीक्षा करते हैं और बताते हैं कि यह चौपाई गलत नहीं है, यह चौपाई सही है।

Ramcharitmanas

जब भारत पर मुगल शासक अकबर का शासन था, उस समय रामचरितमानस की रचना की गई। इस रामचरितमानस के रचनाकार गोस्वामी तुलसीदास जी हैं, जो अनेक भाषाओं के जानकार और अयोध्या में ही रहकर उस समय की स्नातकोत्तर तक की पढ़ाई किए थे। इस महाकाव्य का निर्माण 76 साल की उम्र में इन्होंने किया था। रामचरितमानस भारतीय संस्कृति में एक विशेष स्थान रखता है और रामचरितमानस की लोकप्रियता अद्वितीय है।

जब तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की रचना की, तो रामचरितमानस पर जमकर बवाल हुआ क्योंकि हिंदू धर्म के सभी ग्रंथ संस्कृत में थे और तुलसीदास जी ने इस ग्रंथ की रचना सरल और सुबोध अवधी भाषा में किया जिसमें संस्कृत, हिंदी और भारत के कई क्षेत्रों की भाषाएं सम्मिलित हैं। 

रामचरितमानस पर बवाल सिर्फ दो बातों को लेकर हुआ - 
पहला; यह संस्कृत भाषा में क्यों नहीं है ? 
दूसरा;  "ढोल गवांर सूद्र पसु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी" नामक चौपाई पर।

बवाल इतना अधिक बढ़ गया कि रामचरितमानस को फूंकने की नौबत आ गई या रामचरितमानस को जला देने की स्थिति उत्पन्न हो गई। अनेक हिंदू धर्म के विद्वान इसके पक्ष में भी थे और विपक्ष में भी विद्वानों की कमी नहीं थी। 

बहुत भारी धार्मिक पंचायत हुई, जिसमें यह निर्णय लिया गया कि यदि भगवान शंकर की सहमति इस ग्रंथ को मिले, तभी इस ग्रंथ को सही माना जाएगा अन्यथा गलत। इसके लिए श्री रामचरितमानस को वाराणसी में श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में सभी ग्रन्थों के नीचे रखा जाएगा और यह शर्त लगाई गई कि यदि सुबह यह ग्रंथ अपने आप सभी ग्रंथों के ऊपर रहेगा तभी इस ग्रंथ को सही माना जाएगा अन्यथा गलत माना जाएगा।
बिल्कुल ऐसा ही हुआ; रामचरितमानस को श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में सभी ग्रंथों के नीचे रखा गया और मुगल सैनिकों के कड़े पहरेदारी लगायी गयी और धर्मगुरुओं की देख रेख में, ताकि कोई रात्रि में मंदिर में प्रवेश न कर सके, कड़ी निगरानी रखी गयी। इसके पक्ष में जितने विद्वान थे उन्होंने भगवान हरि नाम कीर्तन करना प्रारंभ किया। 

जब रात्रि के 12:00 बजे या अर्धरात्रि हुई, तब मंदिर के सभी घंटे एकाएक जोर जोर से बजने लगे और जब सुबह दरवाजा खोला गया तो रामचरितमानस सभी ग्रंथों के ऊपर था और उस पर भगवान शिव के द्वारा सत्यम् शिवम् सुन्दरम् नाम से हस्ताक्षर भी हो गये थे। यह घटना सभी को दहलाकर रख दी और शासक अकबर भी विचलित हो गए। तब जाकर के इस ग्रंथ को महत्ता मिली। अब बात करते हैं चौपाई की समीक्षा पर-

"ढोल गवांर सूद्र पसु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी" यह चौपाई रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड में 58 व 59वें दोहे के बीच 6वीं चौपाई है। यह चौपाई समुद्र श्री रामचन्द्र के बीच वार्तालाप की स्थिति का वर्णन करता है। पूरा अंश इस प्रकार है-

दो0- बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।

लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।।
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।।
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा।।
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।।
संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।

दो0- काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।58।।
–*–*–
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।
प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।।
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।।

