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मुसलमानों व पवित्र कुरान के प्रति Dr. B. R. Ambedkar का मत - भारत का विभाजन

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आतंकवाद और मुसलमानों का किसी अन्य से मित्रता रोकने वाले इस्लामी सिद्धांत:-

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी के राष्ट्रीय योगदान का आकलन और मूल्यांकन कर पाना बहुत ही कठिन है। इसके लिए आपको इनके द्वारा लिखित पुस्तकें का अध्ययन करना बहुत ही अनिवार्य है। 
यदि हम इनके जीवन दर्शन को जानने, समझने का प्रयत्न करते हैं तो एक बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि उनका पूरा जीवन दो लक्ष्यों पर केंद्रित और समर्पित जान पड़ता है - पहला शोषित पीड़ित लोगों की सेवा तथा दूसरा राष्ट्रहित सर्वोपरि था। 
बाबा साहब अंबेडकर अपने जीवन काल में सामाजिक और राष्ट्र के अनेक पदों पर कार्य करते रहे।
 
बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जी हिंदुस्तान को एक अटूट राष्ट्र बनाना चाहते थे, लेकिन हिंदू और मुस्लिम में मैत्री ना होने के कारण ऐसा संभव न हो सका। वे अपनी पुस्तक भारत का विभाजन, जिसमें उन्होंने भारत के विभाजन के कारणों का पूरी तरह से विस्तृत वर्णन किया है, उसमें उन्होंने लिखा है कि वह कौन - कौन से इस्लाम सिद्धांत हैं जिसके कारण वे हिंदुओं से मैत्री करने में असमर्थ थे। उसी के कुछ अंश मैं आप लोगों के लिए यहाॅं पर उपलब्ध करा रहा हूॅं-

Dr. Bhimrao Ambedkar


पहला इस्लामी सिद्धांत:-

इस्लाम के सिद्धांतों में एक विशेष सिद्धांत उल्लेखनीय है, जो कहता है कि

" उस देश में जो मुस्लिम शासन में नहीं है अर्थात जिस देश में मुस्लिम साम्राज्य ना हो, जब भी कभी मुसलमानों के कानून और उस देश के विद्यमान कानून के बीच विवाद उत्पन्न हो तो इस्लामिक कानून को उस देश के कानून के ऊपर माना जाएगा।"

मुसलमानों के लिए मुस्लिम कानून का अनुपालन और उस देश के कानून की अवहेलना उचित माना जाएगा।
एक मुसलमान, चाहे वह असैनिक हो या सैनिक, चाहे वह मुस्लिम शासित हो या गैर-मुस्लिम शासन में रह रहा हो, अपनी निष्ठा अल्लाह में कबूल करने के लिए कुरान के आदेशों को मानता है,उसकी एक मात्र निष्ठा उसके पैगम्बर और पैगम्बर के उत्तराधिकारियों के प्रति होती है।

एकता का यह सिद्धान्त गूढ चिन्तकों का कोई गणितीय फार्मूला नहीं है, अपितु यह शिक्षित या अनपढ़ प्रत्येक मुसलमान की आम आस्था है।

इससे पहले भी और दूसरे स्थानों पर भी मुसलमान गैर - मुस्लिम प्रशासन में शांतिपूर्ण प्रजा के रूप में हैं।
किंतु एक कठोर नियम है और सदैव रहा है कि एक मुसलमान के रूप में वे अपने धर्मनिरपेक्ष शासकों के सिर्फ
उन्हीं कानूनों को मानेगा जो उसकी इस्लामिक आस्था को नुकसान न पहुंचाए और उनको कुरान के अनुसार पूर्ण रूप से स्वतंत्रता दे।

दूसरा इस्लामी सिद्धांत:-

मुस्लिम धर्म के सिद्धांतों के अनुसार, " विश्व दो हिस्सों में विभाजित है - दार-उल-इस्लाम तथा दार-उल-हर्ब। "

मुस्लिम शासित अर्थात पूर्णत: इस्लामिक देश दार-उल-इस्लाम (इस्लाम का घर) हैं और वह देश जिसमें मुसलमान सिर्फ रहते है न कि उस पर शासन करते है, दार-उल-हर्ब (युद्ध का क्षेत्र) है।
वे कहते हैं कि मुस्लिम धार्मिक कानून का ऐसा होने के कारण भारत हिन्दुओं तथा मुसलमानों दोनों की मातृभूमि नहीं हो सकती है। यह मुसलमानों की धरती हो सकती है - परन्तु यह हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों की घरती जिसमें दोनों समानता से रहें, नहीं हो सकती है।

लेकिन, जब इस पर मुसलमानों का शासन होगा तो यह मुसलमानों की धरती हो जाएगी।
इसलिए वह देश जहां मुस्लिम साम्राज्य नहीं है उस देश में रहने वाले मुसलमान अपने को दार-उल-हर्ब (युद्ध का क्षेत्र)  में मानते हैं और यह आतंकवाद का कारण हो सकता है क्योंकि अधिकांश आतंकवादी मुस्लिम ही पाए जाते हैं।
यह सिद्धांत मुसलमानों को प्रभावित करने में बहुत कारगर कारण हो सकता है।

