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राजनीतिज्ञ कणिक द्वारा धृतराष्ट्र को सुनायी गयी कहानी :-

यह कहानी राजनीतिज्ञ कणिक ने धृतराष्ट्र को इसलिए सुनाई क्योंकि धृतराष्ट्र अपने पुत्र दुर्योधन को राजा बनाने का उपाय पूछ रहे थे।


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→   किसी वन में एक बड़ा बुद्धिमान और स्वार्थ कोविद गीदड़ रहता था। उसके चार मित्र बाघ, चूहा, भेड़िया और नेवला भी वहीं रहते थे।  एक दिन उन्होंने एक बड़ा बलवान और हट्टा-कट्टा हरिण को देखा, जो हरिणों का सरदार था। पहले तो उन्होंने उसे पकड़ने की चेष्टा की परंतु असफल रहे, तदन्तर उन लोगों ने आपस में विचार किया।


 गीदड़ ने कहा-  'यह दौड़ने में बड़ा फुर्तीला, जवान और चतुर है।

Deer


 भाई बाघ !  तुमने इसे मारने की कई बार चेष्टा की परंतु सफलता नहीं मिली। अब ऐसा उपाय किया जाए कि जब यह हरिण सो रहा हो तो चूहा और नेवला भाई जाकर धीरे - धीरे इसका मर्म स्थान काट लें, फिर आप पकड़ लीजिएगा'। तब हम सब मिलकर इसे मौज से खा जाऐंगे।


 सभी ने मिल जुलकर वैसा ही किया।  हरिण मर गया और उसे खाने के लिए एक स्थान पर रखा गया । खाने के समय गीदड़ ने कहा -  अच्छा;  अब तुम लोग स्नान कर आओ ;  मैं इसकी देखभाल के लिए यहीं पर रुका हूं। सब के चले जाने पर गीदड़ मन ही मन कुछ विचार करने लगा और उसे एक उपाय सूझ गई। 


जब बलवान बाघ स्नान करके नदी से लौट आया, तो गीदड़ को देखकर बाघ ने पूछा -  मेरे चतुर मित्र !  तुम किस सोच में पड़े हो ? आओ हम सब मिलकर इस हरिण को खाकर मौज करें।


गीदड़ ने कहा -  बलवान बाघ भाई ! चूहे ने मुझसे कहा है कि बाघ के बल को धिक्कार है। हरिण को तो मैंने मारा है। आज वह बाघ मेरी कमाई खाएगा।  तो भाई उसकी यह घमंड भरी बात सुनकर मैं तो अब हरिण को खाना अच्छा नहीं समझता।  


बाघ ने कहा -  अच्छा !  ऐसी बात है, उसने तो मेरी आंखें खोल दी। अब मैं स्वयं पशुओं को मारकर खाऊॅंगा, यह कहकर बाघ चला गया।


उसी समय चूहा आया । गीदड़ ने कहा -  चूहा भाई ! नेवला मुझसे कह रहा था कि ''बाघ ने जब इसे यहाॅं उठा कर लाया तो उसका दाॅंत धॅंस जाने से हरिण के मांस में जहर मिल गया है , सो मैं तो इसे नहीं खाऊंगा। यदि तुम कहो तो मैं चूहे को खा जाऊं। अब तुम जैसा ठीक समझो कह करो।''  चूहा डरकर अपने बिल में घुस गया। 


अब भेड़िए की बारी आई। गीदड़ ने कहा-  भेड़िया भाई ! आज बाघ तुम पर बहुत नाराज हो गया है, मुझे तो तुम्हारा भला नहीं दिखता, वह अभी बाघिन के साथ यहां आएगा, जो ठीक समझो करो। भेड़िया दुम दबाकर भाग निकला।


 अन्त में नेवला आया। गीदड़ ने कहा -  देख रे नेवले !  मैंने लड़कर बाघ, भेड़िए और चूहे को भगा दिया है। यदि तुझे कुछ घमंड हो तो आ, मुझसे लड़ ले और फिर हरिण का मांस खा । 


नेवले ने कहा-  जब सभी तुमसे हार गए, तो मैं तुमसे लड़ने की हिम्मत कैसे करूं। नेवला भी चला गया ।


अब गीदड़ अकेला ही मजे से मांस खाकर अपना पेट भर लिया। वाह वाह ! गीदड़ बहुत ही चालाक था।


 इसी तरह से बुद्धिमान लोग अपनी तीव्र बुद्धि से अपना काम बड़ी आसानी से ही बना लेते हैं।


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