दो0- सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ।।59।।

जब भगवान श्री रामचंद्र जी समुद्र को पार करने के लिए समुद्र की इच्छा मांग रहे थे, तो समुद्र भगवान रामचंद्र जी की उपासना को नहीं समझ रहा था कि भगवान रामचंद्र जी क्या चाहते हैं ? 3 दिन तक समुद्र की पूजा करने के बाद भी समुद्र प्रगट नहीं हुआ, इसलिए श्री रामचंद्र जी ने क्रुद्ध होकर लक्ष्मण से कहा कि लक्ष्मण ! हमारा धनुष बाण लाओ; मैं अभी समुद्र को सुखा देता हूं। जब उन्होंने आग्नेयास्त्र का संधान किया तो पूरा समुद्र उबलने लगा। तब समुद्र ने डरकर अपना रूप धारण किया और श्री राम जी के सामने उपस्थित हुआ और वह इस प्रकार से श्री रामचंद्र जी की विनती कर रहा है कि हे प्रभु ! मुझे दास पर दया कीजिए!

अवधी भाषा में ' ताड़ना ' का अर्थ ' देखना (समझने के अर्थ में, परखना, भाँपना) ' होता है, साथ ही यह श्लेष अलंकार (बहू अर्थी) युक्त शब्द है अर्थात् प्रत्येक संज्ञा के लिए अलग प्रकार से अलग अर्थ; जैसे- "हमने तो उसकी बात पहले ही ताड़ दी थी या वह हमारी बात तुरंत ताड़ गया।"  
लेकिन लोग ताड़ना का अर्थ मारना-पीटना निकालते हैं और तुलसीदास जी द्वारा लिखे गए श्री रामचरितमानस की निंदा करते हैं; यह निंदा करने वालों की मूर्खता है। एक कहावत प्रचलित है “अर्थ का अनर्थ करना”, अर्थात् किसी चीज को यदि ठीक ढंग से ना समझा जाये तो उसका गलत अर्थ निकलता है। ठीक ऐसा ही इस दोहे के साथ वामपंथी विचारधारा के लोग करते हैं। विस्तृत और सही अर्थ इस प्रकार है -

ढोल: ढोल के विषय में ताड़ना शब्द का अर्थ इस प्रकार है- ढोल को जब तक पीटा ना जाये, अर्थात् जब तक उस पर थाप ना दी जाए, उसमें से ध्वनि नहीं निकल सकती और उसका कोई उपयोग नहीं होता। यही नहीं, उसकी ताड़ना भी संगीत सम्मत होनी चाहिए ताकि उसमें से ध्वनि लयबद्ध रूप से निकले या उसका स्वर कर्कश हो जाता है। अर्थात् यह भी समझाने वाली चीज है, या आप अपने दिमाग से इसे जैसे जैसे बजाएंगे वैसे वैसे यह कार्य करेगा, बजेगा। ऐसा नहीं है कि बस सेट कर दिए और यह आवाज देने लगेगा।

गवांर: गवांर का अर्थ अज्ञानी होता है और यहां ताड़ना का अर्थ है दृष्टि रखनासमझाना। अज्ञानी को यदि कोई कार्य दिया जाए और उसपर दृष्टि ना रखी जाए तो वह कार्य वह कभी भी सही ढंग से नहीं कर सकता। इसीलिए जब तक किसी को किसी चीज के विषय में पूर्ण ज्ञान ना हो तब तक उसपर दृष्टि रखनी चाहिए। 

सूद्र: सबसे अधिक आपत्ति इसी शब्द पर होती है।  गुरु के सही ताड़न (मार्गदर्शन) के बिना वो गलत ज्ञान प्राप्त कर सकता है। शूद्र सिर्फ जाति से ही नहीं होते, कर्म से भी हो जाते हैं। कुछ मनुष्य अपनी इच्छा अनुसार ऐसे नीच कर्म करते हैं कि वह शूद्र में गिने जाते हैं, लेकिन शूद्र का असली अर्थ सेवक होता है और शूद्र का यह भी अर्थ होता है नीच कर्म करने वाला। और तुलसीदास जी की रचना में समुद्र का श्री रामचंद्र जी से कहने का कि यही तात्पर्य है कि शूद्र को भी सही रास्ते पर लाने के लिए शिक्षा की जरूरत होती है। शूद्र को ताड़ने का मतलब है कि शूद्र को समझाया जाए कि स्वामी की सेवा कैसे करनी है या यदि वह अपना कर्म कर रहा है तो उसे कैसे करना चाहिए।

