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Top 10 अनमोल वचन हिन्दी में

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ज्ञानवर्धक और आवश्यक अनमोल वचन -

1. परिवार और समाज में लोगों से बात करने के विशेष नियम-

जो बेवजह बोलता है, ज्यादा बोलता है, बिना सोचे-समझे बोलता है, जिस विषय का ज्ञान नहीं है उस पर बोलता है, झूठ बोलता है, गलत बोलता है, निन्दा करता है, वह व्यक्ति प्रायः अपमानित ही होता रहता है।

 उपर्युक्त दोषों से बचता है वह लज्जित और अपमानित होने से बचता है और लोकप्रिय भी हो जाता है।

 जब तक कोई बोलता नहीं है, उसके अच्छे या बुरे का खुलासा नहीं होता है, अत: यदि आप कम बुद्धि वाले हों तो किसी विशेष सम्मेलन या बैठक में अनाप - सनाप न बोलें ।

 सत्य के साथ प्रिय बोलो, अप्रिय सत्य कभी मत बोलो, प्रिय झूठ भी नहीं बोलना चाहिए।

अनमोल वचन

2. हँसी कहाँ और कैसे होनी चाहिए?

→  एक कहावत है कि खांसी बीमारी का घर है और लड़ाई का घर हंसी है। हंसना अच्छा है लेकिन हर जगह हंसना अच्छा नहीं है।

→  हास्य तभी अच्छा और सार्थक होता है जब वह किसी के दिल को खुश कर दे।

→  किसी पर इस तरह हंसना नहीं चाहिए कि इससे उसका दिल दुखे या झगड़ा हो जाए।

→  हँसी का एक प्राचीन विवरण -

द्रौपदी ने दुर्योधन पर यह कहकर एक मजाक किया था कि 'अंधे ही अंधे से पैदा होते हैं', जिसके लिए उन्होंने द्रौपदी से बदला लेना चाहा था।

→  हँसी हँसी में कही गई गलत बात कभी-कभी दिल में इस तरह चुभती है कि हँसी का अर्थ बदल जाता है और अनर्थ हो जाता है।

इसलिए हंसी मजाक भी सोच समझकर ही करना चाहिए।

3. मानव शरीर का वर्णन और मनुष्य का लक्ष्य-

→  मानव शरीर एक रथ के समान है। मानव शरीर में विद्यमान आत्मा रथ की सवार है।

मनुष्य की बुद्धि रथ का सारथी है। मानव मन रथ का लगाम है।

मानव इंद्रियां रथ के घोड़े हैं। सच्चे धर्म का पालन करना ही मार्ग है। और मोक्ष प्राप्त करना प्रत्येक मनुष्य का लक्ष्य है।

→  जिस प्रकार अकुशल सारथी, लगाम से रथ के घोड़ों को नियंत्रित करने में असमर्थ होकर, सवार को लक्ष्य से भटका देता है, उसी प्रकार अल्प बुद्धि का व्यक्ति, मन पर कन्ट्रोल न करने के कारण अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करने में सक्षम न होने के कारण अपने लक्ष्य से भटक जाते हैं, अर्थात् वे दुनिया में भटकते रहते हैं।

→  इसलिए पुरुषार्थ करके, ज्ञान अर्जित करके, बुद्धि द्वारा मन और इन्द्रियों को वश में करके, कर्तव्य और अकर्तव्य का ध्यान रखते हुए अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते रहना चाहिए।

4. विशेष ज्ञातव्य बातें-


→  अपने मन में गलतफहमी रखना गलती करने से ज्यादा खतरनाक हो सकता है ।

→  एक बुरा शब्द सारे अच्छे परिणामों को बुरे में बदल सकता है ।

→  जो परोपकारी है वही सदाचारी है।

→  जो सदा वही रहता है वही सत्य है।

→  जो लेने की इच्छा किए बिना देता है, वह दाता है।

→  जो प्रेम से बंधा है वही मित्र है, जो विपत्ति में मदद करता है, वही मित्र है।

→  जो शास्त्रानुकूलित रूप से पिता को सफलता और संतुष्टि देता है, वह पुत्र श्रेष्ठ है।

→  सत्य मन को शुद्ध करता है, जल शरीर को शुद्ध करता है, ज्ञान मनुष्य को शुद्ध करता है

→  तप आत्मा को शुद्ध करता है।

→  धर्म का पालन करने से आचरण पवित्र हो जाता है और ईश्वर के प्रति भक्ति, कृतज्ञता और भक्ति की भावना को रखते हुए अच्छे कर्म करने से यह सारा जीवन पवित्र हो जाता है।

→  औषधियों में सर्वश्रेष्ठ है गिलोय, धन में ज्ञान श्रेष्ठ है, संत से मिलने का सुख सर्व सुखों में श्रेष्ठ है।

→  नम्रता सभी गुणों में श्रेष्ठ है।

→  आवश्यकता के अनुसार दिया गया दान, सर्व कर्मों में श्रेष्ठ सेवा है, और जो निःस्वार्थ भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करता है वही सबसे अच्छा है।

→  कर्तव्य भावना से श्रेष्ठ है।

→  कहने से करना बेहतर है।

→  बुरा बोलने से अच्छा है न बोलना।

→  अनासक्ति त्याग से श्रेष्ठ है।

→  हर किसी की आत्मा को अपनी आत्मा समझना सबसे अच्छा है।

5. विवेकी पुरुष कौन हैं?

→  मेरा कर्तव्य क्या है, मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, इस बात को तय करने वाले पुरुषों को ही विवेकी कहते हैं। केवल बुद्धिमान लोगों में ही यह निर्णय लेने की क्षमता होती है।

6. सफलता का उपाय-

एक रास्ता खोजो। उस पर विचार-विमर्श करो। अपने शरीर के प्रत्येक भाग में उस विचार को भर दो, और किसी अन्य विचार को जगह मत दो। सफलता का यही रहस्य है ।

7. मेघ वर्षा करते समय यह नहीं देखता कि भूमि उपजाऊ है या ऊसर। वह दोनों को समान रूप से सींचता है। गंगा का पवित्र जल उत्तम और अधम का विचार किये बिना सबकी प्यास बुझाता है। अत: अपनों की देखभाल भेदरहित होकर करो।

8. नुकसान से निबटने में सबसे जरूरी चीज है, उससे मिलने वाले सबक को न भूलना। सबक को याद रखकर आप सही मायने में विजेता बन जायेंगे।

9. तीन तत्व हैं - ब्रह्मा, ब्रह्माण्ड और आत्मा अर्थात् ईश्वर, जगत और जीव। जगत और जीव में परस्पर संबंध है। ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है, जो सर्वव्यापक और अंतर्यामी है।

10. सभी जीवों को जीवित रहने का बराबर अधिकार है। इसलिए जो जीवन आप वापस नहीं दे सकते, उसे लेने का आपको कोई भी अधिकार नहीं है ।

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