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अद्भुत और चमत्कारिक श्री नृसिंह स्तोत्र और उसकी महिमा

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जब मातृकाएं त्रिभुवन के समस्त चराचर प्राणियों को खाने के लिए जुट गई, तब भगवान शिव ने  श्री विष्णु देव का नरसिंह रूप में ध्यान किया और उनकी स्तुति की। रूद्र जी के ऐसा करने पर नरसिंह रूप धारी भगवान हरि उसी समय अपनी जिह्वा के अग्रभाग से हजारों देवियों को उत्पन्न कर उन्हीं के द्वारा देवता, असुर और मनुष्य आदि का संहार करने वाले क्रुद्ध मातृकाओं का विनाश कर डाला और उसके बाद वे हरि अंतर्ध्यान हो गए।

श्री नृसिंह  स्तोत्र:-

                           नरसिंह स्तोत्र

नमस्तेऽस्तु जगन्नाथ नरसिंहवपुर्धर। 

दैत्येश्वरेन्द्रसंहारिनखशुक्तिविराजित।।

नखमण्डलसंभिन्नहेमपिंगलविग्रह।

नमोऽस्तु पद्यनाभाय शोभनाय जगद्गुरो।

कल्पान्ताम्भोदनिर्घोष सूर्यकोटिसमप्रभ।।

सहस्त्र्यमसंत्रास सहस्त्रेन्द्रपराक्रम।

सहस्त्रधनदस्फीत सहस्त्रचरणात्मक।।

सहस्त्रचन्द्रप्रतिम सहस्त्रांशुहरिक्रम।

सहस्त्ररूद्रतेजस्क सहस्त्रब्रह्मसंस्तुत।।

सहस्त्ररूद्रसंजप्त सहस्त्राक्षनिरीक्षण।

सहस्त्रजन्मंथन सहस्त्रबन्धमोचन।।

सहस्त्रवायुवेगाक्ष सहस्त्राज्ञकृपाकर।।

हिन्दी अनुवाद -

 हे समस्त संसार के स्वामी ! हे नरसिंहरूपधारिन् !  हे दैत्यराज हिरण्यकशिपु के वक्षस्थल को विदीर्ण करने वाले !  शुक्तियों के समान चमकीले नाखूनों से सुशोभित देव ! आपको नमस्कार है । 

हे नखमंडल की कांति से मिश्रित स्वर्ण के समान देदीप्यमान शरीर वाले ! हे जगद्वन्द्य! शोभासंपन्न भगवान पद्मनाभ ! प्रलयकालीन मेघ के सदृश्य गर्जना करने वाले,  करोड़ों सूर्य के समान प्रभासंपन्न देव !  आपको नमन है। 

दुष्ट पापियों को हजारों यमराज के समान है भयभीत करने वाले ! हजारों इंद्र की शक्ति अपने मे संनिहित रखने वाले ,हजारों कुबेर के सदृश धन संपन्न आपको नमस्कार है। 

हजारों चंद्रमा के समान शीतल कांति वाले, हजारों सूर्य के सदृश पराक्रमशाली आपको नमस्कार है। 

 हजारों रूद्र देवताओं के द्वारा मंत्र रूप में जप करने योग्य महामहिम ! इंद्र के हजारों नेत्रों से देखे जाने वाले हजारों जन्म के पापों का मंथन करने वाले ,संसार के हजारों जीवों का बंधन काटकर उन्हें मुक्त करने वाले !हजारों वायु देवों के समान वेगवान और हजारों मूर्ख प्राणी पर कृपा करने वाले हे दयानिधान !आपको मेरा नमस्कार है।

Conclusion :- जो मनुष्य नियम पूर्वक इस नृसिंह स्तोत्र का जितेंद्रिय होकर पाठ करता है, निश्चित ही भगवान श्री हरि उसके मनोरथ को वैसे ही पूर्ण करते हैं, जैसे उन्होंने शिव जी के मनोरथ को पूर्ण किया था।

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