पसु: पशुओं को हिन्दू धर्म में बहुत मूल्यवान माना गया है, इसीलिए उन्हें “पशुधन” कहा गया है। इनके विषय में ताड़न का अर्थ है देख-रेख करना। पशु बुद्धिहीन है, जिधर हांक दो, उधर चला जाएगा, किन्तु मूल्यवान है। अतः उसे हर समय सही देख-रेख की आवश्यकता होती है। जब पशु झुंड में चलते हैं तो एक व्यक्ति सदैव देखभाल के लिए उनके साथ होता है ताकि पशु इधर उधर ना भटक जाएं। उसी प्रकार खेत में हल जोतने वाला बैल केवल कृषक के वाणी मात्र से ये समझ जाता है कि उसे किस दिशा में मुड़ना है व कैसे चलना है।

नारी: इसपर भी सर्वाधिक आपत्ति होती है किंतु यहां नारी के विषय में ताड़ना का अर्थ है देखरेख, उनका ध्यान रखना एवं रक्षा करना। नारी समुद्र मंथन में निकली लक्ष्मी के समान पवित्र और आदरणीय है और इसीलिए ये आवश्यक है कि उनका सदैव ध्यान रखा जाए। 
हमारी पवित्र हिंदू संस्कृति ऐसे ही महान नहीं है, इसके कुछ संस्कार हैं, कुछ नैतिक मूल्य हैं; इसलिए हमारी हिंदू संस्कृति महान कही जाती है। स्त्री को कभी अकेला नहीं छोड़ना चाहिए, उनका सदैव ध्यान रखना चाहिए और एक रत्न की भांति उनकी रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।
हमारे हिंदू समाज के प्रत्येक लड़की या स्त्री जब भी कहीं जाती है, तो उसके परिवार वाले भाई या पिता या पति सभी को उसके स्थिति की चिंता रहती है और वह उसकी सुरक्षा के लिए उसके साथ जाते हैं।
स्त्रियों की सुरक्षा से संबंधित अनेक नियम हमारे हिंदू धर्म ग्रंथों में स्थान स्थान पर दिए गए हैं और हिंदू लोग उसका पालन भी करते हैं।


आज हिंदू विरोधी और पाश्चात्य विचारधारा वाले लोग भारत में नारियों के समानता और स्वाधीनता और स्वच्छंदता के अधिकार की बात करते हैं। हिंदू धर्म नारियों को स्वतंत्रता, स्वच्छता देता है, जितना उनको जरूरत होती है।
जो लोग इस बात का खंडन करते हैं वह केवल हिंदू विरोधी, नास्तिक और पाश्चात्य विचारधारा वाले लोग होते हैं जो नारियों को केवल भोग की वस्तु समझते हैं, उन्हें हवस का शिकार बनाते रहते हैं चाहे वह पुत्री, स्त्री, भाभी, देवरानी या कोई भी हो। 

तो यही वास्तव में इस चौपाई का अर्थ है जिसे जान-बूझ कर, बिना समझे रामायण और श्री राम के चरित्र हनन हेतु एवं महान सनातन हिन्दू धर्म में फूट पड़वाने हेतु उपयोग में लाया जाता है। 

आज भी गोस्वामी तुलसीदास की हस्तलिखित रामचरितमानस का अयोध्या काण्ड 447 साल बाद भी सहेज कर रखी गई है। गोस्वामी के गांव राजापुर से उनकी हस्तलिखित रामचरितमानस का दर्शन किया जा सकता है।

हस्तलिखित रामचरितमानस

 हस्तलिखित रामचरितमानस को देखकर पता चलता है कि 500 साल में हिंदी वर्णमाला के 15 अक्षर बदल चुके हैं। उनके हाथ का लिखा अब केवल अयोध्या कांड ही बचा है, बाकी सब विलुप्त हो गए। इस ग्रंथ को संरक्षित करने के लिए भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा जापानी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसमें जहां-जहां से कागज हट गया था, वहां पर जापानी लेप के जरिए उसको जोड़ा गया है।