इसका मुसलमानों के व्यवहार पर तब बहुत भारी असर पड़ा, जब अंग्रेजों ने भारत पर अपना अधिकार जमाया।
क्योंकि उस समय भारत के अधिकांश क्षेत्रों पर मुस्लिम साम्राज्य था अर्थात् मुस्लिम आक्रमणकारियों ने भारत के अधिकांश क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था। उन क्षेत्रों पर जब अंग्रेजों ने अपना अधिकार जमाया और उन्हें गुलाम बनाया तो वे भारत को दार-उल-हर्ब से दार-उल-इस्लाम बनाने के लिए योजना बनाने लगे। 
डाॅ भीमराव अंबेडकर के अनुसार, अंग्रेजों के भारत को हथियाने पर हिंदुओं ने कोई बेचैनी नहीं दिखाई।
परंतु आजादी के लिए क्रांतियां सबसे पहले हिंदूओं ने शुरू की और फिर उसमें बाद में मुसलमानों ने भाग लिया।

तीसरा इस्लामी सिद्धांत:-

डॉ भीमराव अंबेडकर जी कहते हैं कि इस्लाम का यह सिद्धांत जो कि पूरे विश्व के लिए घातक साबित हो जाता है, वह इस प्रकार है - "मुस्लिम धार्मिक कानून की आज्ञा जिहाद (धर्मयुद्ध) ।"

इसके तहत हर मुसलमान शासक का यह कर्तव्य हो जाता है कि इस्लाम के शासन का तब तक विस्तार करता रहे. जब तक सारी दुनिया मुसलमानों के नियंत्रण में नहीं आ जाती अर्थात् पूरे विश्व में मुस्लिम साम्राज्य स्थापित करना
तकनीकी तौर पर हर मुस्लिम शासक का, जो इसके लिए सक्षम है, उसका कर्तव्य है कि- वह दार-उल-हर्ब को दार-उल-इस्लाम में बदल दे।

इसका निकटवर्ती उदाहरण है- 1919 में अफगानिस्तान का भारत पर आक्रमण।

यह उन भारतीय मुसलमानों द्वारा सुनियोजित था, जिन्होंने ब्रिटिश सरकार के प्रति खिलाफतियों की विरोध की भावना से प्रेरित होकर भारत को स्वतंत्र करने के लिए अफगानिस्तान की सहायता मांगी थी। उस आक्रमण से भारत को स्वतंत्रता मिलती या दासता, यह कहना असंभव है, क्योंकि आक्रमण नहीं हो सका क्योंकि अंग्रेजों ने उस आक्रमण को दबा दिया

इसके अलावा, तथ्य यह है कि भारत, चाहे एकमात्र मुस्लिम शासन के अधीन न हो. दार-उल-हर्ब है,
और इस्लामी सिद्धांतों के अनुसार मुसलमानों द्वारा जिहाद की घोषणा करना न्यायसंगत है।

चौथा इस्लामी सिद्धांत:-

उनका एक धार्मिक सिद्धान्त जो कि इस मामले में प्रासंगिक है, उस पर भी ध्यान देने की जरूरत है- वह है कि,
"इस्लाम क्षेत्रीय मेल-मिलाप को स्वीकार नहीं करता है। विशेषकर हिन्दुओं से "

तो, हिंदुओं और मुसलमानों के धार्मिक विश्वास, सामाजिक दृष्टिकोण, मूल नियति और उनकी सांप्रदायिक और
राजनीतिक अभिव्यक्तियों ऐसी हैं। इन समस्याओं का यह सोचकर निदान करने की कोशिश करना कि हिंदू और
मुसलमान एक हैं, और यदि अभी एक नहीं भी हैं तो बाद में एक हो जाएंगे, एक निष्फल प्रयास है।

Dr. Bhimrao Ambedkar और प्रमाणों के अनुसार-

हिंदुओं और मुसलमानों को एक करने के लिए यथासंभव सभी प्रयास कर लिए गए हैं, पर वे सभी निष्फल रहे, क्योंकि जब हिन्दू धर्म और मुस्लिम धर्म में ही मेल-मिलाप नहीं है, तो इनके अनुयायियों में मेल-मिलाप कैसे हो सकता है ?

अत: भारत का विभाजन करना या भारत को हिंदू और मुस्लिम देशों में बाॅंटना एक समस्या बन गई, जिसे अनिवार्य रूप से निभाया गया और ये इस्लाम के सिद्धांत आज पूरे विश्व में आतंकवाद के कारण बनते नजर आते हैं।

Conclusion :-

Friends !  हमें विश्वास है कि आप इस लेख के माध्यम से बहुत कुछ सीख जाएंगे।  हम इस समय प्राचीन पुस्तकों का अध्ययन करके शोध कर रहे हैं, अतः आपसे अनुरोध है कि हमारे इस वेबसाइट को सब्सक्राइब अवश्य करें और अपने होम स्क्रीन पर रख लें ताकि हमारी लेटेस्ट पोस्ट आप लोग तुरंत पढ़ सकें।
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