वास्तव में तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस बहुत ही अनुपम, अद्वितीय और भवसागर से पार करने वाली सुन्दर रचना है। 

“मन चंगा तो कठोती में गंगा”, जानिए संत रविदास ने क्यों कही -

भारतीय धर्म में ही स्थित रहने वाले संत रविदास जी थे जिन्होंने कटौती से गंगा माता की कृपा से कंगन निकाल दिये थे और आज उनको मानने वाले हिंदू धर्म का खंडन करते हैं, क्या संत रविदास अंधविश्वासी थे, आस्थावान नहीं थे ?  हिंदू धर्म का विरोध करने वाले महामूर्ख नहीं तो क्या है ?
ये भी तो आधुनिक युग के शुद्र थे, इनकी तो नहीं कहीं निंदा की गई है और ना ही उन पर अत्याचार हुआ है।

संत रविदास


संत रविदास का जन्म काशी में हुआ था। इनके पिता का नाम संतोख दास और माता का नाम कलशा देवी था।

एक बार ये अपने जूते बनाने में तल्लीन थे। उसी वक्त उनके पास एक ब्राह्मण आए और कहने लगे- “चलो मित्र, गंगा नहाने चलें।” संत रविदास जी ने कहा, मित्र ! अभी तो हमारे पास वक्त नहीं है, हमें किसी की जूते सिल कर आज ही देने हैं। फिर रविदास जी ने ब्राह्मण से कहा कि ये कौड़ी आप मां गंगा को भक्त रविदास की भेंट कहकर अर्पित कर देना। इसके बाद ब्राह्मण अकेले ही गंगा नहाने चला गया। रविदास जी फिर से अपने काम में तल्लीन हो गए। गंगा स्नान के बाद जब ब्राह्मण घर वापस जाने लगा तो उसे याद आया कि उस संत रविदास की कौड़ी तो गंगा जी को अर्पण की ही नहीं। उसने कौड़ी निकली और गंगा के तट पर खड़े होकर कहा- हे मां गंगे! रविदास की ये भेंट स्वीकार करो। उसी वक्त गंगा जी से एक एक हाथ प्रकट हुआ और आवाज आई- लाओ रविदास जी के ये भेंट मेरे हाथ पर रख दो।  ब्राह्मण ने उस कौड़ी को हाथ पर रख दिया। जब ब्राह्मण हैरान होकर वहां से लौटने लगा तो फिर उसे वही आवाज सुनाई दी- ब्राह्मण! ये भेंट मेरे ओर से रविदास को दे देना। दरअसल गंगा जी के हाथ में एक रत्न जड़ित कंगन था। ब्राह्मण हैरान होकर उस रत्न जड़ित कंगन को लेकर चल पड़ा। 

जाते-जाते रास्ते में उसने सोचा कि रविदास को क्या मालूम कि मां गंगा ने उसके लिए कोई भेंट दी है। ब्राह्मण सोचने लगा- “अगर ये रत्न जड़ित कंगन मैं रानी को भेंट दूं तो राजा मुझे मालामाल कर देगा।” वह राजा के दरबार में पहुंचा और रानी को भेंट स्वरूप वह कंगन दे दिया। रानी वह कंगन देखकर बहुत खुश हुई।

इधर ब्राह्मण अपने मिलने वाले इनाम के बारे में सोच ही रहा था कि रानी ने अपने दूसरे हाथ के लिए भी वैसा ही कंगन की मांग राजा से कर दी। राजा ने ब्राह्मण से कहा मुझे इसी तरह का दूसरा कंगन चाहिए। इस पर उस ब्राह्मण ने कहा कि आप अपने राज जौहरी से इसी तरह का दूसरा कंगन बनवा लें। तभी जौहरी ने राज को बताया कि इसमें जड़े रत्न बहुत कीमती हैं, वह राजकोष में भी नहीं है। इस पर राजा को क्रोध आ गया। उसने ब्राह्मण से कहा कि यदि तुम दूसरा कंगन लाकर नहीं दे सके तो तुम्हें मृत्युदंड मिलेगा। यह सुनकर ब्राह्मण की आंखों से आंसू बहने लगे। फिर उसने सारी सच्चाई राजा को बताई। 
फिर कहा कि केवल रविदास जी हैं जो दूसरा कंगन मां गंगा से लाकर दे सकते हैं। राजा को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ। वह ब्राह्मण के साथ संत रविदास के पास पहुंचा। वहां रविदास जी अपने काम में हमेशा की तरह तल्लीन थे। ब्राह्मण ने दौड़कर उनके पैर पकड़ लिया। साथ ही वे अपने जीवन की रक्षा की प्रार्थना की। रविदास जी ने जब ब्राह्मण के जीवनदान की प्रार्थना राजा से की। तब राजा ने उनसे उस ब्राह्मण के जीवनदान के बदले दूसरा कंगन मांग लिया। तब संत रविदास जी ने वहीं एक बर्तन से जल लिया और मां गंगा से प्रार्थना करने लगे। तभी उसी बर्तन में एक दूसरा कंगन प्रकट हुआ। राज यह देखकर बहुत हैरान हुआ। इसके बाद संत रविदास ने कहा- “मन चंगा तो कठौती में गंगा”। 

अब आप बताइए कि अगर संत रविदास में गंगा माता के प्रति भक्ति नहीं होती, तो क्या वे कठौती से कंगन मांग लेते ? क्या हिंदू विरोधी लोग कठौती से कंगन मांग लेंगे ? कभी नहीं मांग सकते;  वही ऐसा कर्म कर सकता है जो हिन्दू धर्म और देवी-देवताओं के प्रति आस्थावान हो।

संत रविदास जी ने अपनी रैदास रामायण में लिखा है –

वेद धर्म सबसे बड़ा अनुपम सच्चा ज्ञान, फिर क्यों छोड़ इसे पढ लूं झूठ कुरान।

वेद धर्म छोडूं नहीं कोशिस करो हजार, तिल-तिल काटो चाहि, गला काटो कटार।।

यह दोहा क्या बताता है ? या दोहा बताता है कि संत रविदास हिंदू धर्म के प्रति आस्थावान थे व हिंदू थे। लेकिन आज संत रविदास को मानने वाले और अधिकांश दलित हिंदू धर्म का विरोध करते हैं।

लोगों ने अचंभित होकर यह दृश्य भी देखा कि आक्रमणकारी बर्बर शासक सिकंदर लोदी क्रुद्ध हो बैठा और उसनें संत रैदास की टोली को चमार या चांडाल घोषित कर दिया। इनके अनुयाइयों से जबरन ही चर्मकारी का और मरे पशुओं के निपटान का कार्य अत्याचार पूर्वक कराया जानें लगा। भारत में चमार जाति का नाम और शूद्रों पर अत्याचार की शुरूआत इस घटना क्रम और सिकंदर लोदी की ही उपज है। संत रविदास उस काल में हिन्दू शासकों में इतनें लोकप्रिय और सम्मानीय हुए कि प्रसिद्द मारवाड़ चित्तोड़ घरानें की महारानी मीरा ने उन्हें अपना गुरु बनाया।

आज भारत का दुर्भाग्य ही तो है कि संत रविदास को मानने वाले भी हिंदू धर्म का खंडन करते हैं, जबकि संत रविदास ने हिंदू धर्म का खंडन कभी नहीं किया।

आप असम (कामरुप-कामाख्या) जाइए; वहां पर आप देखेंगे कि हिंदू धर्म और अन्य धर्म के लोगों के साथ-साथ विदेशी भी आकर कि हिंदू धर्म में मंत्र साधना कर रहे हैं और जादूगर बन रहे हैं, जिनके जादू कभी कट नहीं सकते।

हिंदू विरोधी और भ्रमित हिंदू, जो की आज काम-वासना से पीड़ित है; क्या कभी मंत्र साधना कर सकते हैं, मंत्र को सिद्ध कर सकते हैं ? कभी नहीं। इसके लिए कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता है, जो कि इन लोगों से हो ही नहीं सकता।

कितने ही हिंदू विरोधी लोग हिंदू देवी-देवताओं की घोर निंदा करते हैं, लेकिन उन्हें यह भी जानकारी नहीं होती कि वे ऐसा करके बहुत घिनौना पाप कर रहे हैं। हिंदू देवी देवताओं की महिमा आप उन हिंदूओं से पूछिए जो जानते हैं, आस्तिक हैं। 

3000 पाकिस्तानी बमों को डिफ्यूज करने वाला राजस्थान के जैसलमेर बॉर्डर पर स्थित तनोट माता का मंदिर

प्रत्यक्ष देखना हो तो 1965 में भारत-पाकिस्तान के बीच जब युद्ध हुआ था, तो राजस्थान के जैसलमेर बॉर्डर पर स्थित तनोट माता का मंदिर, जो कि दुर्गा माता का एक स्वरूप माना जाता है, उनके मंदिर पर पाकिस्तानी फौज द्वारा बरसाया गया एक भी गोला विस्फोट नहीं हुआ। इस घटना की याद में तनोट माता मंदिर के संग्रहालय में आज भी पाकिस्तान द्वारा दागे गये जीवित बम रखे हुए हैं।

गलत और बहरूपिया व्यक्ति हर जगह होते हैं, हर क्षेत्र में होते हैं; ऐसा नहीं है कि केवल हिंदू धर्म में ही हैं। किसी बहरूपिया से अगर आपका सामना हो गया तो ऐसा नहीं है कि पूरा हिंदू धर्म ही खराब है। हो सकता है कि आपका सामना किसी सिद्ध से ना हुआ और आप किसी बहरूपिया के चक्कर में पड़कर संपूर्ण हिंदू धर्म का विरोध कर रहे हों।

9. हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था के साथ-साथ बलि प्रथा का हिन्दू विरोधी लोग विरोध करते हैं, जबकि हिंदू धर्म में तीन प्रकार के कर्म बताए गए हैं- सात्विक, राजसी और तामसी। बलि इत्यादि कर्म तामसी है। कुछ ऐसे तामसिक कर्म होते हैं, जिनमें बली देने की अनिवार्यता होती है; लेकिन ऐसा नहीं है कि वह पाप नहीं है। हिंदू धर्म उसको भी पाप कहता है और उसका फल बलि देने वालों को भोगना ही पड़ता है, ऐसा नहीं है कि हिंदू धर्म बेकार है।

शायद आप ना जानते हो; लेकिन मैं आपको बता देता हूं कि यदि पूरे विश्व में कोई अहिंसा का पालन करता है और शाकाहारी है तो वह वर्ण व्यवस्था वाला हिंदू ही है, बाकी किसी भी धर्म के लोग (मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी, यहूदी आदि) अहिंसा का पालन नहीं करते, भले ही वे अहिंसा अहिंसा अहिंसा का रट लगाए रहते हैं, कीड़े - मकोड़े तक खा जाते हैं, अहिंसा का रट लगाने वाले अन्य धर्मों के लोग।
सिर्फ हिंदू में सात्विक और कुछ राजसी प्रकृति के लोग हैं जो शाकाहारी हैं किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करते हैं। यही तो हिंदू धर्म की महानता है, जो सब अन्य धर्मों के लोगों के मन में ईर्ष्या उत्पन्न करती है।

10. जो लोग हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था की निंदा करते हैं और उसे हटाने की मांग करते हैं, इन लोगों से मेरी अपील है कि जमीनी स्तर पर वह हिंदू धर्म के सभी वर्णों को इकट्ठा करें और उनसे यह प्रश्न करें कि, भैया ! हम आप लोगों के वर्ण व्यवस्था को समाप्त करना चाहते हैं या आप की जाति की पहचान को समाप्त करना चाहते हैं और आपको बिना जाति का करना चाहते हैं तो मुझे 100% यकीन है कि जो यह प्रश्न करेगा, उसको प्रत्येक व्यक्ति अपना जूता निकाल कर के चार जूते ना मारे तो फिर कहना ! चले हैं वर्ण व्यवस्था को समाप्त करने ! अरे, गुलामी के समय इसमें जो बुराइयां आ गई है, उसको आप समाप्त करें ना कि वर्ण व्यवस्था को।

11. इतिहास गवाह है कि आज तक हिंदूओं ने किसी अन्य धर्म के लोगों को हिंदू धर्म अपनाने के लिए ना ही कोई प्रलोभन दिया और ना ही उन्हें विवश किया। अन्य धर्मों का जो भी कोई व्यक्ति अगर हिंदू धर्म स्वीकार करता है, तो वह अपनी मर्जी से करता है, वह हिंदू धर्म को पहले पढ़ता है, समझता है, फिर प्रभावित होकर, हिंदू धर्म को स्वीकार करता है या अपनाता है।

लेकिन अन्य धर्मों के लोग अनेक प्रलोभनों के साथ धर्मांतरण जैसे कार्यक्रम चलाते रहते हैं, और लोगों को अनेक तरह से प्रलोभन देते हैं, उन्हें मौका पाकर बंदी बनाते हैं और उन्हें अपने धर्म को अपनाने के लिए विवश करते हैं।

कुछ हिंदू विरोधी लोग करते क्या हैं ? वे लोग किसी एक हिंदू को पकड़ते हैं जिसे हिंदू धर्म का ज्ञान ना हो, क्योंकि आज भारत में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है कि हिंदू धर्म वाले व्यक्ति की अगर इच्छा हुई तो वह अपने सभी धर्म ग्रंथों को पढ़ेगा, नहीं तो नहीं पढ़ेगा; सिर्फ सुनी सुनाई कुछ गलत, कुछ सही बातें ही याद करता रहेगा, क्योंकि स्कूलों में तो हिंदू धर्म को पढ़ाना अनिवार्य नहीं है। इसलिए कुछ हिंदू विरोधी लोग किसी ऐसे हिंदू व्यक्ति को पकड़ते हैं जिसे उसे अपने धर्म की जानकारी ना हो, उसे बहलाते, फुसलाते हैं, हिंदू धर्म के प्रति भड़काते हैं और उसे किसी अन्य धर्म में जैसे बौद्ध या ईसाई या मुस्लिम, पारसी, जैन इत्यादि में परिवर्तन करा देते हैं।

निष्कर्ष 

आज वर्तमान में हिंदू धर्म के लोप और हिंदू धर्म पर उंगली उठाने का एकमात्र कारण है कि; हिंदूओं को हिंदू धर्म की शिक्षा की अनिवार्यता नहीं है।  यदि कुछ ऐसे नियम बनाए जाएं कि हिंदूओं को हिंदू धर्म की शिक्षा की अनिवार्यता दी जाए तो शायद हिंदू धर्म सुरक्षित रह सके, लेकिन ऐसी कोई बात भी नहीं है कि हिंदू धर्म खतरे में है। हिंदू धर्म सदैव सुरक्षित है और सदैव सुरक्षित रहेगा। इसमें गुलामी के समय जो प्रक्षिप्त अंश भरे गए, वह पकड़ में आ जाते हैं और उनका अनुसरण भी नहीं होता।
गुलामी के समय हिंदू धर्म में जितने भी बदलाव किए गए, उन्हें किसी विशेषज्ञ कमेटी को बैठा करके  निकलवाया जाए ताकि हिंदू धर्म की निंदा से बचा जा सके।

हमें इस लेख में अनेक तथ्यों को इसलिए शामिल करना पड़ा, क्योंकि हमने आज तक जितने भी जातिवाद, नारीवाद, वर्ण व्यवस्था पर लेख पढ़े हैं; उनमें सिर्फ हिंदू धर्म की निंदा, हिंदू धर्म के देवी-देवताओं की निंदा, वर्ण व्यवस्था की निंदा, और हिंदू धर्म को हर तरह से गलत साबित करने का प्रयास किए रहते हैं। इसलिए इस लेख में हमें उन सभी तथ्यों को भी शामिल करना  पड़ा, जिनके सहारे हिंदू विरोधी लोग हिंदू धर्म का खंडन करने और हिन्दुओं को तोड़ने का प्रयास करते हैं।
 

हिंदू धर्म श्रेष्ठ था, श्रेष्ठ है और श्रेष्ठ रहेगा !


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